
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
यत्किल क्रोधोऽहमित्यादिवद्धर्मोऽहमित्यादिवच्च परद्रव्याण्यात्मीकरोत्यात्मानमपि परद्रव्यीकरोत्येवमात्मा, तदयमशेषवस्तुसंबंधविधुरनिरवधिविशुद्धचैतन्यधातुमयोऽप्यज्ञानादेव सविकार-सोपाधीकृतचैतन्यपरिणामतया तथाविधस्यात्मभावस्य कर्ता प्रतिभातीत्यात्मनो भूताविष्टध्यानाविष्टस्येव प्रतिष्ठितं कर्तृत्वमूलमज्ञानम् । तथा हि यथा खलु भूताविष्टोऽज्ञानाद्भूतात्मानावेकीकुर्वन्नमानुषोचितविशिष्टचेष्टावष्टंभ-निर्भरभयंकरारंभगंभीरामानुषव्यवहारतया तथाविधस्य भावस्य कर्ता प्रतिभाति, तथायमात्माप्य-ज्ञानादेव भाव्यभावकौ परात्मानावेकीकुर्वन्नविकारानुभूतिमात्रभावकानुचितविचित्रभाव्य-क्रोधादिविकारकरम्बितचैतन्यपरिणामविकारतया तथाविधस्य भावस्य कर्ता प्रतिभाति । यथा वाऽपरीक्षकाचार्यादेशेन मुग्ध: कश्चिन्महिषध्यानाविष्टोऽज्ञानान्महिषात्मानावेकीकुर्वन्नात्मन्यभ्रङ्कषविषाणमहामहिषत्वाध्यासात्प्रच्युतमानुषोचितापवरकद्वारविनिस्सरणतया तथाविधस्य भावस्य कर्ता प्रतिभाति, तथायमात्माऽप्यज्ञानाद् ज्ञेयज्ञायकौ परात्मानावेकीकुर्वन्नात्मनि परद्रव्या-ध्यासान्नोइन्द्रियविषयीकृतधर्माधर्माकाशकालपुद्गलजीवांतरनिरुद्धशुद्धचैतन्यधातुतया तथेन्द्रियविषयीकृतरूपिपदार्थतिरोहितकेवलबोधतया मृतककलेवरमूर्च्छितपरमामृतविज्ञानघनतया च तथाविधस्य भावस्य कर्ता प्रतिभाति ॥९६॥ यह आत्मा मैं क्रोध हूं, मैं धर्म-द्रव्य हूं इत्यादि पूर्वोक्त प्रकार से पर-द्रव्यों को आत्म-रूप करता है और अपने को पर-द्रव्य-रूप करता है, ऐसा यह आत्मा यद्यपि समस्त वस्तु के सम्बन्ध से रहित अमर्याद-रूप शुद्ध चैतन्य धातुमय है तो भी अज्ञान से सविकार सोपाधिरूप किये अपने चैतन्य परिणामरूप से उस प्रकार का अपने परिणाम का कर्ता प्रतिभासित होता है । इस प्रकार आत्मा के भूताविष्ट पुरुष की भांति तथा ध्यानाविष्ट पुरुष की भांति कर्तापने का मूल अज्ञान प्रतिष्ठित हुआ । यही अब स्पष्ट करते हैं -- भूताविष्ट पुरुष (अपने शरीर में भूत प्रवेश किया हुआ) अज्ञान से भूत को और अपने को एक-रूप करता हुआ जैसी मनुष्य के योग्य चेष्टा न हो, वैसी चेष्टा के आलम्बन रूप अत्यन्त भयकारी आरंभ से भरा अमानुष व्यवहार से उस प्रकार चेष्टा-रूप भाव का कर्ता प्रतिभासित होता है, उसी प्रकार यह आत्मा भी अज्ञान से ही पर और आत्मा को भाव्य-भावकरूप एक करता हुआ निर्विकार अनुभूतिमात्र भावक के अयोग्य अनेक प्रकार भाव्यरूप क्रोधादि विकार से मिले चैतन्य के विकार सहित परिणाम से उस प्रकार के भाव का कर्ता प्रतिभासित होता है । तथा जैसे किसी अपरीक्षक आचार्य के उपदेश से भैंसे का ध्यान करने वाला कोई भोला पुरुष अज्ञान से भैंसे को और अपने को एकरूप करता हुआ अपने में गगन-स्पर्शी सींग वाले महान् भैंसापने के अध्यास से मनुष्य के योग्य छोटी कुटीके द्वार से निकलने से च्युत रहा उस प्रकार के भाव का कर्ता प्रतिभासित होता है । उसी प्रकार यह आत्मा भी अज्ञान से ज्ञेयज्ञायकरूप पर और आत्मा को एकरूप करता हुआ आत्मा में पर-द्रव्य के अध्यास से (निश्चय से) मन के विषय-रूप किये धर्म, अधर्म, आकाश, काल, पुद्गल और अन्य जीव-द्रव्य शुद्ध चैतन्य-धातु रुकी होने से तथा इंद्रियों के विषय-रूप किये गये रूपी पदार्थों के द्वारा अपना केवल (एक) ज्ञान ढका गया होने से तथा मृतक शरीर में परम अमृत-रूप विज्ञान-घन आत्मा के मूर्छित होने से उस प्रकार के भाव का कर्ता प्रतिभासित होता है । |
जयसेनाचार्य :
