जय श्री वीर जिन
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जय श्री वीर जिनवीर जिनचन्द,
कलुष-निकन्द मुनिहृद सुखकन्द ॥
सिद्धारथनन्द त्रिभुवन को दिनेन्द-चन्द,
जा वच-किरन भ्रम-तिमिर-निकन्द ।
जाके पद अरविन्द सेवत सुरेन्द्रवन्द,
जाके गुण रटत कटत भव-फन्द ॥
जाकी शान्तमुद्रा निरखत हरखत रिषि,
जाके अनुभवत लहत चिदानन्द ।
जाके घातिकर्म विघटत प्रगटत भये,
अनन्त दरश-बोध-वीरज-आनन्द ॥
लोकालोक-ज्ञाता पै स्वभावरत राता प्रभु,
जग को कुशलदाता त्राता अद्वन्द ।
जाकी महिमा अपार गणी न सके उचार,
'दौलत' नमत सुख चाहत अमन्द ॥