
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
संसारावस्थायामेव जीवस्य वर्णादितादात्म्यमित्यभिनिवेशेऽप्ययमेव दोषः - यस्य तु संसारावस्थायां जीवस्य वर्णादितादात्म्यमस्तीत्यभिनिवेशस्तस्य तदानीं स जीवोरूपित्वमवश्यमवाप्नोति । रूपित्वं च शेषद्रव्यासाधारणं कस्यचिद् द्रव्यस्य लक्षणमस्ति । ततोरूपित्वेन लक्ष्यमाणं यत्किञ्चिद्भवति स जीवो भवति । रूपित्वेन लक्ष्यमाणं पुद्गलद्रव्यमेव भवति ।एवं पुद्गलद्रव्यमेव स्वयं जीवो भवति, न पुनरितरः कतरोऽपि । तथा च सति, मोक्षावस्थायामपिनित्यस्वलक्षणलक्षितस्य द्रव्यस्य सर्वास्वप्यवस्थास्वनपायित्वादनादिनिधनत्वेन पुद्गलद्रव्यमेव स्वयं जीवो भवति, न पुनरितरः कतरोऽपि । तथा च सति, तस्यापि पुद्गलेभ्यो भिन्नस्य जीवद्रव्यस्याभावाद्भवत्येव जीवाभावः । फिर, जिसका यह अभिप्राय है कि संसार अवस्था में जीव का वर्णादिभावों के साथ तादात्म्य-सम्बन्ध है, उसके मत में संसार-अवस्था के समय वह जीव अवश्य रूपित्व को प्राप्त होता है; और रूपित्व तो किसी द्रव्य का, शेष द्रव्यों से असाधारण ऐसा लक्षण है, इसलिए रूपित्व (लक्षण) से लक्षित (लक्षय-रूप होता हुआ) जो कुछ हो वही जीव है । रूपित्व से लक्षित तो पुद्गल-द्रव्य ही है । इसप्रकार पुद्गल-द्रव्य ही स्वयं जीव है, किन्तु उसके अतिरिक्त दूसरा कोई जीव नहीं है । ऐसा होने पर, मोक्ष-अवस्था में भी पुद्गल-द्रव्य ही स्वयं जीव (सिद्ध होता) है, किन्तु उसके अतिरिक्त अन्य कोई जीव (सिद्ध होता) नहीं; क्योंकि सदा अपने स्व-लक्षण से लक्षित ऐसा द्रव्य सभी अवस्थाओं में हानि अथवा ह्रासको न प्राप्त होने से अनादि अनन्त होता है । ऐसा होने से, उसके मत में भी (संसार-अवस्था में ही जीव का वर्णादि के साथ तादात्म्य माननेवाले के मत में भी) पुद्गलों से भिन्न ऐसा कोई जीवद्रव्य न रहने से जीव का अवश्य अभाव होता है । |
जयसेनाचार्य :
[जदि संसारत्थाणं जीवाणंतुज्झ होंति वण्णादि] संसार अवस्था में स्थित जीवों के पुद्गल की तरह ही वर्णादि गुण हैं, यदि तेरे मत या अभिप्राय से एकान्त मान लिया जाये [तम्हा संसारत्था जीवा रूवित्तमावणा] तो संसार में स्थित जीवों के अमूर्त अनन्त ज्ञानादि चतुष्टय लक्षण छोड़कर, शुक्ल कृष्ण आदि लक्षणवाले मूर्तिकपने को प्राप्त होते हैं यह दोष प्राप्त होता है । [एवं पुग्गलदव्वं जीवो लक्खणेणमूढ़मदी] हे मूढ़मति जीव ! तेरे अभिप्राय से पूर्वोक्त प्रकार से जीव के रूपीपना होने पर पुद्गलद्रव्य ही जीव है, इससे भिन्न विशुद्ध चैतन्य चमत्कार वाला जीव कोई अन्य नहीं ठहरा । इतना ही नहीं कि संसार अवस्था में पुद्गल ही जीवपने को प्राप्त हुआ । [णिव्वाणमुवगदो वि य जीवत्तं पुग्गलो पत्तो] अपितु मोक्ष को प्राप्त होने पर भी पुद्गल ही जीवपने को प्राप्त हुआ, इससे अन्य कोई भी चिद्रूप जीव (मोक्ष में) नहीं रहा । प्रश्न – किस कारण से चिद्रूप जीव नहीं रहा ? उत्तर – क्योंकि वर्णादि का तादात्म्य पुद्गल के साथ है, इसका निषेध अशक्य होने से जीव का अभाव (सिद्ध) हुआ । विशेष यह कि संसार अवस्था में एकान्त से जीव का वर्णादि के साथ तादात्म्य होने पर मोक्ष ही घटित नहीं होता । प्रश्न – क्यों घटित नहीं होता है ? उत्तर – क्योंकि केवलज्ञान आदि चतुष्टय की व्यक्ति (प्रगट) रूप कार्य समयसार की मोक्ष संज्ञा है और जीव को पुद्गलपना प्राप्त होने से सम्भव नहीं है, ऐसा भावार्थ है । इस प्रकार वर्णादि का जीव के साथ तादात्म्य मानने पर जीव के अभावरूप दोष प्राप्त होता है, इस प्रकार तीन गाथाएं पूर्ण हुईं ॥६८-६९॥ |