
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ व्यवहारं दर्शयति - यथान्तर्व्याप्यव्यापकभावेन मृत्तिकया कलशे क्रियमाणे भाव्यभावकभावेन मृत्तिकयैवा-नुभूयमाने च बहिर्व्याप्यव्यापकभावेन कलशसम्भवानुकूलं व्यापारं कुर्वाणः कलशकृततोयोपयोगजां तृप्तिं भाव्यभावकभावेनानुभवंश्च कुलालः कलशं करोत्यनुभवति चेति लोकानामनादिरूढोऽस्ति तावद् व्यवहारः, तथान्तर्व्याप्यव्यापकभावेन पुद्गलद्रव्येण कर्मणि क्रियमाणे भाव्यभावकभावेन पुद्गलद्रव्येणैवानुभूयमाने च बहिर्व्याप्यव्यापकभावेनाज्ञानात्पुद्गलकर्मसम्भवानुकूलं परिणामं कुर्वाणः पुद्गलकर्मविपाकसम्पादितविषयसन्निधिप्रधावितां सुखदुःखपरिणतिं भाव्यभावकभावेनानुभवंश्च जीवः पुद्गलकर्म करोत्यनुभवति चेत्यज्ञानिनामासंसारप्रसिद्धोऽस्ति तावद् व्यवहारः । जैसे अन्तर्व्याप्य-व्यापक-भाव से मिट्टी घड़े को करती है तथा भाव्य-भावक-भाव से मिट्टी घड़े को भोगती है तो भी बाह्य व्याप्य-व्यापक-भाव से कलष होने के अनुकूल व्यापार को अपने हस्तादिक से करने वाला तथा कलष में भरे जल के उपयोग से हुए तृप्तिभाव को भाव्य-भावक भाव से अनुभव करने वाला कुम्हार इस कलष को बनाता तथा भोगता है, ऐसा लोकों का अनादि से प्रसिद्ध व्यवहार रहा है । उसी प्रकार अन्तर्व्याप्यापक-भाव से पुद्गल-द्रव्य पौद्गलिक कर्म को करता है और भाव्य-भावक भाव से पुद्गल-द्रव्य ही उस कर्म को अनुभवता (भोगता) है तो भी बाह्य व्याप्य-व्यापक-भाव से अज्ञान से पुद्गल कर्म के होने के अनुकूल अपने रागादि परिणाम को करता हुआ और पुद्गल-कर्म के उदय होने से उत्पन्न विषयों की समीपता में होने वाली अपनी सुख-दुःख-रूप परिणति को भाव्य-भावक-भाव से अनुभव करने वाला जीव पुद्गलकर्म को करता है और भोगता है । ऐसा अज्ञानी लोकों का अनादिसंसार से व्यवहार प्रसिद्ध है । |
जयसेनाचार्य :
[ववहारस्स दु आदा पोग्गलकम्मं करेदि णेयविहं] जैसा देखने में आता है कि घड़े का उपादान-कारण मिट्टी का पिण्ड है उसी का घड़ा बनता है तथापि घडे को बनाने वाला कुम्हार है और जल धारण करना, उसका मूल्य लेना आदि फल का भोक्ता भी वही कुम्हार है, ऐसा अनादिकाल से लोगों का व्यवहार चला आ रहा है । वैसा ही उपादान-रूप से कर्मों का पैदा करनेवाला भी कार्माण-वर्गणा योग्य पुद्गल-द्रव्य है, जो अनेक प्रकार के मूल-उत्तर प्रकृति भेद लिए हुए नाना प्रकार ज्ञानावरणादि पुद्गल-कर्म हैं उसका करने वाला व्यवहार-नय से आत्मा है, ऐसा समझा जाता है । [तं चेव य वेदयदे पुग्गलकम्मं अणेयविहं] और उदय में आये हुए उसी अनेक प्रकार के पौदगलिक कर्मों को व अनिष्ट जो पंचेन्द्रिय के विषय उनके रूप में आत्मा अनुभवन करने वाला होता है, ऐसा अन्य विषय से रहित शुद्धात्मा के उपलम्भ से समुत्पन्न जो सुखामृत रस उसके आस्वाद से रहित रहने वाले अज्ञानी लोगों का अनादि काल का व्यवहार चला आता है ॥९०॥ ज्ञानी जीव का विशेष व्याख्यान करने के लिए ग्यारह गाथाओं द्वारा दूसरा अधिकार पूर्ण हुआ । इसके पश्चात् २५ गाथाओं पर्यन्त चेतन और अचेतन इन दोनों का एक ही उपादान कर्ता है ऐसा कहने वाले द्विक्रियावादियों का निराकरण करते हुए
पहले कर्म का कर्त्तापन और भोक्तापन के बारे में जो नय विभाग कहा गया है वह अनेकांत सम्मत है । किन्तु एकान्त-नय से जो ऐसा मानता है कि यह जीव भावकर्म-राग-द्वेषादि को जैसे करता है वैसे ही निश्चय से द्रव्य-कर्मों को भी करता है । इस प्रकार चेतन और अचेतन कार्यों का एक ही उपादान कारण है -- ऐसी द्विक्रियावादियों की मान्यता को दूषित बतलाते हैं -- |