nikkyjain@gmail.com

🙏
श्री
Click Here
श्रीशांतिनाथ-पूजन
शांति जिनेश्वर हे परमेश्वर परमशान्त मुद्रा अभिराम ।
पंचम चक्री शान्ति सिन्धु सोलहवें तीर्थंकर सुखधाम ॥
निजानन्द में लीन शांति नायक जग गुरु निश्चल निष्काम ।
श्री जिन दर्शन पूजन अर्चन वंदन नित प्रति करुं प्रणाम ॥
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधि करणं

जल स्वभाव शीतल मलहारी आत्म स्वभाव शुद्ध निर्मल ।
जन्म मरण मिट जाये प्रभु जब जागे निजस्वभाव का बल ॥
परम शांति सुखदायक शांतिविधायक शांतिनाथ भगवान ।
शाश्वत सुख की मुझे प्राप्ति हो श्री जिनवर दो यह वरदान ॥
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा

शीतल चंदन गुण सुगन्धमय निज स्वभाव हो अति ही शीतल ।
पर विभाव का ताप मिटाता निज स्वरूप का अंतर्बल ॥
परम शांति सुखदायक शांतिविधायक शांतिनाथ भगवान ।
शाश्वत सुख की मुझे प्राप्ति हो श्री जिनवर दो यह वरदान ॥
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा

भव अटवी से निकल न पाया पर पदार्थ में अटका मन ।
यह संसार पार करने का निज स्वभाव ही है साधन ॥
परम शांति सुखदायक शांतिविधायक शांतिनाथ भगवान ।
शाश्वत सुख की मुझे प्राप्ति हो श्री जिनवर दो यह वरदान ॥
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा

कोमल पृष्प मनोरम जिनमें राग आग की दाह प्रबल ।
निज स्वरूप की महाशक्ति से काम व्यथा होती निर्बल ॥
परम शांति सुखदायक शांतिविधायक शांतिनाथ भगवान ।
शाश्वत सुख की मुझे प्राप्ति हो श्री जिनवर दो यह वरदान ॥
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा

उर की क्षुधा मिटाने वाला यह चरु तो दुखदायक है ।
इच्छाओं की भूख मिटाता निज स्वभाव सुखदायक है ॥
परम शांति सुखदायक शांतिविधायक शांतिनाथ भगवान ।
शाश्वत सुख की मुझे प्राप्ति हो श्री जिनवर दो यह वरदान ॥
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यं निर्वपामीति स्वाहा

अन्धकार में भ्रमते-भ्रमते भव-भव में दुख पाया है ।
निजस्वरूप के ज्ञानभानु का उदय न अब तक आया है ॥
परम शांति सुखदायक शांतिविधायक शांतिनाथ भगवान ।
शाश्वत सुख की मुझे प्राप्ति हो श्री जिनवर दो यह वरदान ॥
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा

इष्ट-अनिष्ट संयोगों में ही अब तक सुख-दुख माना है ।
पूर्णत्रिकाली ध्रुवस्वभाव का बल न कभी पहचाना है ॥
परम शांति सुखदायक शांतिविधायक शांतिनाथ भगवान ।
शाश्वत सुख की मुझे प्राप्ति हो श्री जिनवर दो यह वरदान ॥
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा

शुद्धभाव पीयूष त्यागकर पर को अपना मान लिया ।
पुण्य फलों में रूचि करके अब तक मैनें विषपान किया ॥
परम शांति सुखदायक शांतिविधायक शांतिनाथ भगवान ।
शाश्वत सुख की मुझे प्राप्ति हो श्री जिनवर दो यह वरदान ॥
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा

अविनश्वर अनुपम अनर्घपद सिद्ध स्वरूप महा सुखकार ।
मोक्ष भवन निर्माता निज चैतन्य राग नाशक अघहार ॥
परम शांति सुखदायक शांतिविधायक शांतिनाथ भगवान ।
शाश्वत सुख की मुझे प्राप्ति हो श्री जिनवर दो यह वरदान ॥
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

(पंचकल्याणक अर्घ्यावली)
भादव कृष्ण सप्तमी के दिन तज सर्वार्थ सिद्धि आये ।
माता ऐरा धन्य हो गयी विश्वसेन नृप हरषाये ॥
छप्पन दिक्‍कुमारियों ने नित नवल गीत मंगल गाये ।
शांतिनाथ के गर्भोत्सव पर रत्न इन्द्र ने बरसाये ॥
ॐ ह्रीं भाद्रपदकृष्णा सप्तम्यां गर्भमंगलमंडिताय श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

नगर हस्तिनापुर में जन्में त्रिभुवन में आनन्द हुआ ।
ज्येष्ठ कृष्ण की चतुर्दशी को सुरगिरि पर अभिषेक हुआ ॥
मंगल वाद्य नृत्य गीतों से गूंज उठा था पाण्डुक वन ।
हुआ जन्म कल्याण महोत्सव शांतिनाथ प्रभु का शुभ दिन ॥
ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णाचतुर्दश्यां जन्ममंगलमंडिताय श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

मेघ विलय लख इस जग की अनित्यता का प्रभुभान लिया ।
लौकांतिक देवों ने आकर धन्य-धन्य जयगान किया ॥
कृष्ण चतुर्दशी ज्येष्ठ मास की अतुलित वैभव त्याग दिया ।
शांतिनाथ ने मुनिव्रत धारा शुद्धातम अनुराग किया ॥
ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णाचतुर्दश्यां तपोमंगलमंडिताय श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

