+ पक्ष से दूरवर्ती ही समयसार है -
सम्मद्दंसणणाणं एसो लहदि त्ति णवरि ववदेसं । (144)
सव्वणयपक्खरहिदो भणिदो जो सो समयसारो ॥151॥
सम्यग्दर्शनज्ञानमेष लभत इति केवलं व्यपदेशम्
सर्वनयपक्षरहितो भणितो य: स समयसार: ॥१४४॥
विरहित सभी नयपक्ष से जो वह समय का सार है
है वही सम्यग्ज्ञान एवं वही समकित सार है ॥१४४॥
अन्वयार्थ : जो [सव्वणयपक्खरहिदो] सब नयपक्षों से रहित है [सो समयसारो] वही समयसार [भणिदो] कहा गया है । [एसो] यह समयसार ही [णवरि] केवल [सम्मद्दंसणणाणं] सम्यग्दर्शन ज्ञान [त्ति] ऐसे [ववदेसं] नाम को [लहदि] पाता है ।
Meaning : That which is free from all viewpoints is the samayasâra. Only this samayasâra is characterized by right faith and right knowledge (samayasâra itself is right faith and right knowledge).

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य    notes 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
पक्षातिक्रान्त एव समयसार इत्यवतिष्ठते -
अयमेक एव केवलं सम्यग्दर्शनज्ञानव्यपदेशं किल लभते । य: खल्वखिलनयपक्षाक्षुण्णतया विश्रांतसमस्तविकल्पव्यापार: स समयसार: । यत: प्रथमत: श्रुतज्ञानावष्टंभेन ज्ञानस्वभावमात्मानं निश्चित्य तत: खल्वात्मख्यातये पर-ख्यातिहेतूनखिला एवेन्द्रियानिन्द्रियबुद्धीरवधार्य आत्माभिमुखीकृतमतिज्ञानतत्त्व:, तथा नानाविध-नयपक्षालंबनेनानेकविकल्पैराकुलयंती: श्रुतज्ञानबुद्धीरप्यवधार्य श्रुतज्ञानतत्त्वमप्यात्माभिमुखी-कुर्वन्नत्यंतविकल्पो भूत्वा झगित्येव स्वरसत एव व्यक्तीभवंतमादिमध्यांतविमुक्तमनाकुलमेकं केवलमखिलस्यापि विश्वस्योपरि तरंतमिवाखंडप्रतिभासमयमनंतं विज्ञानघनं परमात्मानं समयसारं विंदन्नेवात्मा सम्यग्दृश्यते ज्ञायते च, तत: सम्यग्दर्शनं ज्ञानं च समयसार एव ॥१४४॥

(कलश--शार्दूलविक्रीडित)
आक्रामन्नविकल्पभावमचलं पक्षैर्नयानां विना
सारो य: समयस्य भाति निभृतैरास्वाद्यमान: स्वयम् ।
विज्ञानैकरस: स एष भगवान्पुण्य: पुराण: पुान्
ज्ञानं दर्शनमप्ययं किमथवा यत्किंचनैकोऽप्ययम् ॥९३॥
(शार्दूलविक्रीडित )
दूरं भूरिविकल्पजालगहने भ्राम्यन्निजौघाच्चयुतो
दूरादेव विवेकनिम्नगमनान्नीतो निजौघं बलात् ।
विज्ञानैकरसस्तदेकरसिनामात्मानमात्मा हरन्
आत्मन्येव सदा गतानुगततामायात्ययं तोयवत् ॥९४॥
(अनुष्टुभ्)
विकल्पक: परं कर्ता विकल्प: कर्म केवलम् ।
न जातु कर्तृकर्मत्वं सविकल्पस्य नश्यति ॥९५॥
(रथोद्धता)
य: करोति स करोति केवलं यस्तु वेत्ति स तु वेत्ति केवलम् ।
य: करोति न हि वेत्ति स क्वचित् यस्तु वेत्ति न करोति स क्वचित् ॥९६॥
(इन्द्रवज्रा)
ज्ञप्ति: करोतौ न हि भासतेऽन्त: ज्ञप्तौ करोतिश्च न भासतेऽन्त: ।
ज्ञप्ति: करोतिश्च ततो विभिन्ने ज्ञाता न कर्तेति तत: स्थितं च ॥९७॥
(शार्दूलविक्रीडित)
कर्ता कर्मणि नास्ति नास्ति नियतं कर्मापि तत्कर्तरि
द्वंद्वं विप्रतिषिध्यते यदि तदा का कर्तृकर्मस्थिति: ।
ज्ञाता ज्ञातरि कर्म कर्मणि सदा व्यक्तेति वस्तुस्थितिर्ने
पथ्ये बत नानटीति रभसा मोहस्तथात्येष किम् ॥९८॥

