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सिद्ध-श्रुत-आचार्य-भक्ति
श्री सिद्ध-भक्ति

अथ पौर्वाहि्णक (आपराहि्णक ) आचार्य वन्दना-क्रियायां पूर्वाचार्यनुक्रमेण, सकल-कर्म-क्षयार्थं, भाव-पूजा-वन्दना-स्तव-समेतं श्री सिद्धभक्ति कायोत्सर्गं करोम्यहम् ।

27 उच्छवास में कायोत्सर्ग करना

सम्मत्त-णाण-दंसण-वीरिय-सुहुमं तहेव अवगहणं ।
अगुरू-लघु-मव्वावाहं, अट्ठगुणा होंति सिद्धाणं ॥१॥

तव-सिद्धे णय सिद्धे संजम- सिद्धे चरित्त- सिद्धे य ।
णाणम्मि दंसणम्मि य सिद्धे सिरसा णमंसामि ॥२॥

अञ्चलिका

इच्छामि भंते ! सिद्ध भक्ति काउस्सग्गो कओ तस्सालोचेउं सम्मणाण-सम्मदंसण-सम्मचारित्त-जुत्ताणं, अट्ठविह-कम्म-विप्पमुक्काणं, अट्ठ-गुण-संपण्णाणं, उड्ढलोयमत्थयम्मि पयट्ठियाणं, तव-सिद्धाणं, णय सिद्धाणं, संजम सिद्धाणं, चरित्त-सिद्धाणं, अतीताणागद -वट्टमाण-कालत्तय-सिद्धाणं, सव्व-सिद्धाणं, णिच्चकालं अञ्चेमि, पूज्जेमि, वंदामि, णमस्सामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ, बोहिलाओ, सुगइ-गमणं, समाहि-मरणं, जिण-गुण-संपत्ति होउ मज्झं ।
श्रुतभक्ति

अथ पौर्वाहि्णक (आपराहि्णक ) आचार्य वन्दना-क्रियायां पूर्वाचार्यनुक्रमेण, सकल-कर्म-क्षयार्थं, भाव-पूजा-वन्दना-स्तव-समेतं श्री श्रुतभक्ति कायोत्सर्गं करोम्यहम् ।

27 उच्छवास में कायोत्सर्ग करना

कोटि-शतं द्वादश चैव कोट्यो,
लक्षाण्यशीति-स्त्र्यधिकानि चैव ।
पञ्चाशदष्टौ च सहस्त्र संख्या -
मेतच्छुतं पञ्च-पदं नमामि ।।१।।

अरहंत-भासियत्थं गणहर-देवेहिं गंथियं सम्मं ।
पणमामि भत्तिजुत्तो सुद-णाण-महोवहिं सिरसा ।।२।।

अञ्चलिका

इच्छामि भंते ! सुदभक्ति काउस्सग्गो कओ तस्सालोचेउं अंगोवंग-पइण्णय-पाहुडय-परियम्म-सुत्त-पढमाणिओग-पुव्वगय-चूलिया चेव सुत्तत्थय-थुइधम्म-कहाइयं णिच्चकालं अञ्चेमि, पूज्जेमि, वंदामि, णमस्सामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ, बोहिलाओ, सुगइ-गमणं, समाहि-मरणं, जिण-गुण-संपत्ति होउ मज्झं ।
आचार्य भक्ति

अथ पौर्वाहि्णक (आपराहि्णक ) आचार्य वन्दना- क्रियायां पूर्वाचार्यनुक्रमेण, सकल-कर्म-क्षयार्थं, भाव-पूजा-वन्दना-स्तव-समेतं श्री आचार्य भक्ति कायोत्सर्गं करोम्यहम् ।

27 उच्छवास में कायोत्सर्ग करना

लघु आचार्य भक्ति
श्रुत-जलधि-पारगेभ्यः , स्व-पर-मत-विभावना-पटु-मतिभ्यः ।
सुचरित-तपो-निधिभ्यो, नमो गुरूभ्यो गुण-गुरूभ्यः ॥१॥
छत्तीस-गुण-समग्गे, पञ्च-विहाचार-करण-संदरिसे ।
सिस्साणुग्गह-कुसले, धम्माइरिए सदा वन्दे ॥२॥
गुरू-भत्ति संजमेणय, तरन्ति संसार-सायरं घोरम् ।
छिण्णंति अट्ठ-कम्मं, जम्मण-मरणं ण पावेंति ॥३॥
ये नित्यं व्रत-मन्त्र-होम-निरता, ध्यानाग्नि-होत्राकुलाः ।
षट्-कर्माभि-रतास्तपोधन-धनाः, साधु-क्रियाः साधवः ॥
शील-प्रावरणा-गुण-प्रहरणाश्-चन्दार्क-तेजोડधिका ।
मोक्ष-द्वार-कपाट-पाटन-भटाः, प्रीणन्तु माम् साधवः ॥४॥
गुरवः पांतु नो नित्यं, ज्ञान-दर्शन-नायकाः ।
चारित्रार्णव-गम्भीरा, मोक्ष-मार्गोपदेशकाः ॥५॥

अञ्चलिका

इच्छामि भंते ! आइरिय-भत्ति-काउस्सग्गो कओ तस्सालोचेउं, सम्मणाण-सम्मदंसण-सम्मचारित्त जुत्ताणं, पञ्च-विहाचाराणं, आइरियाणं, आयारादिसुद-णाणोवदेसयाणं उवज्झायाणं, ति-रयण-गुण-पालण-रयाणं सव्वसाहूणं, णिच्चकालं अञ्चेमि, पूज्जेमि, वंदामि, णमस्सामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ, बोहिलाओ, सुगइ-गमणं, समाहि-मरणं, जिण-गुण-संपत्ति होउ मज्झं ।