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श्री
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सिद्धपूजा
हे सिद्ध तुम्हारे वंदन से उर में निर्मलता आती है ।
भव-भव के पातक कटते हैं पुण्यावलि शीश झुकाती है ॥
तुम गुण चिन्तन से सहज देव होता स्वभाव का भान मुझे ।
है सिद्ध समान स्वपद मेरा हो जाता निर्मल ज्ञान मुझे ॥
इसलिये नाथ पूजन करता, कब तुम समान मैं बन जाऊँ ।
जिसपथ पर चल तुम सिद्ध हुए, मैं भी चल सिद्ध स्वपद पाऊँ ॥
ज्ञानावणादिक अष्टकर्म को नष्ट करूँ ऐसा बल दो ।
निज अष्ट स्वगुण प्रगटें मुझमें, सम्यक् पूजन का यह फल हो ॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिन्! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिन्! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठः स्थापनं
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिन्! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधि करणं

कर्म मलिन हूँ जन्म जरा मृतु को कैसे कर पाऊँ क्षय ।
निर्मल आत्म ज्ञान जल दो प्रभु जन्म-मृत्यु पर पाऊँ जय ॥
अजर, अमर, अविकल अविकारी अविनाशी अनंत गुणधाम ।
नित्य निरंजन भव दुख भंजन ज्ञानस्वभावी सिद्ध प्रणाम ॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलम् निर्वपामीति स्वाहा

शीतल चंदन ताप मिटाता, किन्तु नहीं मिटता भव ताप ।
निज स्वभाव का चंदन दो, प्रभु मिटे राग का सब संताप ॥
अजर, अमर, अविकल अविकारी अविनाशी अनंत गुणधाम ।
नित्य निरंजन भव दुख भंजन ज्ञानस्वभावी सिद्ध प्रणाम ॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने संसारतापविनाशनाय चन्दनम् निर्वपामीति स्वाहा

उलझा हूँ संसार चक्र में कैसे इससे हो उद्धार ।
अक्षय तन्दुल रत्नत्रय दो हो जाऊँ भव सागर पार ॥
अजर, अमर, अविकल अविकारी अविनाशी अनंत गुणधाम ।
नित्य निरंजन भव दुख भंजन ज्ञानस्वभावी सिद्ध प्रणाम ॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा

काम व्यथा से मैं घायल हूँ कैसे करूँ काम मद नाश ।
विमलदृष्टि दो ज्ञानपुष्प दो, कामभाव हो पूर्ण विनाश ॥
अजर, अमर, अविकलअविकारी अविनाशी अनंत गुणधाम ।
नित्य निरंजन भव दुख भंजन ज्ञानस्वभावी सिद्ध प्रणाम ॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने कामबाणविध्वंसनाय पुष्पम् निर्वपामीति स्वाहा

क्षुधा रोग के कारण मेरा तृप्त नहीं हो पाया मन ।
शुद्धभाव नैवेद्य मुझे दो सफल करूँ प्रभु यह जीवन ॥
अजर, अमर, अविकल अविकारी अविनाशी अनंत गुणधाम ।
नित्य निरंजन भव दुख भंजन ज्ञानस्वभावी सिद्ध प्रणाम ॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यम् निर्वपामीति स्वाहा

मोहरूप मिथ्यात्व महातम अन्तर में छाया घनघोर ।
ज्ञानद्वीप प्रज्वलित करो प्रभु प्रकटे समकित रवि का भोर ॥
अजर, अमर, अविकल अविकारी अविनाशी अनंत गुणधाम ।
नित्य निरंजन भव दुख भंजन ज्ञानस्वभावी सिद्ध प्रणाम ॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने मोहान्धकारविनाशनाय दीपम् निर्वपामीति स्वाहा

