
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
यद्येवं तर्हि किंलक्षणोऽसावेकष्टङ्कोत्कीर्णः परमार्थजीव इति पृष्टः प्राह — यः खलु पुद्गलद्रव्यादन्यत्वेनाविद्यमानरसगुणत्वात्, पुद्गलद्रव्यगुणेभ्यो भिन्नत्वेनस्वयमरसगुणत्वात्, परमार्थतः पुद्गलद्रव्यस्वामित्वाभावाद द्रव्येन्द्रियावष्टम्भेनारसनात्, स्वभावतः क्षायोपशमिकभावाभावाद्भावेन्द्रियावलम्बेनारसनात्, सकलसाधारणैकसंवेदनपरिणामस्वभावत्वात् केवलरसवेदनापरिणामापन्नत्वेनारसनात्, सकलज्ञेयज्ञायकतादात्म्यस्य निषेधाद्रसपरिच्छेदपरिणत-त्वेऽपि स्वयं रसरूपेणापरिणमनाच्चारसः; तथा पुद्गलद्रव्यादन्यत्वेनाविद्यमानरूपगुणत्वात्, पुद्गलद्रव्यगुणेभ्यो भिन्नत्वेन स्वयमरूपगुणत्वात्, परमार्थतः पुद्गलद्रव्यस्वामित्वाभावाद् द्रव्येन्द्रियावष्टंभेनारूपणात्, स्वभावतः क्षायोपशमिकभावाभावाद्भावेन्द्रियावलंबेनारूपणात्, सकलसाधारणैकसंवेदनपरिणामस्वभावत्वात्केवलरूपवेदनापरिणामापन्नत्वेनारूपणात्, सकलज्ञेय- ज्ञायकतादात्म्यस्य निषेधाद्रूपपरिच्छेदपरिणतत्वेऽपि स्वयं रूपरूपेणापरिणमनाच्चारूपः; तथा पुद्गलद्रव्यादन्यत्वेनाविद्यमानगन्धगुणत्वात्, पुद्गलद्रव्यगुणेभ्यो भिन्नत्वेन स्वयमगन्धगुणत्वात्, परमार्थतः पुद्गलद्रव्यस्वामित्वाभावाद् द्रव्येन्द्रियावष्टंभेनागंधनात्, स्वभावतः क्षायोपशमिकभावा- भावाद्भावेन्द्रियावलंबेनागन्धनात्, सकलसाधारणैकसंवेदनपरिणामस्वभावत्वात्केवलगन्धवेदना-परिणामापन्नत्वेनागन्धनात्, सकलज्ञेयज्ञायकतादात्म्यस्य निषेधाद्गन्धपरिच्छेदपरिणतत्वेऽपि स्वयं गन्धरूपेणापरिणमनाच्चागन्धः; तथा पुद्गलद्रव्यादन्यत्वेनाविद्यमानस्पर्शगुणत्वात्, पुद्गलद्रव्यगुणेभ्यो भिन्नत्वेन स्वयमस्पर्शगुणत्वात्, परमार्थतः पुद्गलद्रव्यस्वामित्वाभावाद् द्रव्येन्द्रियावष्टम्भेनास्पर्शनात्, स्वभावतः क्षायोपशमिकभावाभावाद्भावेन्द्रियावलम्बेनास्पर्शनात्, सकलसाधारणैकसंवेदनपरिणाम-स्वभावत्वात्केवलस्पर्शवेदनापरिणामापन्नत्वेनास्पर्शनात्, सकलज्ञेयज्ञायकतादात्म्यस्य निषेधात्त् स्पर्शपरिच्छेदपरिणतत्वेऽपि स्वयं स्पर्शरूपेणापरिणमनाच्चास्पर्शः; तथा पुद्गलद्रव्यादन्यत्वेनाविद्यमान- शब्दपर्यायत्वात्, पुद्गलद्रव्यपर्यायेभ्यो भिन्नत्वेन स्वयमशब्दपर्यायत्वात्, परमार्थतः पुद्गलद्रव्य-स्वामित्वाभावाद् द्रव्येन्द्रियावष्टंभेन शब्दाश्रवणात्, स्वभावतः क्षायोपशमिकभावाभावाद्भावे-न्द्रियावलंबेन शब्दाश्रवणात्, सकलसाधारणैक संवेदनपरिणामस्वभावत्वात्केवलशब्दवेदना-परिणामापन्नत्वेन शब्दाश्रवणात्, सकलज्ञेयज्ञायकतादात्म्यस्य निषेधाच्छब्दपरिच्छेदपरिणतत्वेऽपि स्वयं शब्दरूपेणापरिणमनाच्चाशब्दः; द्रव्यान्तरारब्धशरीरसंस्थानेनैव संस्थान इति निर्देष्टमशक्यत्वात्, नियतस्वभावेनानियतसंस्थानानन्तशरीरवर्तित्वात्, संस्थाननामकर्मविपाकस्य पुद्गलेषु