
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ पुद्गलद्रव्यस्य परिणामस्वभावत्वं साधयति सांख्यमतानुयायिशिष्यं प्रति - यदि पुद्गलद्रव्यं जीवे स्वयमबद्धं सत्कर्मभावेन स्वयमेव न परिणमेत तदा तदपरिणाम्येव स्यात् । तथा सति संसाराभाव: । अथ जीव: पुद्गलद्रव्यं कर्मभावेन परिणामयति ततो न संसाराभाव: इति तर्क: । किं स्वयमपरिणममानं परिणममानं वा जीव: पुद्गलद्रव्यं कर्मभावेन परिणामयेत् ? न तावत्तत्स्वयमपरिणममानं परेण परिणमयितुं पार्येत, न हि स्वतोऽसती शक्ति: कर्तुमन्येन पार्यते । स्वयं परिणममानं तु न परं परिणमयितारमपेक्षेत, न हि वस्तुशक्तय: परमपेक्षंते । तत: पुद्गलद्रव्यं परिणामस्वभावं स्वयमेवास्तु । तथा सति कलशपरिणता मृत्तिका स्वयं कलश इव जडस्वभावज्ञानावरणादिकर्मपरिणतं तदेव स्वयं ज्ञानावरणादिकर्म स्यात् । इति सिद्धे पुद्गलद्रव्यस्य परिणामस्वभावत्वम् ॥११६-१२०॥ (कलश--उपजाति) स्थितेत्यविघ्ना खलु पुद्गलस्य स्वभावभूता परिणामशक्ति: । तस्यां स्थितायां स करोति भावं यमात्मनस्तस्य स एव कर्ता ॥६४॥ अब सांख्यमतानुयायी शिष्य के प्रति पुद्गल-द्रव्य का परिणाम-स्वभावत्व सिद्ध करते हैं (अर्थात् सांख्यमत वाले प्रकृति और पुरुष को अपरिणामी मानते हैं उन्हें समझाते हैं) :- यदि पुद्गल-द्रव्य जीव में आप नहीं बँधा हुआ कर्मभाव से स्वयमेव नहीं परिणमन करता है तो पुद्गल-द्रव्य अपरिणामी ही सिद्ध हो जायगा । ऐसा होने पर संसार का अभाव हो जायगा । यदि कोई ऐसा तर्क करे कि जीव पुद्गल-द्रव्य को कर्मभाव से परिणमाता है, इसलिये संसार का अभाव नहीं हो सकता, उसके समाधान में प्रश्न है कि यदि जीव पुद्गल को परिणमित कराता है तो वह स्वयं अपरिणमित को परिणमित कराता है या स्वयं परिणमित को परिणमित कराता है ? यदि इनमें से पहला पक्ष लिया जाय तो स्वयं अपरिणमित को कोई नहीं परिणमा सकता, क्योंकि स्वयं अपरिणमित को पर के द्वारा परिणमाने की सामर्थ्य नहीं होती । स्वतः शक्ति जिसमें नहीं होती, वह पर के द्वारा भी नहीं आ सकती । यदि स्वयं परिणमित पुद्गल-द्रव्य को जीव कर्म-भाव से परिणमाता है, ऐसा दूसरा पक्ष लिया जाय तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि अपने आप परिणमित हुए को अन्य परिणमाने वाले की आदश्यकता ही नहीं, क्योंकि वस्तु की शक्ति पर की अपेक्षा नहीं करती । इसलिये पुद्गल-द्रव्य परिणाम-स्वभाव स्वयमेव होवे । ऐसा होने पर जैसे कलशरूप परिणत हुई मिट्टी अपने आप कलष ही है, उसी भाँति जड-स्वभाव ज्ञानावरण आदि कर्म-रूप परिणत हुआ पुद्गल-द्रव्य ही आप ज्ञानावरण आदि कर्म ही है । इस प्रकार पुद्गल द्रव्य का परिणाम-स्वभावपना सिद्ध हुआ । (कलश--हरिगीत)
[इति] इसप्रकार [पुद्गलस्य] पुद्गल-द्रव्य की [स्वभावभूता परिणामशक्तिः] स्वभावभूत परिणमन-शक्ति [खलु अविघन स्थिता] निर्विघ्न सिद्ध हुई । [तस्यांस्थितायां] उसके सिद्ध होने पर, [सः आत्मनः यम् भावं करोति] पुद्गल-द्रव्य अपने जिस भाव को करता है [तस्य सः एव कर्ता] उसका वह पुद्गल-द्रव्य ही कर्ता है ।
सब पुद्गलों में है स्वभाविक परिणमन की शक्ति जब । और उनके परिणमन में है न कोई विघ्न जब ॥ क्यों न हो तब स्वयं कर्ता स्वयं के परिणमन का । सहज ही यह नियम जानो वस्तु के परिणमन का ॥६४॥ |
जयसेनाचार्य :
