देव-शास्त्र-गुरु
बाल ब्रह्मचारी रवीन्द्र जी आत्मन कृत
देव-शास्त्र-गुरुवर अहो! मम स्वरूप दर्शाय ।
किया परम उपकार मैं, नमन करूँ हर्षाय ॥
जब मैं आता आप ढिंग, निज स्मरण सु आय ।
निज प्रभुता मुझमें प्रभो! प्रत्यक्ष देय दिखाय ॥
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरु समूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरु समूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरु समूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधि करणं
जब से स्व-सन्मुख दृष्टि हुई, अविनाशी ज्ञायक रूप लखा ।
शाश्वत अस्तित्व स्वयं का लखकर, जन्म-मरणभय दूर हुआ ॥
श्री देव-शास्त्र-गुरुवर सदैव, मम परिणति में आदर्श रहो ।
ज्ञायक में ही स्थिरता हो, निज भाव सदा मंगलमय हो ॥
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरुभ्य: जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा
निज परमतत्त्व जब से देखा, अद्भुत शीतलता पाई है ।
आकुलतामय संतप्त परिणति, सहज नहीं उपजाई है ॥
श्री देव-शास्त्र-गुरुवर सदैव, मम परिणति में आदर्श रहो ।
ज्ञायक में ही स्थिरता हो, निज भाव सदा मंगलमय हो ॥
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरुभ्य: संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा
निज अक्षयप्रभु के दर्शन से ही, अक्षयसुख विकसाया है ।
क्षत् भावों में एकत्वपने का, सर्व विमोह पलाया है ॥
श्री देव-शास्त्र-गुरुवर सदैव, मम परिणति में आदर्श रहो ।
ज्ञायक में ही स्थिरता हो, निज भाव सदा मंगलमय हो ॥
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरुभ्य: अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा
निष्काम परम ज्ञायक प्रभुवर, जब से दृष्टि में आया है ।
विभु ब्रह्मचर्य रस प्रकट हुआ, दुर्दान्त काम विनशाया है ॥
श्री देव-शास्त्र-गुरुवर सदैव, मम परिणति में आदर्श रहो ।
ज्ञायक में ही स्थिरता हो, निज भाव सदा मंगलमय हो ॥
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरुभ्य: कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा
मैं हुआ निमग्न तृप्ति सागर में, तृष्णा ज्वाल बुझाई है ।
क्षुधा आदि सब दोष नशें, वह सहज तृप्ति उपजाई है ॥
श्री देव-शास्त्र-गुरुवर सदैव, मम परिणति में आदर्श रहो ।
ज्ञायक में ही स्थिरता हो, निज भाव सदा मंगलमय हो ॥
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरुभ्य: क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा
ज्ञान-भानु का उदय हुआ, आलोक सहज ही छाया है ।
चिरमोह महातम हे स्वामी, इस क्षण ही सहज विलाया है ॥
श्री देव-शास्त्र-गुरुवर सदैव, मम परिणति में आदर्श रहो ।
ज्ञायक में ही स्थिरता हो, निज भाव सदा मंगलमय हो ॥
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरुभ्य: मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा
द्रव्य-भाव-नोकर्म शून्य, चैतन्य प्रभु जब से देखा ।
शुद्ध परिणति प्रकट हुई, मिटती परभावों की रेखा ॥
श्री देव-शास्त्र-गुरुवर सदैव, मम परिणति में आदर्श रहो ।
ज्ञायक में ही स्थिरता हो, निज भाव सदा मंगलमय हो ॥
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरुभ्य: अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा
अहो पूर्ण निज वैभव लख, नहीं कामना शेष रही ।
हो गया सहज मैं निर्वांछक, निज में ही अब मुक्ति दिखी ॥
श्री देव-शास्त्र-गुरुवर सदैव, मम परिणति में आदर्श रहो ।
ज्ञायक में ही स्थिरता हो, निज भाव सदा मंगलमय हो ॥
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरुभ्य: मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा
निज से उत्तम दिखे न कुछ भी, पाई निज अनर्घ्य माया ।
निज में ही अब हुआ समर्पण, ज्ञानानन्द प्रकट पाया ॥
श्री देव- शास्त्र -गुरुवर सदैव, मम परिणति में आदर्श रहो ।
ज्ञायक में ही स्थिरता हो, निज भाव सदा मंगलमय हो ॥
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरुभ्य: अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
ज्ञान मात्र परमात्मा, परम प्रसिद्ध कराय ।
धन्य आज मैं हो गया, निज स्वरूप को पाय ॥
चैतन्य में ही मग्न हो, चैतन्य दरशाते अहो ।
निर्दोष श्री सर्वज्ञ प्रभुवर, जगत्साक्षी हो विभो ॥
सच्चे प्रणेता धर्म के, शिवमार्ग प्रकटाया प्रभो ।
कल्याण वाँछक भविजनों, के आप ही आदर्श हो ॥
शिवमार्ग पाया आप से, भवि पा रहे अरु पायेंगे ।
स्वाराधना से आप सम ही, हुए, हो रहे, होयेंगे ॥
तव दिव्यध्वनि में दिव्य-आत्मिक, भाव उद्घोषित हुए ।
गणधर गुरु आम्नाय में, शुभ शास्त्र तब निर्मित हुए ॥
निर्ग्रंथ गुरु के ग्रन्थ ये, नित प्रेरणाएं दे रहे ।
निजभाव अरु परभाव का, शुभ भेदज्ञान जगा रहे ॥
इस दुषम भीषण काल में, जिनदेव का जब हो विरह ।
तब मात सम उपकार करते, शास्त्र ही आधार हैं ॥
जग से उदास रहें स्वयं में, वास जो नित ही करें ।
स्वानुभव मय सहज जीवन, मूल गुण परिपूर्ण हैं ॥
नाम लेते ही जिन्हों का, हर्षमय रोमाँच हो ।
संसार-भोगों की व्यथा, मिटती परम आनन्द हो ॥
परभाव सब निस्सार दिखते, मात्र दर्शन ही किए ।
निजभाव की महिमा जगे, जिनके सहज उपदेश से ॥
उन देव-शास्त्र-गुरु प्रति, आता सहज बहुमान है ।
आराध्य यद्यपि एक, ज्ञायकभाव निश्चय ज्ञान है ॥
अर्चना के काल में भी, भावना ये ही रहे ।
धन्य होगी वह घड़ी, जब परिणति निज में रहे ॥
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरुभ्य: अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमाला अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
अहो कहाँ तक मैं कहूँ, महिमा अपरम्पार ।
निज महिमा में मगन हो, पाऊं पद अविकार ॥
॥पुष्पाजलिं क्षिपामि॥