अथवा नानटयतां, तथापि —
(मन्द्राक्रान्ता)
कर्ता कर्ता भवति न यथा कर्म कर्मापि नैव
ज्ञानं ज्ञानं भवति च यथा पुद्गल: पुद्गलोऽपि ।
ज्ञानज्योतिर्ज्वलितमचलं व्यक्तमंतस्तथोच्चै-
श्चिच्छक्तीनां निकरभरतोऽत्यंतगंभीरमेतत् ॥९९॥

इति जीवाजीवौ कर्तृकर्मवेषविमुक्तौ निष्क्रान्तौ ।
इति श्रीमदमृतचन्द्रसूरिविरचितायां समयसारव्याख्यायामात्मख्यातौ कर्तृकर्मप्ररूपकः द्वितीयोऽङ्कः


जो निश्चय से समस्त नय-पक्ष से खण्डित न होने से जिसमें समस्त विकल्पों के व्यापार विलय हो गए हैं, ऐसा समयसार शुद्ध स्वरूप है सो यही एक केवल सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान ऐसे नाम को पाता है । ये परमार्थ से एक ही हैं, क्योंकि आत्मा, प्रथम तो श्रुतज्ञान के अवलम्बन से ज्ञान-स्वभाव आत्मा का निश्चय कर, पीछे निश्चय से आत्मा की प्रकट प्रसिद्धि होने के लिए पर-पदार्थ की ख्याति होने के कारण-भूत इन्द्रिय और मन के द्वारा हुई प्रवृत्ति-रूप बुद्धि को गौण कर जिसने मति-ज्ञान का स्वरूप आत्मा के सन्मुख किया है ऐसा होता हुआ तथा नाना प्रकार के नयों के पक्षों को अवलम्बन कर अनेक विकल्पों से आकुलता उत्पन्न कराने वाली श्रुतज्ञान की बुद्धि को भी गौण कर तथा श्रुत-ज्ञान को भी आत्म-तत्त्व के स्वरूप में सन्मुख करता हुआ अत्यन्त निर्विकल्प-रूप होकर तत्काल अपने निजरस से से ही प्रकट हुआ आदि, मध्य और अन्त के भेद से रहित अनाकुल एक (केवल) समस्त पदार्थ समूह-रूप लोक के ऊपर तैरते की तरह अखंड प्रतिभास-मय, अविनाशी, अनन्त विज्ञान-घन परमात्म-स्वरूप समयसार को ही अनुभवता हुआ सम्यक् प्रकार देखा जाता है, श्रद्धान किया जाता है, सम्यक् प्रकार जाना जाता है । इस कारण सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान समयसार ही है ।

(कलश--हरिगीत)
यह पुण्य पुरुष पुराण सब नयपक्ष बिन भगवान है ।
यह अचल है अविकल्प है बस यही दर्शन ज्ञान है ॥
निभृतजनों का स्वाद्य है अर जो समय का सार है ।
जो भी हो वह एक ही अनुभूति का आधार है ॥९३॥
[नयानां पक्षैः विना] नयों के पक्षों के रहित, [अचलं अविकल्पभावम् आक्रामन्]अचल निर्विकल्पभाव को प्राप्त होता हुआ [यः समयस्य सारः भाति] जो समय (आत्मा) का सार प्रकाशित होता है [सः एषः] वह यह [निभृतैःस्वयम् आस्वाद्यमानः] निभृत (निश्चल, आत्मलीन) पुरुषों के द्वारा स्वयं अनुभवमें आता है, [विज्ञान-एक-रसः भगवान्] विज्ञान ही जिसका एक रस है ऐसा भगवान् है, [पुण्यः पुराणः पुमान्] पवित्र पुराण पुरुष है; उसे [ज्ञानं दर्शनम् अपि अयं] ज्ञान दर्शन भी यह [अथवा किम्] अथवा क्या कहें ? [यत् किंचन अपि अयम् एकः] जो कुछ है सो यह एक ही है ।