निर्दिश्यमानत्वात्, प्रतिविशिष्टसंस्थानपरिणतसमस्तवस्तुतत्त्वसंवलितसहजसंवेदनशक्तित्वेऽपि स्वयमखिललोक-संवलनशून्योपजायमाननिर्मलानुभूतितयात्यन्तमसंस्थानत्वाच्चानिर्दिष्टसंस्थानः; षड्द्रव्यात्मकलोकाज्ज्ञेयाद्वयक्तादन्यत्वात्, कषायचक्राद् भावकाद्वयक्तादन्यत्वात्, चित्सामान्यनिमग्नसमस्तव्यक्तित्वात्, क्षणिकव्यक्तिमात्राभावात्, व्यक्ताव्यक्तविमिश्रप्रतिभासेऽपि व्यक्तास्पर्शत्वात्, स्वयमेव हि बहिरन्तः स्फु टमनुभूयमानत्वेऽपि व्यक्तोपेक्षणेन प्रद्योतमानत्वाच्चाव्यक्तः रसरूपगन्धस्पर्शशब्द-संस्थानव्यक्तत्वाभावेऽपि स्वसंवेदनबलेन नित्यमात्मप्रत्यक्षत्वे सत्यनुमेयमात्रत्वाभावादलिंगग्रहणः; समस्तविप्रतिपत्तिप्रमाथिना विवेचकजनसमर्पितसर्वस्वेन सकलमपि लोकालोकं कवलीकृत्यात्यन्तसौहित्यमन्थरेणेव सकलकालमेव मनागप्यविचलितानन्यसाधारणतया स्वभावभूतेन स्वयमनुभूयमानेन चेतनागुणेन नित्यमेवान्तःप्रकाशमानत्वात् चेतनागुणश्च; स खलु भगवानमलालोक इहैकष्टंकोत्कीर्णः प्रत्यग्ज्योतिर्जीवः । (कलश--मालिनी) सकलमपि विहायाह्नाय चिच्छक्तिरिक्तं स्फुटतरमवगाह्य स्वं च चिच्छक्तिमात्रम् । इममुपरि चरन्तं चारु विश्वस्य साक्षात् कलयतु परमात्मात्मानमात्मन्यनन्तम् ॥३५॥ (कलश-३७ -- शालिनी) चिच्छक्तिव्याप्तसर्वस्वसारो जीव इयानयम् अतोऽतिरिक्ता: सर्वेऽपि भावा: पौद्गलिका अमी ॥३६॥ अब शिष्य पूछता है कि यह अध्यवसानादि भाव जीव नहीं हैं तो वह एक, टंकोत्कीर्ण, परमार्थ-स्वरूप जीव कैसा है ? उसका लक्षण क्या है ? इस प्रश्न का उत्तर कहते हैं :- जीव
इसप्रकार, जीव
इसप्रकार, जीव
इसप्रकार, जीव
इसप्रकार, जीव
(अब 'अनिर्दिष्टसंस्थान' विशेषण को समझाते हैं:-)
(अब 'अव्यक्त' विशेषण को सिद्ध करते हैं:-)
इसप्रकार रस, रूप, गन्ध, स्पर्श, शब्द, संस्थान और व्यक्तता का अभाव होने पर भी स्व-संवेदन के बल से स्वयं सदा प्रत्यक्ष होने से अनुमान-गोचर मात्रता के अभाव के कारण (जीव को) अलिङ्ग-ग्रहण कहा जाता है । अपने अनुभव में आनेवाले चेतना-गुण के द्वारा सदा अन्तरङ्ग में प्रकाशमान है इसलिए (जीव) चेतना-गुण-वाला है । वह चेतना-गुण समस्त विप्रतिपत्तियों को (जीव को अन्य-प्रकार से मानने-रूप झगड़ों को) नाश करने वाला है, जिसने अपना सर्वस्व भेद-ज्ञानी जीवों को सौंप दिया है, जो समस्त लोकालोक को ग्रासीभूत करके मानों अत्यन्त तृप्ति से उपशान्त हो गया हो इसप्रकार (अर्थात् अत्यन्त स्वरूप सौख्य से तृप्त तृप्त होने के कारण स्वरूप में से बाहर निकलने का अनुद्यमी हो इसप्रकार) सर्व-काल में किञ्चित्मात्र भी चलायमान नहीं होता और इसतरह सदा लेश-मात्र भी नहीं चलित अन्य-द्रव्य से असाधारणता होने से जो (असाधारण) स्वभाव-भूत है । ऐसा चैतन्य-रूप परमार्थ-स्वरूप जीव है । जिसका प्रकाश निर्मल है ऐसा यह भगवान इस लोक में एक, टङ्कोत्कीर्ण, भिन्न ज्योति-रूप विराजमान है । (कलश-३५ -- मालिनी)
