+ शुद्ध जीव कैसा होता है? -
अरसमरूवमगंधं अव्वत्तं चेदणागुणमसद्दं । (49)
जाण अलिंगग्गहणं जीवमणिद्दिट्ठसंठाणं ॥54॥
अरसमरुपमगन्धमव्यक्तं चेतनागुणमशब्दम् ।
जानीह्यलिंगग्रहणं जीवमनिर्दिष्टसंस्थानम् ॥४९॥
जीव चेतनागुण, शब्द-रस-रूप-गन्ध-व्यक्तिविहीन है ।
निर्दिष्ट नहिं संस्थान उसका, ग्रहण नहिं है लिङ्ग से ॥४९॥
अन्वयार्थ : [जीवम्] जीव को [अरसम्] रस-रहित, [अरूवम्] रूप-रहित, [अगन्धम्] गन्ध-रहित, [अव्वत्तं] अव्यक्त अर्थात् इन्द्रिय-गोचर नहीं ऐसा, [चेदणागुणम्] चेतना जिसका गुण है ऐसा, [असद्दम्] शब्दरहित, [अलिंगग्गहणं] किसी चिह्न से ग्रहण न होनेवाला और [अणिद्दिट्ठसंठाणम्] जिसका कोई आकार नहीं कहा जाता ऐसा [जाण] जान ।
Meaning : The pure soul should be known as without taste, colour and smell, beyond perception though the senses, characterized by consciousness, without sound, cannot be apprehended through a symbol or a sense organ, and has no definite shape.

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य    notes 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
यद्येवं तर्हि किंलक्षणोऽसावेकष्टङ्कोत्कीर्णः परमार्थजीव इति पृष्टः प्राह —