(कलश--हरिगीत )
निज औघ से च्युत जिसतरह जल ढालवाले मार्ग से ।
बलपूर्वक यदि मोड़ दें तो आ मिले निज औघ से ॥
उस ही तरह यदि मोड़ दें बलपूर्वक निजभाव को ।
निजभाव से च्युत आत्मा निजभाव में ही आ मिले ॥९४॥
[तोयवत्] पानी के जैसे [अयं निज-ओघात् च्युतः] यह (आत्मा) अपने विज्ञानघन स्वभाव से च्युत होकर [भूरि-विकल्प-जाल-गहने दूरं भ्राम्यन्] प्रचुर विकल्पजालों के गहन वन में दूर परिभ्रमण कर रहा था उसे [दूरात् एव विवेक-निम्न-गमनात्] दूर से ही विवेकरूपी ढालवाले मार्ग द्वारा [निज-ओघं बलात् नीतः] अपने विज्ञानघन-स्वभाव की ओर बलपूर्वक मोड़ दिया गया; इसलिए [तद्-एक-रसिनाम्] केवल विज्ञानघन के ही रसिक पुरुषों को [विज्ञान-एक-रसः आत्मा] जो एक विज्ञान रसवाला ही अनुभव में आता हुआ आत्मा, [आत्मानम् आत्मनि एव आहरन्] आत्मा को आत्मा में ही खींचता हुआ [सदा गतानुगतताम् आयाति] सदा विज्ञानघन स्वभाव में आ मिलता है ।

(कलश--रोला)
है विकल्प ही कर्म विकल्पक कर्ता होवे ।
जो विकल्प को करे वही तो कर्ता होवे ॥
नित अज्ञानी जीव विकल्पों में ही होवे ।
इस विधि कर्ताकर्मभाव का नाश न होवे ॥९५॥
[विकल्पकः परं कर्ता] विकल्प करनेवाला ही कर्ता है और [विकल्पः केवलम् कर्म] विकल्प ही केवल कर्म है; [सविकल्पस्य कर्तृकर्मत्वं] विकल्प-सहित का कर्ता-कर्मभाव [जातु नश्यति न] नष्ट नहीं होता ।

(कलश--रोला)
जो करता है वह केवल कर्ता ही होवे ।
जो जाने बस वह केवल ज्ञाता ही होवे ॥
जो करता वह नहीं जानता कुछ भी भाई ।
जो जाने वह करे नहीं कुछ भी हे भाई ॥९६॥
[यः करोति सः केवलं करोति] जो करता है सो केवल करता ही है [तु यः वेत्ति सः तु केवलम् वेत्ति] और जो जानता है सो केवल जानता ही है; [यः करोति सः क्वचित् न हि वेत्ति] जो करता है वह कभी जानता नहीं [तु यः वेत्ति सः क्वचित् न करोति] और जो जानता है वह कभी करता नहीं ।

(कलश--रोला)
करने रूप क्रिया में जानन भासित ना हो ।
जानन रूप क्रिया में करना भासित ना हो ॥
इसीलिए तो जानन-करना भिन्न-भिन्न हैं ।
इसीलिए तो ज्ञाता-कर्ता भिन्न-भिन्न हैं ॥९७॥
[करोतौ अन्तः ज्ञप्तिः न हि भासते] करनेरूप क्रिया के भीतर जाननेरूप क्रिया भासित नहीं होती [च ज्ञप्तौ अन्तः करोतिः न भासते] और जाननेरूप क्रिया के भीतर करनेरूप क्रिया भासित नहीं होती; [ततः ज्ञप्तिः करोतिः च विभिन्ने] इसलिये ज्ञप्तिक्रिया और करनेरूप क्रिया दोनों भिन्न है; [च ततः इति स्थितं] और इससे यह सिद्ध हुआ कि [ज्ञाता कर्ता न] जो ज्ञाता है वह कर्ता नहीं है ।

