रे भाई मोह महा दुखदाता
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राग : आसावरी, मोहे भूल गए साँवरिया
रे भाई! मोह महा दुखदाता ॥टेक॥
वसत विरानी अपनी मानैं, विनसत होत असाता ॥
जास मास जिस दिन छिन विरियाँ, जाको होसी घाता ।
ताको राखन सकै न कोई, सुर नर नाग विख्याता ॥
रे भाई! मोह महा दुखदाता ॥१॥
सब जग मरत जात नित प्रति नहिं, राग बिना बिललाता ।
बालक मरैं करै दुख धाय न, रुदन करै बहु माता ॥
रे भाई! मोह महा दुखदाता ॥२॥
मूसे हनें बिलाव दुखी नहिं, मुरग हनैं रिस खाता ।
'द्यानत' मोह-मूल ममता को, नास करै सो ज्ञाता ॥
रे भाई! मोह महा दुखदाता ॥३॥