यः खलु पुद्गलद्रव्यादन्यत्वेनाविद्यमानरसगुणत्वात्, पुद्गलद्रव्यगुणेभ्यो भिन्नत्वेनस्वयमरसगुणत्वात्, परमार्थतः पुद्गलद्रव्यस्वामित्वाभावाद द्रव्येन्द्रियावष्टम्भेनारसनात्, स्वभावतः क्षायोपशमिकभावाभावाद्भावेन्द्रियावलम्बेनारसनात्, सकलसाधारणैकसंवेदनपरिणामस्वभावत्वात्
केवलरसवेदनापरिणामापन्नत्वेनारसनात्, सकलज्ञेयज्ञायकतादात्म्यस्य निषेधाद्रसपरिच्छेदपरिणत-त्वेऽपि स्वयं रसरूपेणापरिणमनाच्चारसः; तथा पुद्गलद्रव्यादन्यत्वेनाविद्यमानरूपगुणत्वात्, पुद्गलद्रव्यगुणेभ्यो भिन्नत्वेन स्वयमरूपगुणत्वात्, परमार्थतः पुद्गलद्रव्यस्वामित्वाभावाद्
द्रव्येन्द्रियावष्टंभेनारूपणात्, स्वभावतः क्षायोपशमिकभावाभावाद्भावेन्द्रियावलंबेनारूपणात्,
सकलसाधारणैकसंवेदनपरिणामस्वभावत्वात्केवलरूपवेदनापरिणामापन्नत्वेनारूपणात्, सकलज्ञेय-
ज्ञायकतादात्म्यस्य निषेधाद्रूपपरिच्छेदपरिणतत्वेऽपि स्वयं रूपरूपेणापरिणमनाच्चारूपः; तथा पुद्गलद्रव्यादन्यत्वेनाविद्यमानगन्धगुणत्वात्, पुद्गलद्रव्यगुणेभ्यो भिन्नत्वेन स्वयमगन्धगुणत्वात्, परमार्थतः पुद्गलद्रव्यस्वामित्वाभावाद् द्रव्येन्द्रियावष्टंभेनागंधनात्, स्वभावतः क्षायोपशमिकभावा-
भावाद्भावेन्द्रियावलंबेनागन्धनात्, सकलसाधारणैकसंवेदनपरिणामस्वभावत्वात्केवलगन्धवेदना-परिणामापन्नत्वेनागन्धनात्, सकलज्ञेयज्ञायकतादात्म्यस्य निषेधाद्गन्धपरिच्छेदपरिणतत्वेऽपि स्वयं गन्धरूपेणापरिणमनाच्चागन्धः; तथा पुद्गलद्रव्यादन्यत्वेनाविद्यमानस्पर्शगुणत्वात्, पुद्गलद्रव्यगुणेभ्यो
भिन्नत्वेन स्वयमस्पर्शगुणत्वात्, परमार्थतः पुद्गलद्रव्यस्वामित्वाभावाद् द्रव्येन्द्रियावष्टम्भेनास्पर्शनात्, स्वभावतः क्षायोपशमिकभावाभावाद्भावेन्द्रियावलम्बेनास्पर्शनात्, सकलसाधारणैकसंवेदनपरिणाम-स्वभावत्वात्केवलस्पर्शवेदनापरिणामापन्नत्वेनास्पर्शनात्, सकलज्ञेयज्ञायकतादात्म्यस्य निषेधात्त् स्पर्शपरिच्छेदपरिणतत्वेऽपि स्वयं स्पर्शरूपेणापरिणमनाच्चास्पर्शः; तथा पुद्गलद्रव्यादन्यत्वेनाविद्यमान-
शब्दपर्यायत्वात्, पुद्गलद्रव्यपर्यायेभ्यो भिन्नत्वेन स्वयमशब्दपर्यायत्वात्, परमार्थतः पुद्गलद्रव्य-स्वामित्वाभावाद् द्रव्येन्द्रियावष्टंभेन शब्दाश्रवणात्, स्वभावतः क्षायोपशमिकभावाभावाद्भावे-न्द्रियावलंबेन शब्दाश्रवणात्, सकलसाधारणैक संवेदनपरिणामस्वभावत्वात्केवलशब्दवेदना-परिणामापन्नत्वेन शब्दाश्रवणात्, सकलज्ञेयज्ञायकतादात्म्यस्य निषेधाच्छब्दपरिच्छेदपरिणतत्वेऽपि स्वयं शब्दरूपेणापरिणमनाच्चाशब्दः; द्रव्यान्तरारब्धशरीरसंस्थानेनैव संस्थान इति निर्देष्टमशक्यत्वात्, नियतस्वभावेनानियतसंस्थानानन्तशरीरवर्तित्वात्, संस्थाननामकर्मविपाकस्य पुद्गलेषु निर्दिश्यमानत्वात्, प्रतिविशिष्टसंस्थानपरिणतसमस्तवस्तुतत्त्वसंवलितसहजसंवेदनशक्तित्वेऽपि स्वयमखिललोक-संवलनशून्योपजायमाननिर्मलानुभूतितयात्यन्तमसंस्थानत्वाच्चानिर्दिष्टसंस्थानः; षड्द्रव्यात्मकलोकाज्ज्ञेयाद्वयक्तादन्यत्वात्, कषायचक्राद् भावकाद्वयक्तादन्यत्वात्, चित्सामान्यनिमग्नसमस्तव्यक्तित्वात्, क्षणिकव्यक्तिमात्राभावात्, व्यक्ताव्यक्तविमिश्रप्रतिभासेऽपि व्यक्तास्पर्शत्वात्, स्वयमेव हि बहिरन्तः स्फु टमनुभूयमानत्वेऽपि व्यक्तोपेक्षणेन प्रद्योतमानत्वाच्चाव्यक्तः रसरूपगन्धस्पर्शशब्द-संस्थानव्यक्तत्वाभावेऽपि स्वसंवेदनबलेन नित्यमात्मप्रत्यक्षत्वे सत्यनुमेयमात्रत्वाभावादलिंगग्रहणः; समस्तविप्रतिपत्तिप्रमाथिना विवेचकजनसमर्पितसर्वस्वेन सकलमपि लोकालोकं कवलीकृत्यात्यन्तसौहित्यमन्थरेणेव सकलकालमेव मनागप्यविचलितानन्यसाधारणतया स्वभावभूतेन
स्वयमनुभूयमानेन चेतनागुणेन नित्यमेवान्तःप्रकाशमानत्वात् चेतनागुणश्च; स खलु भगवानमलालोक इहैकष्टंकोत्कीर्णः प्रत्यग्ज्योतिर्जीवः ।