(कलश--हरिगीत)
कर्म में कर्ता नहीं अर कर्म कर्ता में नहीं ।
इसलिए कर्ताकरम की थिति भी कभी बनती नहीं ॥
कर्म में है कर्म ज्ञाता में रहा ज्ञाता सदा ।
यदि साफ है यह बात तो फिर मोह है क्यों नाचता?॥९८॥
[कर्ता कर्मणि नास्ति, कर्म तत् अपि नियतं कर्तरि नास्ति] निश्चय से न तो कर्ता कर्म में है, और न कर्म कर्ता में ही है [यदि द्वन्द्वं विप्रतिषिध्यते] यदि इसप्रकार परस्पर दोनों का निषेध किया जाये [तदा कर्तृकर्मस्थितिः का] तो कर्ता-कर्म की क्या स्थिति होगी ? (अर्थात् जीव-पुद्गल के कर्ताकर्मपन कदापि नहीं हो सकेगा ।) [ज्ञाता ज्ञातरि, कर्म सदा कर्मणि ]इसप्रकार ज्ञाता सदा ज्ञाता में ही है और कर्म सदा कर्म में ही है [ इति वस्तुस्थितिः व्यक्ता ] ऐसी वस्तु-स्थिति प्रगट है [तथापि बत ] तथापि अरे ! [नेपथ्ये एषः मोहः किम् रभसा नानटीति ] नेपथ्य में यह मोह क्यों अत्यन्त वेगपूर्वक नाच रहा है ? (इसप्रकार आचार्यको खेद और आश्चर्य होता है ।)

यदि मोह नाचता है तो भले नाचे, तथापि -

(कलश--सवैया इकतीसा)
जगमग जगमग जली ज्ञानज्योति जब,
अति गंभीर चित् शक्तियों के भार से ॥
अद्भुत अनूपम अचल अभेद ज्योति,
व्यक्त धीर-वीर निर्मल आर-पार से ॥
तब कर्म कर्म अर कर्ता कर्ता न रहा ।
ज्ञान ज्ञानरूप हुआ आनन्द अपार से ॥
और पुद्गलमयी कर्म कर्मरूप हुआ,
ज्ञानी पार हुए भवसागर अपार से ॥९९॥
[अचलं व्यक्तं] अचल, व्यक्त और [चित्-शक्तीनां निकर-भरतः अत्यन्त-गम्भीरम्] चित्शक्तियों के समूह के भार से अत्यन्त गम्भीर [एतत् ज्ञानज्योतिः] यह ज्ञान-ज्योति [अन्तः उच्चैः तथा ज्वलितम्] अन्तरङ्ग में उग्रता से ऐसी जाज्वल्यमान हुई [यथा कर्ता कर्ता न भवति] जिससे कर्ता कर्ता नहीं होता और [कर्म कर्म अपि न एव] कर्म भी कर्म नहीं होता [यथा ज्ञानं ज्ञानं भवति च] जिससे ज्ञान ज्ञान ही रहता है तथा [पुद्गलः पुद्गलः अपि] पुद्गल पुद्गल ही रहता है ।

इसप्रकार जीव और अजीव कर्ता-कर्म का वेष त्यागकर बाहर निकल गये ।

इसप्रकार श्री समयसार (श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्य देव प्रणीत श्री समयसार परमागम की) श्रीमद्अमृतचन्द्राचार्यदेव विरचित आत्मख्याति नामक टीका में कर्ता-कर्म का प्ररूपक दूसरा अंक समाप्त हुआ ।
जयसेनाचार्य :

यदि शुद्ध पारिणामिक परमभाव के ग्रहण करने वाले शुद्ध-द्रव्यार्थिकनय से सोचा जाय तो नय के विकल्प स्वरूप जो समस्त प्रकार के पक्षपात, उनसे रहित ही समय सार होता है ऐसा नीचे की गाथा में कहते हैं --

