
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ जीवाजीवावेकीभूतौ प्रविशतः । (कलश--शार्दूलविक्रीडित) जीवाजीवविवेकपुष्कलद्रशा प्रत्याययत्पार्षदान् आसंसारनिबद्धबन्धनविधिध्वंसाद्विशुद्धं स्फुटत् । आत्माराममनन्तधाम महसाध्यक्षेण नित्योदितं धीरोदात्तमनाकुलं विलसति ज्ञानं मनो ह्लादयत् ॥३३॥ इह खलु तदसाधारणलक्षणाकलनात्क्लीबत्वेनात्यन्तविमूढाः सन्तस्तात्त्विकमात्मान-मजानन्तो बहवो बहुधा परमप्यात्मानमिति प्रलपन्ति । नैसर्गिकरागद्वेषकल्माषित-मध्यवसानमेव जीवस्तथाविधाध्यवसानात् अंगारस्येव कार्ष्ण्यादतिरिक्तत्वेनान्यस्यानुप-लभ्यमानत्वादिति केचित् । अनाद्यनन्तपूर्वापरीभूतावयवैकसंसरणक्रियारूपेण क्रीडत्कर्मैवजीवः कर्मणोऽतिरिक्तत्वेनान्यस्यानुपलभ्यमानत्वादिति केचित् । तीव्रमन्दानुभवभिद्यमानदुरंत-रागरसनिर्भराध्यवसानसंतान एव जीवस्ततोऽतिरिक्तस्यान्यस्यानुपलभ्यमानत्वादिति केचित् ।नवपुराणावस्थादिभावेन प्रवर्तमानं नोकर्मैव जीवः शरीरादतिरिक्तत्वेनान्यस्यानु- पलभ्यमानत्वादिति केचित् । विश्वमपि पुण्यपापरूपेणाक्रामन् कर्मविपाक एव जीवःशुभाशुभभावादतिरिक्तत्वेनान्यस्यानुपलभ्यमानत्वादिति केचित् । सातासातरूपेणाभि-व्याप्तसमस्ततीव्रमन्दत्वगुणाभ्यां भिद्यमानः कर्मानुभव एव जीवः सुखदुःखातिरिक्तत्वे-नान्यस्यानुपलभ्यमानत्वादिति केचित् । मज्जितावदुभयात्मकत्वादात्मकर्मोभयमेव जीवः कार्त्स्न्यतःकर्मणोऽतिरिक्तत्वेनान्यस्यानुपलभ्यमानत्वादिति केचित् । अर्थक्रियासमर्थः कर्मसंयोग एव जीवःकर्मसंयोगात्खट्वाया इव अष्टकाष्ठसंयोगादतिरिक्तत्वेनान्यस्यानुपलभ्यमानत्वादिति केचित् ।एवमेवंप्रकारा इतरेऽपि बहुप्रकाराः परमात्मेति व्यपदिशन्ति दुर्मेधसः, किन्तु न ते परमार्थवादिभिः परमार्थवादिन इति निर्दिश्यन्ते । अब जीवद्रव्य और अजीवद्रव्य — वे दोनों एक होकर रंगभूमि में प्रवेश करते हैं । (कलश-सवैया इकतीसा)
[ज्ञानं] ज्ञान है वह [मनो ह्लादयत्] मन को आनन्दरूप करता हुआ [विलसति] प्रगट होता है । वह [पार्षदान्] जीव-अजीव के स्वांग को देखनेवाले महापुरुषों को [जीव-अजीव-विवेक-पुष्कल-दृशा] जीव-अजीव के भेद को देखनेवाली अति उज्ज्वल निर्दोष दृष्टि के द्वारा [प्रत्याययत्] भिन्न द्रव्य की प्रतीति उत्पन्न कर रहा है । [आसंसार-निबद्ध-बन्धन-विधि-ध्वंसात्] अनादि संसार से जिनका बन्धन दृढ़ बन्धा हुआ है ऐसे ज्ञानावरणादि कर्मों के नाश से [विशुद्धं स्फुटत्] विशुद्ध, खिला है । और [आत्म-आरामम्] उसका रमण करने का क्रीड़ावन आत्मा ही है, [अनन्तधाम] उसका प्रकाश अनन्त है; और वह [अध्यक्षेण महसा नित्य-उदितं] प्रत्यक्ष तेज से नित्य उदयरूप है । तथा वह [धीरोदात्तम्] धीर है, उदात्त (उच्च) है और इसीलिए [अनाकुलं]अनाकुल है ।जीव और अजीव के विवेक से है पुष्ट जो, ऐसी दृष्टि द्वारा इस नाटक को देखता । अन्य जो सभासद हैं उन्हें भी दिखाता और, दुष्ट अष्ट कर्माें के बंधन को तोड़ता ॥ जाने लोकालोक को पै निज में मगन रहे, विकसित शुद्ध नित्य निज अवलोकता । ऐसो ज्ञानवीर धीर मंग भरे मन में, स्वयं ही उदात्त और अनाकुल सुशोभता ॥३३॥ अब जीव-अजीव का एक रूप वर्णन करते हैं -- इस जगत में आत्मा का असाधारण लक्षण न जानने के कारण नपुंसकता से अत्यन्त विमूढ़ होते हुए, तात्त्विक (परमार्थभूत) आत्मा को न जाननेवाले बहुत से अज्ञानीजन अनेक प्रकार से पर को भी आत्मा कहते हैं, बकते हैं ।
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जयसेनाचार्य :
[अप्पाणंमयाणंता मूढा दु परप्पवादिणो केई] आत्मा को न जानने वाले अज्ञानी जीव तो परद्रव्य को आत्मा कहते हैं - ऐसे कोई परात्मवादी जीव हैं ।
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