
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अतत्त्वोपलब्धिरूपेण ज्ञाने स्वदमानो अज्ञानोदय: । मिथ्यात्वासंयमकषाययोगोदया: कर्महेत-वस्तन्मयाश्चत्वारो भावा: । तत्त्वाश्रद्धानरूपेण ज्ञाने स्वदमानो मिथ्यात्वोदय:, अविरमणरूपेण ज्ञाने स्वदमानोऽसंयमोदय:, कलुषोपयोगरूपेण ज्ञाने स्वदमान: कषायोदय:, शुभाशुभप्रवृत्ति-निवृत्तिव्यापाररूपेण ज्ञाने स्वदमानो योगोदय: । अथैतेषु पौद्गलिकेषु मिथ्यात्वाद्युदयेषु हेतुभूतेषु यत्पुद्गलद्रव्यं कर्मवर्गणागतं ज्ञाना-वरणादिभावैरष्टधा स्वयमेव परिणमते तत्खलु कर्मवर्गणागतं जीवनिबद्धं यदा स्यात्तदा जीव: स्वयमेवाज्ञानात्परात्मनोरेकेत्वाध्यासेनाज्ञानमयानां तत्त्वाश्रद्धानादीनां स्वस्य परिणामभावानां हेतुर्भवति ॥१३२-१३६॥ अयथार्थ वस्तु-स्वरूप की उपलब्धि से ज्ञान में स्वादरूप होता हुआ अज्ञान का उदय है । और नवीन कर्मों के हेतुभूत मिथ्यात्व, असंयम, कषाय, योगोदय ये अज्ञानमय चार भाव हैं । उनमें से
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जयसेनाचार्य :
इस कथन का सारांश यह है कि द्रव्य-प्रत्ययों का उदय होने पर यदि यह जीव अपने सहज-स्वभाव को छोड़कर रागादिरूप-भावप्रत्ययों के रूप में परिणमन करता है, तभी नूतन-बंध होता है, केवल द्रव्य-प्रत्ययों के उदयमात्र से किसी भी संकट के समय में भी नूतन-बंध नहीं होता । जैसा कि पाण्डवों के नहीं हुआ । यदि उदयमात्र से ही बंध मान लिया जाये तब तो इस जीव के संसार सदा ही बना रहेगा, क्योंकि संसारी-जीव के कर्म का उदय तो सदा बना ही रहता है ॥१४०-१४४॥ इस प्रकार पुण्य-पापादि सप्त-पदार्थों की पीठिका-रूप इस महाधिकार में पाँच-प्रत्ययों के रूपों से जो शुद्धात्मा के स्वरूप से च्युत होने वाले जीवों के अज्ञानभाव होता है, वही बंध का कारण होता है, इस प्रकार के व्याख्यान की मुख्यता से पाँच गाथाओं द्वारा सातवां उत्तराधिकार समाप्त हुआ । अब इसके आगे आठवाँ अधिकार है उसमें जीव और पुदुगल ये दोनों परस्पर में उपादान-कारण नहीं होते इस प्रकार के कथन की मुख्यता से तीन गाथायें हैं । उनमें आचार्यदेव प्रथम यह बताते है कि निश्चय-नय से देखा जाय तो जीव का जो परिणाम है वह कर्म-पुद्गलों से पृथग्भूत ही है --- |