nikkyjain@gmail.com

🙏
श्री
Click Here
श्रीपार्श्वनाथ-पूजन-पण्डित-वृन्दावनदास
प्रानतदेवलोकतें आये, वामादेवी उर जगदाधार।
अश्वसेन सुतनुत हरिहर हरि, अंक हरिततन सुखदातार ॥
जरतनाग जुगबोधि दियो जिहि, भुवनेसुरपद परमउदार ।
ऐसे पारस को तजि आरस, थापि सुधारस हेत विचार ॥
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधि करणं

सुरदीरधि सों जल-कुम्भ भरों, तुव पादपद्मतर धार करों ।
सुखदाय पाय यह सेवत हौं, प्रभुपार्श्व पार्श्वगुन सेवत हौं ॥
ॐ ह्रीं जन्ममृत्युविनाशनाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्रेभ्यो जलं निर्वपामीति स्वाहा

हरिगंध कुकुम कर्पूर घसौं, हरिचिह्नहेरि अरचों सुरसौं ।
सुखदाय पाय यह सेवत हौं, प्रभुपार्श्व पार्श्वगुन सेवत हौं ॥
ॐ ह्रीं भवतापविनाशनाय श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्रेभ्यश्चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा

हिमहीरनीरजसमानशुचं, वरपुंज तंदुल तवाग्र मुचं
सुखदाय पाय यह सेवत हौं, प्रभुपार्श्व पार्श्वगुन सेवत हौं ॥
ॐ ह्रीं अक्षयपदप्राप्तये श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्रेभ्यो अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा

कमलादिपुष्प धनुपुष्प धरी, मदभंजन हेत ढिग पुंज करी
सुखदाय पाय यह सेवत हौं, प्रभुपार्श्व पार्श्वगुन सेवत हौं ॥
ॐ ह्रीं कामबाणविध्वंसनाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्रेभ्यः पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा

चरु नव्यगव्य रससार करों, धरि पादपद्मतर मोद भरों ।
सुखदाय पाय यह सेवत हौं, प्रभुपार्श्व पार्श्वगुन सेवत हौं ॥
ॐ ह्रीं क्षुधारोगनिवारणाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्रेभ्यो नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा

मणिदीपजोत जगमग्ग मई, ढिगधारतें स्वपरबोध ठई ।
सुखदाय पाय यह सेवत हौं, प्रभुपार्श्व पार्श्वगुन सेवत हौं ॥
ॐ ह्रीं मोहान्धकारविनाशनाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्रेभ्यो दीपं निर्वपामीति स्वाहा

दशगंध खेय मनमाचत है, वह धूम धूम-मिसि नाचत है ।
सुखदाय पाय यह सेवत हौं, प्रभुपार्श्व पार्श्वगुन सेवत हौं ॥
ॐ ह्रीं अष्ठकर्मदहनाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्रेभ्यो धूपं निर्वपामीति स्वाहा

फलपक्व शुद्ध रसजुक्त लिया, पदकंज पूजत हौं खोलि हिया ।
सुखदाय पाय यह सेवत हौं, प्रभुपार्श्व पार्श्वगुन सेवत हौं ॥
ॐ ह्रीं मोक्षफलप्राप्तये श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्रेभ्यः फलं निर्वपामीति स्वाहा

जलआदि साजिसब द्रव्य लिया, कनथार धार नुतनृत्य किया ।
सुखदाय पाय यह सेवत हौं, प्रभुपार्श्व पार्श्वगुन सेवत हौं ॥
ॐ ह्रीं अनर्घ्यपदप्राप्तये श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्रेभ्यो अर्घं निर्वपामीति स्वाहा

(पञ्चकल्याणक)
पक्ष वैशाख की श्याम दूजी भनों, गर्भकल्यान को द्यौस सोही गनों ।
देवदेवेन्द्र श्रीमातु सेवें सदा, मैं जजों नित्य ज्यों विघ्न होवै विदा ॥
ॐ ह्रीं वैशाखकृष्णद्वितीयायां गर्भागममंगलप्राप्ताय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

पौष की श्याम एकादशी को स्वजी, जन्म लीनों जगन्नाथ धर्म ध्वजी ।
नाग नागेन्द्र नागेन्द्र पै पूजिया, मैं जजों ध्याय के भक्त धारों हिया ॥
ॐ ह्रीं पौषकृष्णेकादश्यां जन्ममंगलप्राप्ताय श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

कृष्णएकादशी पौष की पावनी, राज कों त्याग वैराग धार्यो वनी ।
ध्यानचिद्रूप को ध्याय साता मई, आपको मैं जजों भक्ति भावे लई ॥
ॐ ह्रीं पौष कृष्णेकादष्यां तपोमंगलमण्डिताय श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

