श्रीपार्श्वनाथ-पूजन-पण्डित-वृन्दावनदास
प्रानतदेवलोकतें आये, वामादेवी उर जगदाधार।
अश्वसेन सुतनुत हरिहर हरि, अंक हरिततन सुखदातार ॥
जरतनाग जुगबोधि दियो जिहि, भुवनेसुरपद परमउदार ।
ऐसे पारस को तजि आरस, थापि सुधारस हेत विचार ॥
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधि करणं
सुरदीरधि सों जल-कुम्भ भरों, तुव पादपद्मतर धार करों ।
सुखदाय पाय यह सेवत हौं, प्रभुपार्श्व पार्श्वगुन सेवत हौं ॥
ॐ ह्रीं जन्ममृत्युविनाशनाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्रेभ्यो जलं निर्वपामीति स्वाहा
हरिगंध कुकुम कर्पूर घसौं, हरिचिह्नहेरि अरचों सुरसौं ।
सुखदाय पाय यह सेवत हौं, प्रभुपार्श्व पार्श्वगुन सेवत हौं ॥
ॐ ह्रीं भवतापविनाशनाय श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्रेभ्यश्चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा
हिमहीरनीरजसमानशुचं, वरपुंज तंदुल तवाग्र मुचं
सुखदाय पाय यह सेवत हौं, प्रभुपार्श्व पार्श्वगुन सेवत हौं ॥
ॐ ह्रीं अक्षयपदप्राप्तये श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्रेभ्यो अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा
कमलादिपुष्प धनुपुष्प धरी, मदभंजन हेत ढिग पुंज करी
सुखदाय पाय यह सेवत हौं, प्रभुपार्श्व पार्श्वगुन सेवत हौं ॥
ॐ ह्रीं कामबाणविध्वंसनाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्रेभ्यः पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा
चरु नव्यगव्य रससार करों, धरि पादपद्मतर मोद भरों ।
सुखदाय पाय यह सेवत हौं, प्रभुपार्श्व पार्श्वगुन सेवत हौं ॥
ॐ ह्रीं क्षुधारोगनिवारणाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्रेभ्यो नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा
मणिदीपजोत जगमग्ग मई, ढिगधारतें स्वपरबोध ठई ।
सुखदाय पाय यह सेवत हौं, प्रभुपार्श्व पार्श्वगुन सेवत हौं ॥
ॐ ह्रीं मोहान्धकारविनाशनाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्रेभ्यो दीपं निर्वपामीति स्वाहा
दशगंध खेय मनमाचत है, वह धूम धूम-मिसि नाचत है ।
सुखदाय पाय यह सेवत हौं, प्रभुपार्श्व पार्श्वगुन सेवत हौं ॥
ॐ ह्रीं अष्ठकर्मदहनाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्रेभ्यो धूपं निर्वपामीति स्वाहा
फलपक्व शुद्ध रसजुक्त लिया, पदकंज पूजत हौं खोलि हिया ।
सुखदाय पाय यह सेवत हौं, प्रभुपार्श्व पार्श्वगुन सेवत हौं ॥
ॐ ह्रीं मोक्षफलप्राप्तये श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्रेभ्यः फलं निर्वपामीति स्वाहा
जलआदि साजिसब द्रव्य लिया, कनथार धार नुतनृत्य किया ।
सुखदाय पाय यह सेवत हौं, प्रभुपार्श्व पार्श्वगुन सेवत हौं ॥
ॐ ह्रीं अनर्घ्यपदप्राप्तये श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्रेभ्यो अर्घं निर्वपामीति स्वाहा
पक्ष वैशाख की श्याम दूजी भनों, गर्भकल्यान को द्यौस सोही गनों ।
देवदेवेन्द्र श्रीमातु सेवें सदा, मैं जजों नित्य ज्यों विघ्न होवै विदा ॥
