जियको लोभ महा
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जियको लोभ महा दुखदाई, जाकी शोभा वरनी न जाई ।
लोभ करै मूरख संसारी, छांडै पण्डित शिव अधिकारी ॥टेक॥
तजि घरवास फिरै वनमाहीं, कनक कामिनी छांडै नाहीं ।
लोक रिझावनको व्रत लीना, व्रत न होय ठगई सा कीना ॥
जियको लोभ महा दुखदाई, जाकी शोभा वरनी न जाई ॥१॥
लोभवशात जीव हत डारै, झूठ बोल चोरी चित धारै ।
नारि गहै परिग्रह विसतारै, पाँच पाप कर नरक सिधारै ॥
जियको लोभ महा दुखदाई, जाकी शोभा वरनी न जाई ॥२॥
जोगी जती गृही वनवासी, बैरागी दरवेश सन्यासी ।
अजस खान जसकी नहिं रेखा, 'द्यानत' जिनकै लोभ विशेखा ॥
जियको लोभ महा दुखदाई, जाकी शोभा वरनी न जाई ॥३॥