काहे क्रोध करे
Karaoke :
रे जिय! काहे क्रोध करे ॥टेक॥
देख के अविवेक प्रानी, क्यों न विवेक धरै ॥१॥
जिसे जैसी उदय आवै, सो क्रिया आचरै ।
सहज तू अपनो बिगारै,जाय दुर्गम परै ॥२॥
होय संगति गुन सधनि को, सरब जग छच्चरै ।
तुम भले कर भले सबको, बुरे लखि मति जरै ॥३॥
वैद्य परविष हर सकत नहीं, आप भखि को मरै ।
बह कषाय निगोद-वासा, 'द्यानत' क्षमा धरै ॥४॥