चैत की चौथि श्यामामहाभावनी, तादिना घातिया घातिशोभावनी ।
बाह्य आभ्यन्तरे छन्द लक्ष्मीधरा, जैति सर्वज्ञ मैं पादसेवा करा ॥
ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णचतुर्थ्यां केवलज्ञानमंगलप्राप्ताय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

सप्तमी शुद्ध शोभै महासावनी, तादिना मोच्छपायो महापावनी ।
शैलसम्मेदतें सिद्धराजा भये, आपकों पूजते सिद्धकाजा ठये ॥
ॐ ह्रीं श्रावणशुक्लसप्तम्यां मोक्षमङ्गलपण्डिताय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

(जयमाला)
(दोहा)
पाशपर्म गुनराश है, पाश कर्म हरतार ।
पाश शर्म निजवास द्यो, पाश धर्म धरतार ॥
नगर बनारसि जन्मलिय, वंश इक्ष्वाकु महान ।
आयु वरष शततुंग तन, हस्त सुनौ परमान ॥

जय श्रीधर श्रीकर श्रीजिनेश, तुव गुन गन फणिगावत अशेश ।
जय जय जय आनंदकंद चंद, जय जय भविपंकजको दिनंद ॥

जय जय शिवतियवल्लभ महेश, जय ब्रह्मा शिवशंकर गनेश ।
जय स्वच्छचिदंग अनंगजीत, तुव ध्यावत मुनिगन सुहृदमीत ॥

जय गरभागममंडित महंत, जगजनमनमोदन परम संत ।
जय जनममहोच्छव सुखदधार, भविसारंग को जलधर उदार ॥

हरिगिरिवर पर अभिषेक कीन, झट तांडव निरत अरंभदीन ।
बाजन बाजत अनहद अपार, को पार लहत वरनत अवार ॥

दृमदृम दृमदृम दृमदृम मृदंग, घनन नननन घंटा अभंग ।
छमछम छमछम छम छुद्र घंट, टमटम टमटम टंकोर तंट ॥

झननन झननन नूपुर झंकोर, तननन तननन नन तानशोर ।
सनननन ननननन गगन माहिं, फिरि फिरि फिरि फिरि फिरिकी लहांहिं ॥

ताथेइ थेइ थेइ थेइ धरत पाव, चटपट अटपट झट त्रिदशराव ।
करिके सहस्र करको पसार, बहुभांति दिखावत भाव प्यार ॥

निजभगति प्रगट जित करत इंद्र, ताको क्या कहिं सकि हैं कविंद्र ।
जहँ रंगभूमि गिरिराज पर्म, अरु सभा ईश तुम देव शर्म ॥

अरु नाचत मघवा भगतिरूप, बाजे किन्नर बज्जत अनूप ।
सो देखत ही छवि बनत वृन्द, मुखसों कैसे वरनै अमंद ॥

धनघड़ी सोय धन देव आप, धन तीर्थंकर प्रकृती प्रताप ।
हम तुमको देखत नयनद्वार, मनु आज भये भवसिंधु पार ॥

पुनिपिता सौंपि हरि स्वर्गजाय, तुम सुखसमाज भोग्यौ जिनाय ।
फिर तपधरि केवलज्ञान पाय, धरमोपदेश दे शिवसिधाय ॥

हम सरनागत आये अबार, हे कृपासिंधु गुन अमलधार ।
मो मन में तिष्ठहु सदाकाल, जबलों न लहों शिवपुर रसाल ॥

निरवान थान सम्मेद जाय, 'वृदावन' वंदत शीसनाय ।
तुम ही हो सब दुखदंद हर्न, तातें पकरी यह चर्नशर्न ॥

(धत्ता)
जयजय सुखसागर, त्रिभुवन आगर, सुजस उजागर, पार्श्वपती ।
वृन्दावन ध्यावत, पूजरचावत, शिवथलपावत, शर्म अति ॥
(इत्याशिर्वादः ॥ पुष्पांजलिं क्षिपेत ॥)
Close

Play Jain Bhajan / Pooja / Path

Radio Next Audio

देव click to expand contents

शास्त्र click to expand contents

गुरु click to expand contents

कल्याणक click to expand contents

अध्यात्म click to expand contents

पं दौलतराम कृत click to expand contents

पं भागचंद कृत click to expand contents

पं द्यानतराय कृत click to expand contents

पं सौभाग्यमल कृत click to expand contents

पं भूधरदास कृत click to expand contents

पं बुधजन कृत click to expand contents

पर्व click to expand contents

चौबीस तीर्थंकर click to expand contents

दस धर्म click to expand contents

selected click to expand contents

नित्य पूजा click to expand contents

तीर्थंकर click to expand contents

पाठ click to expand contents

स्तोत्र click to expand contents

द्रव्यानुयोग click to expand contents

द्रव्यानुयोग click to expand contents

द्रव्यानुयोग click to expand contents

loading