
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ ज्ञानं मोक्षहेतुं साधयति - ज्ञानं हि मोक्षहेतु:, ज्ञानस्य शुभाशुभकर्मणोरबंधहेतुत्वे सति मोक्षहेतुत्वस्य तथोपपत्ते: । तत्तु सकलकर्मादिजात्यंतरविविक्तचिज्जतिमात्र: परमार्थ आत्मेति यावत् । स तु युगपदेकीभावप्रवृत्तज्ञानगमनमयतया समय:, सकलनयपक्षासंकीर्णैकज्ञानतया शुद्ध:, केवलचिन्मात्रवस्तुतया केवली, मननमात्रभावतया मुनि:, स्वयमेव ज्ञानतया ज्ञानी, स्वस्य भवन-मात्रतया स्वभाव:, स्वतश्चितो भवनमात्रतया सद्भावो वेति शब्दभेदेऽपि नचवस्तुभेद: ॥१५१॥ ज्ञान ही मोक्ष का कारण है, क्योंकि ज्ञान के ही शुभ अशुभ कर्म-बंध की हेतुता न होने पर मोक्ष की हेतुता ज्ञान के ही बनती है ।
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जयसेनाचार्य :
अब आगे विशुद्ध-ज्ञान नाम वाला परमात्म-तत्त्व ही मोक्ष का कारण है, ऐसा बताते हैं -- [परमट्ठो खलु समओ] वास्तव में शुद्धात्मा ही परमार्थ है, सर्वोत्कृष्ट अर्थ है, क्योंकि धर्म, अर्थ और मोक्ष-स्वरूप है वह परमात्मरूप ही है अथवा मति श्रुत अवधि, मन:पर्यय और केवलज्ञान इन भेदों से रहित होते हुये ज्ञान-स्वरूप है, वही निश्चय से परमार्थ है । वह भी परमात्म-स्वरूप ही है । क्योंकि समय शब्द की व्युत्पत्ति ही ऐसी है कि 'सम्यक् अयते शुद्ध-गुण-पर्यायान् परिणमति स समय:' अर्थात् जो भले प्रकार से अपने गुण और पर्यायों में रहता है वह समय कहलाता है अथवा 'सम्यक अय:' संशयादि रहित ज्ञान जिसको होता है वह समय है अथवा 'सम्' यह एकता का नाम है अत: एक-रूप से परम-समरस-भाव से जो अपने शुद्ध स्वरूप में 'अयन' अर्थात गमन / परिणमन करना वह समय कहलाता है । [सुद्धो] शुद्ध है रागादि-भाव-कर्म से रहित है । [केवली] केवली शब्द का अर्थ होता है सहाय-रहित, अत: पर-द्रव्य की सहायता से रहित होने के कारण वही केवली भी है । [मुणी] वह परमात्मा ही मुनि भी है । [णाणी] विशुद्ध-ज्ञान जिसको हो वह ज्ञानी होता है अत: वह प्रत्यक्षज्ञानी परमात्मा भी है । [तम्हि ट्ठिदा सहावे मुणिणो पावंति णिव्वाणं] उसी परमात्म-स्वभाव में स्थित रहने वाले / तन्मयता रखने वाले वीतराग-स्वसंवेदन ज्ञान में लीन मुनि / तपोधन ही निर्वाण को प्राप्त करते हैं ॥१५८॥ |