काहे को सोचत अति भारी
Karaoke :
राग : मल्हार
काहेको सोचत अति भारी, रे मन!
पूरब करमन की थित बाँधी, सो तो टरत न टारी ॥टेक॥
सब दरवनिकी तीन कालकी, विधि न्यारीकी न्यारी ।
केवलज्ञान विषैं प्रतिभासी, सो सो ह्वै है सारी ॥काहे १॥
सोच किये बहु बंध बढ़त है, उपजत है दुख ख्वारी ।
चिंता चिता समान बखानी, बुद्धि करत है कारी ॥काहे २॥
रोग सोग उपजत चिंतातैं, कहौ कौन गुनवारी ।
'द्यानत' अनुभव करि शिव पहुँचे, जिन चिंता सब जारी ॥काहे ३॥