(कलश--मालिनी)
सकलमपि विहायाह्नाय चिच्छक्तिरिक्तं
स्फुटतरमवगाह्य स्वं च चिच्छक्तिमात्रम् ।
इममुपरि चरन्तं चारु विश्वस्य साक्षात्
कलयतु परमात्मात्मानमात्मन्यनन्तम् ॥३५॥


(कलश-३७ -- शालिनी)
चिच्छक्तिव्याप्तसर्वस्वसारो जीव इयानयम्
अतोऽतिरिक्ता: सर्वेऽपि भावा: पौद्गलिका अमी ॥३६॥



अब शिष्य पूछता है कि यह अध्यवसानादि भाव जीव नहीं हैं तो वह एक, टंकोत्कीर्ण, परमार्थ-स्वरूप जीव कैसा है ? उसका लक्षण क्या है ? इस प्रश्न का उत्तर कहते हैं :-

जीव
  1. निश्चय से पुद्गल-द्रव्य से भिन्न है इसलिए उसमें रस-गुण विद्यमान नहीं है अत: वह अरस है
  2. पुद्गल-द्रव्य के गुणों से भी भिन्न होने से स्वयं भी रसगुण नहीं है इसलिए अरस है
  3. परमार्थ से पुद्गल-द्रव्य का स्वामित्व भी उसके नहीं है इसलिए वह द्रव्येन्द्रिय के आलम्बन से भी रस नहीं चखता अत: अरस है
  4. अपने स्वभाव की दृष्टि से देखा जाये तो उसके क्षायोपशमिक भाव का भी अभाव होने से वह भावेन्द्रिय के आलम्बन से भी रस नहीं चखता इसलिये अरस है
  5. समस्त विषयों के विशेषों में साधारण ऐसे एक ही संवेदन-परिणामरूप उसका स्वभाव होने से वह केवल एक रस वेदना-परिणाम को पाकर रस नहीं चखता इसलिये अरस है
  6. (उसे समस्त ज्ञेयों का ज्ञान होता है परन्तु) सकल ज्ञेयज्ञायक के तादात्म्यका (एकरूप होने का) निषेध होने से रस के ज्ञानरूप में परिणमित होने पर भी स्वयं रसरूप परिणमित नहीं होता इसलिये अरस है
इसप्रकार छह तरह के रस के निषेध से वह अरस है ।

इसप्रकार, जीव
  1. वास्तव में पुद्गल-द्रव्य से अन्य होने के कारण उसमें रूपगुण विद्यमान नहीं है इसलिये अरूप है
  2. पुद्गल-द्रव्य के गुणों से भी भिन्न होने के कारण स्वयं भी रूपगुण नहीं है इसलिये अरूप है
  3. परमार्थ से पु्द्गल-द्रव्य का स्वामीपना भी उसे नहीं होने से वह द्रव्येन्द्रिय के आलम्बन द्वारा भी रूप नहीं देखता इसलिये अरूप है
  4. अपने स्वभाव की दृष्टि से देखने में आवे तो क्षायोपशमिक-भाव का भी उसे अभाव होने से वह भावेन्द्रिय के आलम्बन द्वारा भी रूप नहीं देखता इसलिये अरूप है
  5. सकल विषयों के विशेषों में साधारण ऐसे एक ही संवेदन-परिणाम रूप उसका स्वभाव होने से वह केवल एक रूप वेदना- परिणाम को प्राप्त होकर रूप नहीं देखता इसलिये अरूप है
  6. (उसे समस्त ज्ञेयों का ज्ञान होता है परन्तु ) सकल ज्ञेय-ज्ञायक के तादात्म्य का निषेध होने से रूप के ज्ञानरूप परिणमित होने पर भी स्वयं रूप-रूप से नहीं परिणमता इसलिये अरूप है
इसतरह छह प्रकार से रूप के निषेध से वह अरूप है ।