[जीवे ण सयं बद्धं] पुद्गल-द्रव्य-रूप कर्म अधिकरण-भूत जीव में न तो स्वयं बद्ध है क्योंकि जीव तो सदा शुद्ध है और [ण सयं परिणमदि कम्मभावेण] अपने-आप कर्म-रूप से भी अर्थात् द्रव्य-कर्म के पर्याय-रूप से भी नहीं परिणमता है, क्योंकि वह पुद्गल-द्रव्य भी सदा नित्य है । [जइ पोग्गलदव्वमिणं] यदि इस प्रकार पुद्गल-द्रव्य को माना जायेगा तो [अप्परिणामी तदा होदि] सांख्य-मतवालों के मत से यह पुद्गल-द्रव्य अपरिणामी ही हुआ । ऐसी दशा में [कम्मइयवग्गणासु य अपरिणमंतीसु कम्मभावेण] कार्मण-वर्गणाओं के ज्ञानावरणादि-द्रव्य-कर्म रूप नहीं परिणमन करने पर [संसारस्स अभावो पसज्जदे संखसमओ वा] इस संसार का सांख्य-मत के समान अभाव प्राप्त हो जायेगा । [जीवो परिणामयदे पोग्गलदव्वाणि कम्मभावेण] यदि ऐसा कहा जाय कि जीव हठात् कर्म-वर्गणा-योग्य-पुद्गल द्रव्यों को ज्ञानावरणादि-कर्म रूप से परिणमा लेता है अत: संसार का अभाव नहीं होगा, [तं सयमपरिणमंते कहं णु परिणामयदि चेदा] तो वहाँ यह प्रश्न होता है कि ज्ञानी जीव जो स्वयं अपरिणमनशील है वह उस पुद्गल-द्रव्य को जो परिणमाता है, वह नहीं परिणमन करते हुए को परिणमाता है या परिणमन करते हुए को ? यदि कहा जाये कि नहीं परिणमते हुए को परिणमाता है सो यह बात तो बन नहीं सकती क्योंकि जहाँ जो शक्ति स्वयं में नहीं है वहाँ वह शक्ति दूसरे द्वारा भी नहीं की जा सकती, यह अटल नियम है । जैसे जपा-पुष्पादिक स्फटिक-मणि में उपाधि को पैदा कर सकते है, वैसे काष्ठ के खंभे आदि में नहीं कर सकते, क्योंकि उसमें वैसी शक्ति नहीं है । यदि कहा जाये कि एकान्त रूप से परिणमन करते हुए को ही परिणमाता है तो यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि वस्तु में जो शक्तियाँ होती हैं वे अपने परिणमन में दूसरे की अपेक्षा नहीं रखती, ऐसा नियम है । अत: जबकि पुदुगल को स्वयं परिणमन करते रहना चाहिए, ऐसी दशा में फिर कार्मण-वर्गणायें जिस प्रकार ज्ञानावरणादि-कर्म के रूप में परिणमन करती हैं वैसे ही घट-पटादि-रुप-पुद्गल भी कर्म-रूप में परिणमन करें यह प्रत्यक्ष-विरोध-रूप दूषण आयेगा । अत: यह बात स्वयं सिद्ध हो जाती है कि पुद्गलों में कथंचित् परिणमने की शक्ति सहज-स्वभाव से है । जब उनमें यह शक्ति है तो उसका कर्ता स्वयं पुद्गल ही है । इस प्रकार अपने सम्बन्धी ज्ञानावरणादि-द्रव्यकर्म उनमें जिस परिणाम को करता है उसका उपादान पुद्गल ही होता है, जैसे कि कलश का उपादान कारण मिट्टी का पिण्ड है, किंतु ज्ञानावरणादि कर्मों का उपादान जीव नहीं है । जीव तो उसका निमित्त कारण मात्र है जो कि हेय-तत्त्व है अर्थात् जीव का जो भाव, कर्मों का निमित्त कारण होता है वह भी आस्रव-रूप होने से हेय-तत्त्व है, उपादेय रूप तत्त्व तो शुद्ध-निश्चय-नय की अपेक्षा से निज-शुद्धात्मा ही है जो उस उपर्युक्त पुद्गल से भिन्न एवं शुद्ध-परमात्म-भावना-रूप में परिणत, ऐसा अभेद-रत्नत्रय ही है लक्षण जिसका, ऐसे भेद-ज्ञान के द्वारा जानने योग्य है और चिदानन्द रूप एक-स्वभाव-वाला है । हाँ, इस अभेद-रत्नत्रय का साधक होने से व्यवहार-नय से भेद-रत्नत्रय भी उपादेय है । इस प्रकार तीन गाथाओं के शब्दार्थ के व्याख्यान से शब्दार्थ जानना चाहिए, व्यवहार-निश्चय-रूप से नयार्थ को भी जानना चाहिए । सांख्य के लिए मतार्थ का व्याख्यान हुआ । इस प्रकार शब्द, नय, मत, आगम और भावार्थ इन पाँच अर्थों से कथन किया, यह व्याख्यान-काल में यथासंभव सर्व ही ठिकाने जानते रहना चाहिए । इस प्रकार पुद्गल को परिणाम-शील बताने के रूप में तीन गाथाओं का व्याख्यान हुआ ॥१२३-१२५॥ |