पौष शुक्ल दशमी को चारों घातिकर्म चकचूर किये ।
पाया केवलज्ञान जगत के सारे संकट दूर किये ॥
समवशरण रचकर देवों ने किया ज्ञान कल्याण महान ।
शांतिनाथ प्रभु की महिमा का गूंजा जग में जय-जयगान ॥
ॐ ह्रीं पौषशुक्लादशम्यां केवलज्ञानमंडिताय श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

ज्येष्ठ कृष्ण की चतुर्दशी को प्राप्त किया सिद्धत्व महान ।
कूट कुन्दप्रभु गिरि सम्मेद शिखर से पाया पद निर्वाण ॥
सादि अनन्त सिद्ध पद को प्रगटाया प्रभु ने धर निज-ध्यान ।
जय-जयशांतिनाथ जगदीश्वर अनुपम हुआ मोक्ष-कल्याण ॥
ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णाचतुर्दश्यां मोक्षमंगलमंडिताय श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

(जयमाला)
शान्तिनाथ शिवनायक शांति विधायक शुचिमय शुद्धात्मा ।
शुभ्र-मूर्ति शरणागत वत्सल शील स्वभावी शांतात्मा ॥
नगर हस्तिनापुर के अधिपति विश्वसेन नृप के नन्‍दन ।
माँ ऐरा के राज दुलारे सुर नर मुनि करते वन्दन ॥

कामदेव बारहवें पंचम चक्री तीन ज्ञान धारी ।
बचपन में अणुव्रत धर यौवन में पाया वैभव भारी ॥
भरतक्षेत्र के षट-खण्डों को जयकर हुए चक्रवर्ती ।
नव निधि चौदह रत्न प्राप्त कर शासक हुए न्यायवर्ती ॥

इस जग के उत्कृष्ट भोग भोगते बहुत जीवन बीता ।
एक दिवस नभ में घन का परिवर्तन लख निज मन रीता ॥
यह संसार असार जानकर तप धारण का किया विचार ।
लौकांतिक देवर्षि सुरों ने किया हर्ष से जय जयकार ॥

वन में जाकर दीक्षा धारी पंच-मुष्टि कचलोंच किया ।
चक्रवर्ती की अतुल सम्पदा क्षण में त्याग विराग लिया ॥
मन्दिरपुर के नृप सुमित्र ने भक्ति-पूर्वक दान दिया ।
प्रभुकर में पय धारा दे भव सिंधु सेतु निर्माण किया ॥

उग्र तपश्या से तुमने कर्मों की कर निर्जरा महान ।
सोलह वर्ष मौन तप करके ध्याया शुद्धातम का ध्यान ॥
श्रेणी क्षपक चढ़े स्वामी केवलज्ञानी सर्वज्ञ हुए ।
दिव्यध्वनि से जीवों को उपदेश दिया विश्वज्ञ हुए ॥

गणधर थे छत्तीस आपके चक्रायुद्ध पहले गणधर ।
मुख्य आर्यिका हरिषेणा थी श्रोता पशु नर सुर मुनिवर ॥
कर विहार जग में जगती के जीवों का कल्याण किया ।
उपादेय है शुद्ध आत्मा यह सन्देश महान दिया ॥

पाप-पुण्य शुभ-अशुभ आम्रव जग में भ्रमण कराते हैं ।
जो संवर धारण करते हैं परम मोक्ष-पद पाते हैं ॥
सात-तत्त्व की श्रद्धा करके जो भी समकित धरते हैं ।
रत्नत्रय का अवलम्बन ले मुक्तिवधु को वरते हैं ॥

सम्मेदाचल के पावन पर्वत पर आप हुए आसीन ।
कूट कुन्दप्रभ से अधातिया कर्मों से भी हुए विहीन ॥
महामोक्ष निर्वाण प्राप्तकर गुण अनन्त से युक्त हुए ।
शुद्ध बुद्ध अविरुद्ध सिद्ध॒पद पाया भव से मुक्त हुए ॥

हे प्रभु शांतिनाथ मंगलमय मुझको भी ऐसा वर दो ।
शुद्ध आत्मा की प्रतीति मेरे उर में जाग्रत कर दो ॥
पाप ताप संताप नष्ट हो जाये सिद्ध स्वपद पाऊँ ।
पूर्ण शांतिमय शिव-सुख पाकर फिर न लौट भव में आऊँ ॥
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

चरणों में मृग चिन्ह सुशोभित शांति जिनेश्वर का पूजन ।
भक्ति भाव से जो करते हैं वे पाते हैं मुक्ति गगन ॥
(इत्याशिर्वादः ॥ पुष्पांजलिं क्षिपेत ॥)
Close

Play Jain Bhajan / Pooja / Path

Radio Next Audio

देव click to expand contents

शास्त्र click to expand contents

गुरु click to expand contents

कल्याणक click to expand contents

अध्यात्म click to expand contents

पं दौलतराम कृत click to expand contents

पं भागचंद कृत click to expand contents

पं द्यानतराय कृत click to expand contents

पं सौभाग्यमल कृत click to expand contents

पं भूधरदास कृत click to expand contents

पं बुधजन कृत click to expand contents

पर्व click to expand contents

चौबीस तीर्थंकर click to expand contents

दस धर्म click to expand contents

selected click to expand contents

नित्य पूजा click to expand contents

तीर्थंकर click to expand contents

पाठ click to expand contents

स्तोत्र click to expand contents

द्रव्यानुयोग click to expand contents

द्रव्यानुयोग click to expand contents

द्रव्यानुयोग click to expand contents

loading