इसप्रकार, जीव
  1. वास्तव में पुद्गल-द्रव्य से अन्य होने के कारण उसमें गन्ध-गुण विद्यमान नहीं है इसलिए अगन्ध है
  2. पुद्गल-द्रव्य के गुणों से भी भिन्न होने के कारण स्वयं भी गन्ध-गुण नहीं है इसलिए अगन्ध है
  3. परमार्थ से पुद्गल-द्रव्य का स्वामीपना भी उसे नहीं होने से वह द्रव्येन्द्रिय के आलम्बन द्वारा भी गन्ध नहीं सूंघता इसलिए अगन्ध है
  4. अपने स्वभाव की दृष्टि से देखने में आवे तो क्षायोपशमिक भाव का भी उसे अभाव होने से वह भावेन्द्रिय के आलम्बन द्वारा भी गन्ध नहीं सूंघता अत: अगन्ध है
  5. सकल विषयों के विशेषों में साधारण ऐसा एक ही संवेदन-परिणाम-रूप उसका स्वभाव होने से वह केवल एक गन्ध-वेदना-परिणाम को प्राप्त होकर गन्ध नहीं सूंघता अत: अगन्ध है
  6. (उसे समस्त ज्ञेयों का ज्ञान होता है परन्तु) सकल ज्ञेय-ज्ञायक के तादात्म्य का निषेध होने से गन्ध के ज्ञानरूप परिणमित होने पर भी स्वयं गन्ध-रूप नहीं परिणमता अत: अगन्ध है
इसतरह छह प्रकार से गन्ध के निषेध से वह अगन्ध है ।

इसप्रकार, जीव
  1. वास्तव में पुद्गल द्रव्य से अन्य होने के कारण उसमें स्पर्श-गुण विद्यमान नही है इसलिए अस्पर्श है
  2. पुद्गल-द्रव्य के गुणों से भी भिन्न होने के कारण स्वयं भी स्पर्श-गुण नहीं है अत: अस्पर्श है
  3. परमार्थ से पुद्गल-द्रव्य का स्वामीपना भी उसे नहीं होने से वह द्रव्येन्द्रिय के आलम्बन द्वारा भी स्पर्श को नहीं स्पर्शता अत: अस्पर्श है
  4. अपने स्वभाव की दृष्टि से देखने में आवे तो क्षायोपशमिक भाव का भी उसे अभाव होने से वह भावेन्द्रिय के आलम्बन द्वारा भी स्पर्श को नहीं स्पर्शता अत: अस्पर्श है
  5. सकल विषयों के विशेषों में साधारण ऐसा एक ही संवेदन-परिणाम-रूप उसका स्वभाव होने से वह केवल एक स्पर्श-वेदना-परिणाम को प्राप्त होकर स्पर्श को नहीं स्पर्शता अत: अस्पर्श है
  6. (उसे समस्त ज्ञेयों का ज्ञान होता है परन्तु) सकल ज्ञेय-ज्ञायक के तादात्म्य का निषेध होने से स्पर्श के ज्ञान-रूप परिणमित होने पर भी स्वयं स्पर्श-रूप नहीं परिणमता अत: अस्पर्श है
इसतरह छह प्रकार से स्पर्श के निषेध से वह अस्पर्श है ।

इसप्रकार, जीव
  1. वास्तव में पुद्गल-द्रव्य से अन्य होने के कारण उसमें शब्द-पर्याय विद्यमान नहीं है अत: अशब्द है
  2. पुद्गल-द्रव्य की पर्यायों से भी भिन्न होने के कारण स्वयं भी शब्द पर्याय नहीं है अत: अशब्द है
  3. परमार्थ से पुद्गल-द्रव्य का स्वामीपना भी उसे नहीं होने से वह द्रव्येन्द्रिय के आलम्बन द्वारा भी शब्द नहीं सुनता अत: अशब्द है
  4. अपने स्वभाव की दृष्टि से देखने में आवे तो क्षायोपशमिक भाव का भी उसे अभाव होने से वह भावेन्द्रिय के आलम्बन द्वारा भी शब्द नहीं सुनता अत: अशब्द है
  5. सकल विषयों के विशेषों में साधारण ऐसे एक ही संवेदन-परिणाम-रूप उसका स्वभाव होने से वह केवल एक शब्द-वेदना-परिणाम को प्राप्त होकर शब्द नहीं सुनता अत: अशब्द है
  6. (उसे समस्त ज्ञेयों का ज्ञान होता है परन्तु) सकल ज्ञेय-ज्ञायक के तादात्म्य का निषेध होने से शब्द के ज्ञानरूप परिणमित होने पर भी स्वयं शब्दरूप नहीं परिणमता अत: अशब्द है
इसतरह छह प्रकार से शब्द के निषेध से वह अशब्द है ।