[चित्-शक्ति-रिक्तं] चित्शक्ति से रहित [सकलम् अपि] अन्य समस्त भावों को [अह्नाय] मूल से [विहाय] छोड़कर [च] और [स्फुटतरम्] प्रगटरूप से [स्वं चित्-शक्तिमात्रम्] अपने चित्शक्तिमात्र भाव का [अवगाह्य] अवगाहन करके, [विश्वस्य उपरि] समस्त पदार्थसमूहरूप लोक के ऊपर [चारु चरन्तं] सुन्दर रीति से प्रवर्तमान ऐसे [इमम्] यह [परम्] एकमात्र [अनन्तम्] अविनाशी [आत्मानम्] आत्मा का [आत्मा] भव्यात्मा [आत्मनि] आत्मा में ही [साक्षात् कलयतु] अभ्यास करो, साक्षात् अनुभव करो ।चैतन्यशक्ति से रहित परभाव सब परिहार कर चैतन्य-शक्ति से सहित निजभाव नित अवगाह कर है श्रेष्ठतम जो विश्व में सुन्दर सहज शुद्धातमा अब उसी का अनुभव करो तुम स्वयं हे भव्यातमा ॥३५॥ (कलश-३७ -- शालिनी)
[चित्-शक्ति-व्याप्त-सर्वस्व-सार:] चैतन्य-शक्ति से व्याप्त जिसका सर्वस्व-सार है ऐसा [अयम् जीव:] यह जीव [इयान्] इतना मात्र ही है; [अत: अतिरिक्ता:] इस चित्शक्ति से शून्य [अमी भावा:] जो ये भाव हैं [सर्वे अपि] वे सभी [पौद्गलिका:] पुद्गल-जन्य हैं -- पुद्गल के ही हैं ॥३६॥
चित् शक्ति सर्वस्व जिन, केवल वे हैं जीव उन्हें छोडकर और सब, पुद्गलमयी अजीव ॥३६॥ |
जयसेनाचार्य :
[अरसमरूवमगंधं अव्वत्तं चेदणागुणमसं] निश्चय-नय से रस, रूप, गन्ध, स्पर्श एवं शब्द-रहित और मनोगत काम-क्रोध आदि विकल्प-रहित होने से अव्यक्त, सूक्ष्म है । और भी क्या विशेषता है ? शुद्ध चेतना गुण-वाला है । और किस रूप है ? [जाण-अलिंगग्गहणं-जीवमणि टि्ठसंठाणं] निश्चय-नय से स्व-संवेदन का विषय होने से अलिङ्ग-ग्रहण स्वरूप वाला है और समचतुरस्र आदि छह संस्थानों से रहित है, ऐसा जो पदार्थ [आत्मा] है, उन गुणों वाले, शुद्धात्मा को ही हे शिष्य ! उपादेय जानो । इसका तात्पर्य यह है कि शुद्ध-निश्चय-नय से पुद्गल-द्रव्य सम्बन्धी वर्णादि गुण और शब्दादि सभी पर्यायों से रहित, सभी भावेन्द्रियों तथा मनोगत विकल्पों से रहित, धर्म, अधर्म, आकाश, काल तथा अन्य-जीवों से भिन्न और अनन्त-दर्शन, ज्ञान, सुख, वीर्यवाला जो शुद्धात्मा है, वह शुद्धात्मा समस्त पदार्थ, सर्व-देश तथा काल, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि नाना वर्ण-भेद से भिन्न, लोगों के समस्त मन, वचन, काय के व्यापारों में यह शुद्धात्मा दुर्लभ है । वह शुद्धात्मा अपूर्व है, उपादेय है ऐसा जानकर निर्विकार निर्मोह, निरञ्जन, निज-शुद्धात्म समाधि से प्रगट होने वाले सुखामृत रस की अनुभूति लक्षणवाले एवं गिरि-गुफा दराररूप एकान्त स्थान में स्थिर होकर शुद्धात्मानुभव करना चाहिए । इसतरह यह गाथा पूर्ण हुई ॥५४॥ |
notes :
प्रवचनसार - १७२, नियमसार ४६, पंचास्तिकाय १२७ अष्टपाहुड़ (भावपाहुड़) ६४ धवल के तीसरे भाग पद्नन्दी पंचविंशतिका द्रव्यसंग्रह |