कर्म शत्रु निज सुख के घाता इनको कैसे नष्ट करूँ ।
शुद्ध धूप दो ध्यान अग्नि में इन्हें जला भव कष्ट हरूँ ॥
अजर, अमर, अविकल अविकारी अविनाशी अनंत गुणधाम ।
नित्य निरंजन भव दुख भंजन ज्ञानस्वभावी सिद्ध प्रणाम ॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अष्टकर्मदहनाय धूपम् निर्वपामीति स्वाहा

निज चैतन्य स्वरूप न जाना, कैसे निज में आऊँगा ।
भेदज्ञान फल दो हे स्वामी स्वयं मोक्ष फल पाऊँगा ॥
अजर, अमर, अविकल अविकारी अविनाशी अनंत गुणधाम ।
नित्य निरंजन भव दुख भंजन ज्ञानस्वभावी सिद्ध प्रणाम ॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने मोक्षफलप्राप्तये फलम् निर्वपामीति स्वाहा

अष्ट द्रव्य का अर्घ्य चढ़ाऊँ, अष्टकर्म का हो संहार ।
निजअनर्घ पद पाऊँ भगवन्‌, सादि अनंत परम सुखकार ।
अजर, अमर, अविकल अविकारी, अविनाशी अनंत गुणधाम ।
नित्य निरंजन भव दुख भंजन, ज्ञानस्वभावी सिद्ध प्रणाम ॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

(जयमाला)
मुक्तिकन्त भगवन्त सिद्ध को मनवच काया सहित प्रणाम ।
अर्ध चन्द्र सम सिद्ध शिला पर आप विराजे आठों याम ॥

ज्ञानावरण दर्शनावरणी, मोहनीय अन्तराय मिटा ।
चार घातिया नष्ट हुए तो फिर अरहन्त रूप प्रगटा ॥

वेदनीय अरु आयु नाम अर गोत्र कर्म का नाश किया ।
चऊ अघातिया नाश किये तो स्वयं स्वरूप प्रकाश किया ॥

अष्टकर्म पर विजय प्राप्त कर अष्ट स्वगुण तुमने पाये ।
जन्म-मृत्यु का नाश किया निज सिद्ध स्वरूप स्वगुण भाये ॥

निज स्वभाव में लीन विमल चैतन्य स्वरूप अरूपी हो ।
पूर्ण ज्ञान हो पूर्ण सुखी हो पूर्ण बली चिद्रूपी हो ॥

वीतराग हो सर्व हितैषी राग-द्वेष का नाम नहीं ।
चिदानन्द चैतन्य स्वभावी कृतकृत्य कुछ काम नहीं ॥

स्वयं सिद्ध हो, स्वयं बुद्ध हो, स्वयं श्रेष्ठ समकित आगार ।
गुण अनन्त दर्शन के स्वामी तुम अनन्त गुण के भण्डार ॥

तुम अनन्त-बल के हो धारी ज्ञान अनन्तानन्त अपार ।
बाधा रहित सूक्ष्म हो भगवन्‌ अगुरुलघु अवगाह उदार ॥

सिद्ध स्वगुण के वर्णन तक की मुझ में प्रभुवर शक्ति नहीं ।
चलूँ तुम्हारे पथ पर स्वामी ऐसी भी तो भक्ति नहीं ॥

देव तुम्हारी पूजन करके हृदय कमल मुस्काया है ।
भक्ति भाव उर में जागा है मेरा मन हर्षाया है ॥

तुम गुण का चिन्‍तवन करे जो स्वयं सिद्ध बन जाता है ।
हो निजात्म में लीन दुखों से छुटकारा पा जाता है ॥

अविनश्वर अविकारी सुखमय सिद्ध स्वरूप विमल मेरा ।
मुझमें है मुझसे ही प्रगटेगा स्वरूप अविकल मेरा ॥
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

शुद्ध स्वभावी आत्मा निश्चय सिद्ध स्वरूप ।
गुण अनन्तयुत ज्ञानमय है त्रिकाल शिवभूप ॥
(पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्)

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