
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
किमात्मनि बद्धस्पृष्टं किमबद्धस्पृष्टं कर्मेति नयविभागेनाह - जीवपुद्गलकर्मणोरेकबंधपर्यायत्वेन तदात्वे व्यतिरेकाभावाज्जीवे बद्धस्पृष्टं कर्मेति व्यवहारनयपक्ष: । जीवपुद्गलकर्मणोरनेकद्रव्यत्वेनात्यंतव्यतिरेकाज्जीवेऽबद्धस्पृष्टं कर्मेति निश्चयनयपक्ष: ॥१४१॥ जीव और पुद्गल-कर्म को एक बंध-पर्याय-रूप से देखने पर उस समय भिन्नता का अभाव होने से जीव में कर्म बँधे हैं और छुए हैं ऐसा कहना तो व्यवहारनय का पक्ष है और जीव तथा पुद्गल-कर्म के अनेक-द्रव्यपना होने से अत्यन्त भिन्नता है, अतः जीव में कर्म बद्धस्पृष्ट नहीं है, ऐसा कथन निश्चयनय का पक्ष है । |
जयसेनाचार्य :
आगे जब शिष्य ने प्रश्न किया कि आत्मा कर्मों से बद्ध है या नहीं है, और बद्ध है तो कौन से नय से है तथा अबद्ध है तो कौन से नय से है उसका उत्तर देते हुये आचार्य कहते हैं -- [जीवे कम्मं बद्धं पुट्ठं चेदि ववहारणयभणिदं] कर्म अधिकरणभूत जीव में नीर और क्षीर की तरह एकमेक होकर सम्बद्ध हैं, परस्पर मिले हुये हैं तथा योग मात्र के द्वारा आत्मा में लगे हैं, यह व्यवहारनय का अभिप्राय है । [सुद्धणयस्स दु जीवे अबद्धपुट्ठं हवदि कम्मं] शुद्ध-नय के अभिप्राय से अधिकरण रूप जीव में कर्म न तो बद्ध ही हैं और न स्पृष्ट ही हैं । इस प्रकार निश्चयनय और व्यवहारनय इन दोनों नयों से उत्पन्न होने वाला विकल्प वास्तव में शुद्धात्मा का स्वरूप नहीं है ॥१४८॥ |