थाँकी उत्तम क्षमा पै
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थाँकी उत्तम क्षमा पै जी, अचम्भो म्हाने आवे,
किस विधि किये कर्म चकचूर ॥टेक॥
एक तो प्रभु तुम परम दिगम्बर, पास न तिल तुष मात्र हजूर,
दूजे जीव दया के सागर, तीजे संतोषी भरपूर ॥
थाँकी उत्तम क्षमा पै जी, अचम्भो म्हाने आवे ॥१॥
चौथे प्रभु तुम हित उपदेशी, तारण तरण जगत मशहूर,
कोमल वचन सरल सत वक्ता निर्लोभी संयम तपसूर ॥
थाँकी उत्तम क्षमा पै जी, अचम्भो म्हाने आवे ॥२॥
कैसे ज्ञानावरणी निवार्यो कैसे गेर्यो अदर्शन चूर,
कैसे मोहमल्ल तुम जीत्यो कैसे किये च्यारु घातिया दूर ॥
थाँकी उत्तम क्षमा पै जी, अचम्भो म्हाने आवे ॥३॥
त्याग उपाधि हो तुम साहिब, आकिंचन व्रतधारी मूल,
दोष अठारह दूषण तजके, कैसे जीते काम क्रूर ॥
थाँकी उत्तम क्षमा पै जी, अचम्भो म्हाने आवे ॥४॥
कैसे केवलज्ञान उपायो, अंतराय कैसे किये निर्मूल,
सुर-नर-मुनि सेवैं चरण तुम्हारे, तो भी नहिं प्रभु तुम के गरूर ॥
थाँकी उत्तम क्षमा पै जी, अचम्भो म्हाने आवे ॥५॥
करतदास अरदास 'नैनसुख', दीजे यह मोहे दान जरूर,
जनम जनम पद पंकज सेवूं, और न चित कछु चाह हजूर ॥
थाँकी उत्तम क्षमा पै जी, अचम्भो म्हाने आवे ॥६॥