(अब 'अनिर्दिष्टसंस्थान' विशेषण को समझाते हैं:-)
  1. पुद्गल-द्रव्य-रचित शरीर के संस्थान (आकार) से जीव को संस्थान-वाला नहीं कहा जा सकता इसलिए जीव अनिर्दिष्ट-संस्थान है
  2. अपने नियत स्वभाव से अनियत संस्थानवाले अनन्त शरीरों में रहता है इसलिए अनिर्दिष्ट-संस्थान है
  3. संस्थान नामकर्म का विपाक (फल) पुद्गलों में ही कहा जाता है (इसलिए उसके निमित्त से भी आकार नहीं है) इसलिए अनिर्दिष्ट संस्थान है
  4. भिन्न-भिन्न संस्थान-रूप से परिणमित समस्त वस्तुओं के स्वरूप के साथ जिसकी स्वाभाविक संवेदन-शक्ति सम्बन्धित (अर्थात् तदाकार) है ऐसा होने पर भी जिसे समस्त लोक के मिलाप से (सम्बन्ध से) रहित निर्मल (ज्ञानमात्र) अनुभूति हो रही है ऐसा होने से स्वयं अत्यन्तरूप से संस्थान रहित है इसलिए अनिर्दिष्टसंस्थान है
इसप्रकार चार हेतुओं से संस्थान का निषेध कहा ।

(अब 'अव्यक्त' विशेषण को सिद्ध करते हैं:-)
  1. छह द्रव्य-स्वरूप लोक जो ज्ञेय है और व्यक्त है उससे जीव अन्य है इसलिए अव्यक्त है
  2. कषायों का समूह जो भावकभाव व्यक्त है उससे जीव अन्य है इसलिए अव्यक्त है
  3. चित्सामान्य में चैतन्य की समस्त व्यक्तियाँ निमग्न (अन्तर्भूत) हैं इसलिए अव्यक्त है
  4. क्षणिक व्यक्ति-मात्र नहीं है इसलिए अव्यक्त है
  5. व्यक्तता और अव्यक्तता एकमेक मिश्रित-रूप से प्रतिभासित होने पर भी वह केवल व्यक्तता को ही स्पर्श नहीं करता इसलिए अव्यक्त है
  6. स्वयं अपने से ही बाह्याभ्यन्तर स्पष्ट अनुभव में आ रहा है तथापि व्यक्तता के प्रति उदासीन-रूप से प्रकाशमान है इसलिए अव्यक्त है
इसप्रकार छह हेतुओं से अव्यक्तता सिद्ध की है ।

इसप्रकार रस, रूप, गन्ध, स्पर्श, शब्द, संस्थान और व्यक्तता का अभाव होने पर भी स्व-संवेदन के बल से स्वयं सदा प्रत्यक्ष होने से अनुमान-गोचर मात्रता के अभाव के कारण (जीव को) अलिङ्ग-ग्रहण कहा जाता है ।

अपने अनुभव में आनेवाले चेतना-गुण के द्वारा सदा अन्तरङ्ग में प्रकाशमान है इसलिए (जीव) चेतना-गुण-वाला है । वह चेतना-गुण समस्त विप्रतिपत्तियों को (जीव को अन्य-प्रकार से मानने-रूप झगड़ों को) नाश करने वाला है, जिसने अपना सर्वस्व भेद-ज्ञानी जीवों को सौंप दिया है, जो समस्त लोकालोक को ग्रासीभूत करके मानों अत्यन्त तृप्ति से उपशान्त हो गया हो इसप्रकार (अर्थात् अत्यन्त स्वरूप सौख्य से तृप्त तृप्त होने के कारण स्वरूप में से बाहर निकलने का अनुद्यमी हो इसप्रकार) सर्व-काल में किञ्चित्मात्र भी चलायमान नहीं होता और इसतरह सदा लेश-मात्र भी नहीं चलित अन्य-द्रव्य से असाधारणता होने से जो (असाधारण) स्वभाव-भूत है । ऐसा चैतन्य-रूप परमार्थ-स्वरूप जीव है । जिसका प्रकाश निर्मल है ऐसा यह भगवान इस लोक में एक, टङ्कोत्कीर्ण, भिन्न ज्योति-रूप विराजमान है ।

