
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
ज्ञानात्तु न कर्म प्रभवतीत्याह - अयं किल ज्ञानादात्मा परात्मनोः परस्परविशेषनिर्ज्ञाने सति परमात्मानमकुर्वन्नात्मानं चपरमकुर्वन्स्वयं ज्ञानमयीभूतः कर्मणामकर्ता प्रतिभाति । तथा हि - तथाविधानुभवसम्पादनसमर्थायाःरागद्वेषसुखदुःखादिरूपायाः पुद्गलपरिणामावस्थायाः शीतोष्णानुभवसम्पादनसमर्थायाः शीतोष्णायाः पुद्गलपरिणामावस्थाया इव पुद्गलादभिन्नत्वेनात्मनो नित्यमेवात्यन्तभिन्नायास्तन्निमित्ततथाविधानुभवस्य चात्मनोऽभिन्नत्वेन पुद्गलान्नित्यमेवात्यन्तभिन्नस्य ज्ञानात्परस्परविशेषनिर्ज्ञाने सति नानात्वविवेकाच्छीतोष्णरूपेणेवात्मना परिणमितुमशक्येन रागद्वेषसुखदुःखादिरूपेणाज्ञानात्मना मनागप्यपरिणममानो ज्ञानस्य ज्ञानत्वं प्रकटीकुर्वन् स्वयं ज्ञानमयीभूतः एषोऽहं जानाम्येव, रज्यते तु पुद्गल इत्यादिविधिना समग्रस्यापि रागादेः कर्मणो ज्ञानविरुद्धस्याकर्ता प्रतिभाति । यह जीव ज्ञान से पर का और अपना परस्पर भेद-ज्ञान होने से पर को तो आत्म-रूप नहीं करता हुआ और अपने को पर-रूप नहीं करता हुआ आप ज्ञानी हुआ कर्मों का अकर्ता प्रतिभासित होता है । उसी को स्पष्ट करते हैं -- जैसे शीत-उष्ण अनुभव कराने में समर्थ शीत-उष्ण-स्वरूप पुद्गल-परिणाम की अवस्था पुद्गल से अभिन्न होने के कारण आत्मा से नित्य ही अत्यंत भिन्न है, उसी प्रकार राग-द्वेष सुख-दुःखादिरूप अनुभव कराने में समर्थ राग-द्वेष सुख-दुःखादिरूप पुद्गल-परिणाम की अवस्था पुद्गल से अभिन्न होने के कारण आत्मा से नित्य ही, अत्यंत भिन्न है, तथा ऐसी पुद्गल-विपाक अवस्था के निमित्त से हुआ उस प्रकार का अनुभव आत्मा से अभिन्नता के कारण पुद्गल से अत्यंत सदा ही भिन्न है । ऐसी दोनों की भिन्नता के ज्ञान से परस्पर विशेष का भेद-ज्ञान होने पर नानात्व के विवेक से, जैसे शीत-उष्ण रूप आत्मा स्वयं परिणमन में असमर्थ है, उसी प्रकार राग-द्वेष सुख-दुःखादिरूप भी स्वयं परिणमन करने में असमर्थ है । इस प्रकार अज्ञान-स्वरूप जो राग-द्वेष सुख-दुःखादिक उन रूप से न परिणमन करता, ज्ञान के ज्ञानत्व को प्रकट करता, ज्ञान-मय हुआ ज्ञानी ऐसा जानता है कि 'यह मैं राग-द्वेषादिक को जानता ही हूं और ये पुद्गल रागरूप होते हैं' । इत्यादि विधान से सर्व ही ज्ञान-विरुद्ध रागादिक-कर्म का अकर्ता प्रतिभासित होता है । |
जयसेनाचार्य :
आगे कहते हैं कि वीतराग-स्वसंवेदन के प्रभाव से कर्मों का बंध नहीं होता -- [परं] बाह्य में देहादिक और अभ्यन्तर में रागादिक रूप जो पर-द्रव्य हैं अथवा द्रव्य-कर्म और भाव-कर्म रूप जो पर द्रव्य हैं उनको [अप्पाणमकुव्वं] अपने भेद-विज्ञान के बल से नहीं अपनाता है -- उनसे किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखता है [अप्पाणं पि य परं अकुव्वंतो] और शुद्ध -- द्रव्य, गुण और पर्याय-स्वरूप-आत्मा को पर-रूप विकारी नहीं करता है, [सो णाणमओ जीवो कम्माणमकारगो होदि] निर्मल-आत्मा की अनुभूति ही है लक्षण जिसका ऐसे भेद-विज्ञान-वाला जीव कर्मों का उत्पन्न करने वाला नहीं होता । जैसे कोई पुरुष शीत-उष्ण रूप पुदुगल-परिणाम की अवस्था का तथा उससे होने वाले शीतोष्ण रूप अनुभव का और आत्मा का भेद-ज्ञान रखने के कारण से 'मैं शीतरूप हूँ या उष्णरूप हूँ' इस परिणति का कर्ता नहीं होता है । वैसे ही निज शुद्धात्मा की अनुभूति से भिन्न स्वरूप जो पुद्गल-परिणाम की अवस्था तथा उसके निमित्त से होनेवाले सुख या दुख के अनुभव का और अपने शुद्ध-आत्मा की भावना से उत्पन्न सुख के अनुभव का भेद-ज्ञान का अभ्यास रखने के कारण पर और आत्मा का भेद ज्ञान होने पर राग-द्वेष-मोहरूप परिणाम को नहीं करता है वह नूतन कर्मों का कर्ता नहीं होता है । इससे यह बात सिद्ध हुई कि ज्ञान से कर्मों का बंध नहीं होता है ॥१००॥ |