[एवं] जैसा कि, पहले दो गाथाओं में कहा जा चुका है, उस प्रकार से [पराणि दव्वाणि अप्पयं कुणदि] मैं क्रोध हूँ इत्यादि, अथवा मैं धर्मास्तिकाय हूँ इत्यादि, क्रोधादिक अपने परिणामरूप अथवा धर्मास्तिकायादि ज्ञेय-रूप पर-द्रव्य हैं, उनको अपना लेता है । [मंदबुद्धीओ] वह निर्विकल्प-समाधि है लक्षण जिसका, ऐसे भेदज्ञान से रहित मन्दबुद्धि-जीव [अप्पाणं अवि य परं करेदि] शुद्ध-बुद्ध-स्वरूप एक-स्वभाव वाले अपने आत्मा को भी 'पर' बना देता है -- अर्थात् अपने स्वरूप से भ्रष्ट कर लेता है, रागादिक संयुक्त कर लेता है । [अण्णाणभावेण] अपने अज्ञानभाव से पराधीन होता है । इससे यह सिद्ध हुआ कि भूताविष्ट दृष्टांत के द्वारा जिस प्रकार क्रोधादिक के विषय में, उसी प्रकार ध्यानाविष्ट दृष्टांत के द्वारा धर्मादि ज्ञेय-पदार्थ के विषय में जो इस जीव का अपने शुद्धात्मा के संवेदन से पृथक् भाव-रूप अज्ञान होता है, वही कर्ता-कर्मभाव का कारण होता है । जैसे -- किसी पुरुष के भूत-आदि ग्रह लग गया हो, तो वह भूत में और अपने आप में भेद को नहीं जानता हुआ, मनुष्य से न करने योग्य ऐसी बडी भारी शिला उठाना आदि आश्चर्यजनक व्यापार को करता हुआ दिख पड़ता है, उसी प्रकार यह जीव भी वीतरागमय-परमसामायिकभाव में परिणत होने वाला शुद्धोपयोग है लक्षण जिसका, ऐसे भेदज्ञान के न होने से काम-क्रोधादिभावों में और शुद्धात्मा में जो भेद है उसको न जानता हुआ 'मैं क्रोध रूप हूँ, मैं काम का रूप हूँ' इत्यादि विकारों को करता हुआ कर्मों का करने वाला बनता है । यह तो क्रोधादिक के विषय में भूताविष्ट का दृष्टान्त हुआ । अथवा जैसे भैंसा आदि का ध्यान करनेवाला जीव भैसा आदि में और अपने आप में भेद को नहीं जानता हुआ उसे भुलाकर, 'मैं भैंसा हूँ, मैं गारुड़ हूँ, मैं कामदेव हूँ, मैं अग्नि हूँ, या दूध की धारा के समान, अमृत की राशि हूँ' इत्यादि आत्म-विकल्पों को करता हुआ वह इन विकल्पों का करने वाला बनता है । वैसे ही छद्मस्थ जीव भी सुख-दुख में समता-भावना को लिये हुए जो शुद्धोपयोग है, वही है लक्षण जिसका, ऐसे भेदज्ञान के न होने से धर्मादिक-ज्ञेय-पदार्थों में और अपने आपकी शुद्धात्मा में जो भेद है उसको नहीं जानता हुआ 'मैं धर्मास्तिकाय हूँ' इत्यादिरूप आत्म-विकल्प करता है तो वह उस विकल्प का कर्ता होता है, और उस विकल्प के करने पर उस जीव के नूतन द्रव्य-कर्मों का बन्ध भी अवश्य होता है । इस प्रकार धर्मास्तिकायादि ज्ञेय पदार्थों में ध्यान का दृष्टान्त हुआ । इस पर यदि कोई ऐसा कहे कि 'हे भगवन् ! यह धर्मास्तिकाय है, यह जीव है, इत्यादि ज्ञेय तत्त्व का विचार रूप विकल्प करने पर भी यदि कर्मों का बन्ध होता है तो फिर ज्ञेय तत्त्वों का विचार करना वृथा है अत; वह नहीं करना चाहिए ? इस पर आचार्य देव उत्तर देते हैं की हे भाई ! ऐसा नहीं है, अपितु बात ऐसी है कि त्रिगुप्ति रूप निर्विकल्प समाधिकाल में तो ऐसा विकल्प नहीं करना चाहिये, किन्तु उस त्रिगुप्ति रूप ध्यान के अभाव में अध्यात्म भाषा में शुद्धात्मा को ही उपादेय मान कर व आगम भाषा में मोक्ष को उपादेय मानकर सराग-सम्यक्त्व के काल में विषय-कषायों से दूर होने के लिए ऐसा विकल्प करना ही चाहिये । क्योंकि उस उपर्युक्त तत्त्व विचार के द्वारा मुख्यता से पुण्य-बंध होता है और परम्परा से निर्वाण लाभ होता है, इसलिये वैसा विचार करने में कोई दोष नहीं है । हाँ, उस तत्व के विचार के काल में भी वीतराग स्व-संवेदन ज्ञान परिणत साक्षात् शुद्धात्मा ही उपादेय होता है, ऐसा समझना चाहिये । यहाँ कोई शंका करे कि हे भगवन् ! वीतराग स्व-संवेदन के विचार-काल में आपने जो बार-बार वीतराग विशेषण दिया है वह क्यों देते आ रहे हैं, क्या कोई सराग स्व-संवेदन ज्ञान भी होता है ? इसका आचार्य देव उत्तर देते हैं कि -- हाँ भाई ! विषय-सुखानुभव के आनन्द रूप स्व-संवेदन ज्ञान होता है वह सर्वजन प्रसिद्ध है (वह सब लोगों के अनुभव में आया करता है) । वह सराग होता है किन्तु जो शुद्धात्मा के सुखानुभव रूप स्व-संवेदन ज्ञान होता है वह वीतराग होता है ऐसा स्व-संवेदन ज्ञान के व्याख्यान काल में सब ही स्थान पर समझना चाहिये ॥१०३॥ |