(कलश-३५ -- मालिनी)
चैतन्यशक्ति से रहित परभाव सब परिहार कर
चैतन्य-शक्ति से सहित निजभाव नित अवगाह कर
है श्रेष्ठतम जो विश्व में सुन्दर सहज शुद्धातमा
अब उसी का अनुभव करो तुम स्वयं हे भव्यातमा ॥३५॥
[चित्-शक्ति-रिक्तं] चित्शक्ति से रहित [सकलम् अपि] अन्य समस्त भावों को [अह्नाय] मूल से [विहाय] छोड़कर [] और [स्फुटतरम्] प्रगटरूप से [स्वं चित्-शक्तिमात्रम्] अपने चित्शक्तिमात्र भाव का [अवगाह्य] अवगाहन करके, [विश्वस्य उपरि] समस्त पदार्थसमूहरूप लोक के ऊपर [चारु चरन्तं] सुन्दर रीति से प्रवर्तमान ऐसे [इमम्] यह [परम्] एकमात्र [अनन्तम्] अविनाशी [आत्मानम्] आत्मा का [आत्मा] भव्यात्मा [आत्मनि] आत्मा में ही [साक्षात् कलयतु] अभ्यास करो, साक्षात् अनुभव करो ।

(कलश-३७ -- शालिनी)
चित् शक्ति सर्वस्व जिन, केवल वे हैं जीव
उन्हें छोडकर और सब, पुद्गलमयी अजीव ॥३६॥
[चित्-शक्ति-व्याप्त-सर्वस्व-सार:] चैतन्य-शक्ति से व्याप्त जिसका सर्वस्व-सार है ऐसा [अयम् जीव:] यह जीव [इयान्] इतना मात्र ही है; [अत: अतिरिक्ता:] इस चित्शक्ति से शून्य [अमी भावा:] जो ये भाव हैं [सर्वे अपि] वे सभी [पौद्गलिका:] पुद्गल-जन्य हैं -- पुद्गल के ही हैं ॥३६॥
जयसेनाचार्य :

[अरसमरूवमगंधं अव्वत्तं चेदणागुणमसं] निश्चय-नय से रस, रूप, गन्ध, स्पर्श एवं शब्द-रहित और मनोगत काम-क्रोध आदि विकल्प-रहित होने से अव्यक्त, सूक्ष्म है । और भी क्या विशेषता है ? शुद्ध चेतना गुण-वाला है । और किस रूप है ? [जाण-अलिंगग्गहणं-जीवमणि टि्ठसंठाणं] निश्चय-नय से स्व-संवेदन का विषय होने से अलिङ्ग-ग्रहण स्वरूप वाला है और समचतुरस्र आदि छह संस्थानों से रहित है, ऐसा जो पदार्थ [आत्मा] है, उन गुणों वाले, शुद्धात्मा को ही हे शिष्य ! उपादेय जानो ।

इसका तात्पर्य यह है कि शुद्ध-निश्चय-नय से पुद्गल-द्रव्य सम्बन्धी वर्णादि गुण और शब्दादि सभी पर्यायों से रहित, सभी भावेन्द्रियों तथा मनोगत विकल्पों से रहित, धर्म, अधर्म, आकाश, काल तथा अन्य-जीवों से भिन्न और अनन्त-दर्शन, ज्ञान, सुख, वीर्यवाला जो शुद्धात्मा है, वह शुद्धात्मा समस्त पदार्थ, सर्व-देश तथा काल, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि नाना वर्ण-भेद से भिन्न, लोगों के समस्त मन, वचन, काय के व्यापारों में यह शुद्धात्मा दुर्लभ है । वह शुद्धात्मा अपूर्व है, उपादेय है ऐसा जानकर निर्विकार निर्मोह, निरञ्जन, निज-शुद्धात्म समाधि से प्रगट होने वाले सुखामृत रस की अनुभूति लक्षणवाले एवं गिरि-गुफा दराररूप एकान्त स्थान में स्थिर होकर शुद्धात्मानुभव करना चाहिए । इसतरह यह गाथा पूर्ण हुई ॥५४॥
notes :

प्रवचनसार - १७२,

नियमसार ४६,

पंचास्तिकाय १२७

अष्टपाहुड़ (भावपाहुड़) ६४

धवल के तीसरे भाग

पद्नन्दी पंचविंशतिका

द्रव्यसंग्रह