[सव्वणयपक्खरहिदो भणिदो जो सो समयसारो] जब कि आत्मा, निर्विकल्प-समाधि-पुरुषों के द्वारा इन्दियानिंद्रियजनित बाह्य-विषयक समस्त-मतिज्ञान के विकल्पों से रहित ही देखा और जाना जाता है । तथा वही आत्मा बद्धाबद्धादिक-विकल्पनय के पक्षपात से रहित ऐसे समयसार का अनुभव करता हुआ देखा और जाना जाता है । इसलिए [सम्मद्दंसणणाणं एसो लहदि त्ति णवरि ववदेसं] मात्र सकल-विमल-केवल-ज्ञान और केवल-दर्शनरूप व्यपदेश को वह स्वीकार करता है, न कि बद्धाबद्धादिरूप व्यपदेशों को ॥१५१॥

इस प्रकार निश्चय-नय और व्यवहार-नय इन दोनों नयों के पक्षपात से रहित शुद्ध-समयसार के व्यायाख्यान की मुख्यता से चार गाथाओं द्वारा यह नवम अंतराधिकार समाप्त हुआ ।

इस प्रकरण के द्वारा [जाव ण वेदि विसेसंतरं] इत्यादि गाथा से शुरू करके पाठ के क्रम से
  • अज्ञानी और सम्यग्ज्ञानी जीव की संक्षेप सूचना देते हुए छ: गाथाएँ कहीं हैं और
  • इसके बाद अज्ञानी और सम्यग्ज्ञानी जीव का विशेष व्यायाख्यान करते हुए ग्यारह गाथाएँ कहीं हैं फिर
  • चेतन और अचेतन सब कार्यों का एक ही उपादानकर्ता होता है ऐसे अभिप्राय वाले द्विक्रियावादी के निराकरण की मुख्यता से २५ गाथाएँ कहीं हैं
  • इसके अनंतर मिथ्यात्वादि पांच-प्रत्यय ही कर्म करते हैं, आत्मा नहीं, इस प्रकार का समर्थन करते हुए ७ गाथाएँ कहीं हैं,
  • इसके आगे जीव और पुद्गल का कथंचित परिणामित्व स्थापन करने की मुख्यता को लेकर आठ गाथाएँ कहीं हैं
  • इसके अनंतर ज्ञानमय और अज्ञानमय-परिणाम के कथन की मुख्यता से ९ गाथाएँ हैं
  • इसके आगे अज्ञान-भाव को मिथ्यात्वादि-पाँच प्रत्यय के भेदरूप से प्रतिपादन करने वाली ५ गाथाएँ हैं ।
  • तदनंतर जीव ओर पुद्गल ये दोनों परस्पर एक दूसरे के उपादान कर्ता नहीं हैं इस प्रकार के कथन की मुख्यता से ३ गाथाएँ कहीं हैं ।
  • इसके पीछे यह बतलाते हुए कि शुद्ध-समयसार तो नय के पक्षपात से सर्वथा रहित है ऐसा कथन करने में ४ गाथाएँ आई हैं ।
इस प्रकार समस्त ७८ गाथाओं के द्वारा और ९ अन्तराधिकारों के द्वारा यह कर्त्ता-कर्म नाम का महाधिकार समाप्त हुआ ।

वहाँ जीव और अजीव के अधिकार-रूप इस ग्रन्थ की रंगभूमि में भेषधारी दो पात्र नृत्य करते हैं; और बाद में वे पृथक्-पृथक् हो जाते हैं । वैसे ही यहाँ शुद्ध-निश्चय-नय के द्वारा जीव और अजीव ये दोनों अपने-अपने कर्ता और कर्म भेष को छोड़कर निकल गये हैं ।

इति श्री जयसेनाचार्यकृत समयसार की 'तात्पर्यवृत्ति' नाम की व्याख्या के हिंदी अनुवाद में यह पुण्यपापादि सात पदार्थों से सम्बन्ध रखने वाला पीठिकारूप तीसरा महाधिकार समाप्त हुआ ।