ॐ ह्रीं वैशाखकृष्णद्वितीयायां गर्भागममंगलप्राप्ताय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
पौष की श्याम एकादशी को स्वजी, जन्म लीनों जगन्नाथ धर्म ध्वजी ।
नाग नागेन्द्र नागेन्द्र पै पूजिया, मैं जजों ध्याय के भक्त धारों हिया ॥
ॐ ह्रीं पौषकृष्णेकादश्यां जन्ममंगलप्राप्ताय श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
कृष्णएकादशी पौष की पावनी, राज कों त्याग वैराग धार्यो वनी ।
ध्यानचिद्रूप को ध्याय साता मई, आपको मैं जजों भक्ति भावे लई ॥
ॐ ह्रीं पौष कृष्णेकादष्यां तपोमंगलमण्डिताय श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
चैत की चौथि श्यामामहाभावनी, तादिना घातिया घातिशोभावनी ।
बाह्य आभ्यन्तरे छन्द लक्ष्मीधरा, जैति सर्वज्ञ मैं पादसेवा करा ॥
ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णचतुर्थ्यां केवलज्ञानमंगलप्राप्ताय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
सप्तमी शुद्ध शोभै महासावनी, तादिना मोच्छपायो महापावनी ।
शैलसम्मेदतें सिद्धराजा भये, आपकों पूजते सिद्धकाजा ठये ॥
ॐ ह्रीं श्रावणशुक्लसप्तम्यां मोक्षमङ्गलपण्डिताय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
पाशपर्म गुनराश है, पाश कर्म हरतार ।
पाश शर्म निजवास द्यो, पाश धर्म धरतार ॥
नगर बनारसि जन्मलिय, वंश इक्ष्वाकु महान ।
आयु वरष शततुंग तन, हस्त सुनौ परमान ॥
जय श्रीधर श्रीकर श्रीजिनेश, तुव गुन गन फणिगावत अशेश ।
जय जय जय आनंदकंद चंद, जय जय भविपंकजको दिनंद ॥
जय जय शिवतियवल्लभ महेश, जय ब्रह्मा शिवशंकर गनेश ।
जय स्वच्छचिदंग अनंगजीत, तुव ध्यावत मुनिगन सुहृदमीत ॥
जय गरभागममंडित महंत, जगजनमनमोदन परम संत ।
जय जनममहोच्छव सुखदधार, भविसारंग को जलधर उदार ॥
हरिगिरिवर पर अभिषेक कीन, झट तांडव निरत अरंभदीन ।
बाजन बाजत अनहद अपार, को पार लहत वरनत अवार ॥
दृमदृम दृमदृम दृमदृम मृदंग, घनन नननन घंटा अभंग ।
छमछम छमछम छम छुद्र घंट, टमटम टमटम टंकोर तंट ॥
झननन झननन नूपुर झंकोर, तननन तननन नन तानशोर ।
सनननन ननननन गगन माहिं, फिरि फिरि फिरि फिरि फिरिकी लहांहिं ॥
ताथेइ थेइ थेइ थेइ धरत पाव, चटपट अटपट झट त्रिदशराव ।
करिके सहस्र करको पसार, बहुभांति दिखावत भाव प्यार ॥
निजभगति प्रगट जित करत इंद्र, ताको क्या कहिं सकि हैं कविंद्र ।
जहँ रंगभूमि गिरिराज पर्म, अरु सभा ईश तुम देव शर्म ॥
अरु नाचत मघवा भगतिरूप, बाजे किन्नर बज्जत अनूप ।
सो देखत ही छवि बनत वृन्द, मुखसों कैसे वरनै अमंद ॥
धनघड़ी सोय धन देव आप, धन तीर्थंकर प्रकृती प्रताप ।
हम तुमको देखत नयनद्वार, मनु आज भये भवसिंधु पार ॥
पुनिपिता सौंपि हरि स्वर्गजाय, तुम सुखसमाज भोग्यौ जिनाय ।
फिर तपधरि केवलज्ञान पाय, धरमोपदेश दे शिवसिधाय ॥
हम सरनागत आये अबार, हे कृपासिंधु गुन अमलधार ।
मो मन में तिष्ठहु सदाकाल, जबलों न लहों शिवपुर रसाल ॥
निरवान थान सम्मेद जाय, 'वृदावन' वंदत शीसनाय ।
तुम ही हो सब दुखदंद हर्न, तातें पकरी यह चर्नशर्न ॥
जयजय सुखसागर, त्रिभुवन आगर, सुजस उजागर, पार्श्वपती ।
वृन्दावन ध्यावत, पूजरचावत, शिवथलपावत, शर्म अति ॥