+ ज्ञानी-जीव ज्ञानभाव का कर्ता -
जो संगं तु मुइत्ता जाणदि उवओगमप्पगं सुद्धं ।
तं णिस्संगं साहुं परमट्ठवियाणया विन्ति ॥131॥
जो मोहं तु मुइत्ता णाणसहावाधियं मुणदि आदं ।
तं जिदमोहं साहुं परमट्ठवियाणया विन्ति ॥132॥
जो धम्मं तु मुइत्ता जाणदि उवओगमप्पगं सुद्धं ।
तं धम्मसंगमुक्कं परमट्ठवियाणया विन्ति ॥133॥
अन्वयार्थ : जो साधु बाह्य और अभ्यन्तर दोनों प्रकार के सम्पूर्ण परिग्रह को छोड़कर अपने आपकी आत्मा को दर्शन-ज्ञानोपयोग-स्वरूप शुद्ध अनुभव करता है, उसको परमार्थ स्वरूप के जानने वाले गणधरादिक-देव निर्ग्रन्थ-साधु कहते हैं ।
जो साधु पर-पदार्थों में होने वाले मोह को छोड़कर अपने आप को निर्विकल्प-ज्ञान-स्वभाव-मय अनुभव करता है, उसको परमार्थ के जानने वाले तीर्थंकरादिक-परमेष्ठी मोह-रहित कहते हैं ।
जो कोई साधु व्यावहारिक-धर्म को छोड़कर शुद्ध-ज्ञान-दर्शानोपयोग-रूप आत्मा को जानता है उनको परमार्थ के ज्ञाता धर्म के परिग्रह से भी रहित कहते हैं ।

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य    notes 

जयसेनाचार्य :

[जो संगं तु मुइत्ता जाणदि उवओगमप्पगं सुद्धं] जो परमसाधु बाह्य और अभ्यन्तर दोनों प्रकार के परिग्रह का त्याग कर वीतराग-चारित्र के साथ अविनाभाव रखने वाले भेदज्ञान से अपनी आत्मा को जानता है । कैसा अनुभव करता है ? कि आत्मा विशुद्ध-ज्ञान-दर्शनोपयोग-स्वभाव वाला होने से उपयोगमय है; ज्ञानदर्शन-उपयोग को लिये हुए है । फिर कैसा है ? शुद्ध है, भाव-कर्म, द्रव्य-कर्म और नोकर्म से रहित है इस प्रकार समाधि में स्थित होकर अनुभव करता है । [तं णिस्संगं साहुं परमट्ठवियाणया विन्ति] उस साधु को परमार्थ के जाननेवाले गणधर देवादिक निस्संग अर्थात् परिग्रह-रहित साधु कहते हैं ॥१३१॥

[जो मोहं तु मुइत्ता णाणसहावाधियं मुणदि आदं] जो परम ऋषि समस्त प्रकार के चेतन या अचेतन, शुभ व अशुभ पर-द्रव्यों में मोह को छोड़कर शुभ व अशुभ मन, वचन, काय के व्यापार रूप तीनों योगों के परिहार न होने देना-करने रूप अभेद-रत्नत्रय लक्षण के धरने वाले भेद-ज्ञान के द्वारा आत्मा का अनुभव करता है । किस प्रकार करता है कि -- आत्मा विकार-रहित शुद्ध स्वसंवेदन ज्ञान से सहित है, परिपूर्ण है, तद्रूप परिणत है इस प्रकार का अनुभव करता है । [तं जिदमोहं साहुं परमट्ठवियाणया विन्ति] परमार्थ के जाननेवाले तीर्थंकर परमदेवादिक उस साधु को ही मोह से रहित हुआ मानते हैं ।

यहाँ पर जिस प्रकार मोह पद दिया है उसी प्रकार राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ, कर्म, नोकर्म, मन, वचन, काय, बुद्धि, उदय, शुभ परिणाम, अशुभ परिणाम, श्रोत, चक्षु, घ्राण, रसना, स्पर्शन, इस प्रकार २० पद क्रम से रखकर २० सूत्रों का व्याख्यान कर लेना चाहिये । इस प्रकार निर्मल परम ज्योति की परिणति से विलक्षण / विरुद्ध असंख्यात लोकप्रमाण विभाव भाव हैं ऐसा समझ लेना चाहिए ॥१३२॥

[जो धम्मं तु मुइत्ता जाणदि उवओगमप्पगं सुद्धं] जो योगीन्द्र शुभोपयोगरूप-धर्म-परिणाम को भी जीतकर अपने शुद्धात्मा के रूप में परिणत अभेद-रत्नत्रय-लक्षणवाले भेद-ज्ञान के द्वारा अपने आपको अनुभव करता है कि 'मैं विशुद्ध-ज्ञान-दर्शन-उपयोगमय हूँ', तथा शुभ-अशुभरूप जो संकल्प-विकल्प हैं, उनसे रहित शुद्ध हूँ । [तं धम्मसंगमुक्कं परमट्ठवियाणया विन्ति] उसी परम-साधु को परमार्थ के जानने वाले प्रत्यक्ष ज्ञानी लोग विकार रहित अपनी शुद्धात्मा के उपलंभरूप जो निश्चय-धर्म, उससे विलक्षणता को लिए भोग, आकांक्षा-स्वरूप निदान-बंध आदि पुण्यमय परिग्रहवाले व्यवहार-धर्म से दूर होने वाला मानते हैं ।

जीव के कथंचित् परिणामीपना सिद्ध होने पर ही उपर्युक्त प्रकार का शुद्धोपयोग में परिणमन सिद्ध हो सकता है । परिणामीपना न मानने पर जीव बँधा हुआ और बँधा ही रहना चाहिये । वहाँ पर फिर उसका शुद्धोपयोगरूप से परिणमन विशेष होता है वह कभी बन नहीं सकता । अत: ऐसी दशा में मोक्ष का अभाव हो जाता है । इस प्रकार शुद्धोपयोगरूप ज्ञानमय परिणाम गुण के व्याख्यान की मुख्यता से तीन गाथाएँ पूर्ण हुईं ॥१३३॥

आगे कहते हैं कि जीव ज्ञानमयी तथा अज्ञानमयी दोनों प्रकार के भावों का कर्ता कैसे होता है --