
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ परमार्थमोक्षहेतोरन्यत् कर्म प्रतिषेधयति - य: खलु परमार्थमोक्षहेतोरतिरिक्तो व्रततप:प्रभृतिशुभकर्मात्मा केषांचिन्मोक्षहेतु: स सर्वोऽपि प्रतिषिद्ध:, तस्य द्रव्यान्तरस्वभावत्वात् तत्स्वभावेन ज्ञानभवनस्याभवनात्, परमार्थमोक्षहेतोरेवैक-द्रव्यस्वभावत्वात् तत्स्वभावेन ज्ञानभवनस्य भवनात् ॥१५६॥ (कलश--अनुष्टुभ्) वृत्तं ज्ञानस्वभावेन ज्ञानस्य भवनं सदा । एकद्रव्यस्वभावत्वान्मोक्षहेतुस्तदेव तत् ॥१०६॥ (कलश--अनुष्टुभ्) वृत्तं कर्मस्वभावेन ज्ञानस्य भवनं न हि । द्रव्यान्तरस्वभावत्वान्मोक्षहेतुर्न कर्म तत् ॥१०७॥ (कलश--अनुष्टुभ्) मोक्षहेतुतिरोधानाद्बन्धत्वात्स्वयमेव च । मोक्षहेतुतिरोधायिभावत्वात्तन्निषिध्यते ॥१०८॥ परमार्थ-भूत मोक्ष के कारण से रहित और व्रत तप आदिक शुभ-कर्म-स्वरूप ही किन्हीं के मत में मोक्ष का हेतु है सो वह सभी निषिद्ध किया गया है, क्योंकि व्रत तप आदि अन्य-द्रव्य-स्वभाव है, उस स्वभाव से ज्ञान का परिणमन नहीं होता तथा परमार्थ-भूत मोक्ष का कारण एक द्रव्य-स्वभाव-रूप होने के कारण स्वभाव से ही ज्ञान का परिणमन होता है । (कलश--दोहा)
[एक द्रव्यस्वभावत्वात्] ज्ञान एक द्रव्य-स्वभावी होने से [ज्ञानस्वभावेन सदा] ज्ञान के स्वभाव से सदा [ज्ञानस्य भवनं वृत्तं] ज्ञान का भवन बनता है; [तत् तद् एव मोक्षहेतुः] इसलिये ज्ञान ही मोक्ष का कारण है ।ज्ञानभाव का परिणमन, ज्ञानभावमय होय । एकद्रव्यस्वभाव यह, हेतु मुक्ति का होय ॥१०६॥ (कलश--दोहा)
[द्रव्यान्तरस्वभावत्वात्] कर्म अन्य द्रव्य-स्वभावी होने से [कर्मस्वभावेन] कर्म के स्वभाव से [ज्ञानस्य भवनं न हि वृत्तं] ज्ञान का भवन नहीं बनता; [तत्] इसलिये [कर्म मोक्षहेतुः न] कर्म मोक्ष का कारण नहीं है ।कर्मभाव का परिणमन, ज्ञानरूप ना होय । द्रव्यान्तरस्वभाव यह, इससे मुकति न होय ॥१०७॥ (कलश--दोहा)
[मोक्षहेतुतिरोधानात्] कर्म मोक्ष के कारण का तिरोधान करनेवाला है, और [स्वयम् एव बन्धत्वात्] वह स्वयं ही बन्ध-स्वरूप है [च] तथा [मोक्षहेतुतिरोधायिभावत्वात्] वह मोक्ष के कारण का तिरोधायिभाव-स्वरूप है, इसीलिये [तत् निषिध्यते] उसका निषेध किया गया है ।
बंधस्वरूपी कर्म यह, शिवमग रोकनहार । इसीलिए अध्यात्म में, है निषिद्ध शतबार ॥१०८॥ |
जयसेनाचार्य :
अब निश्चय-मोक्षमार्ग का कारण ऐसा जो शुद्धात्मा का स्वरूप उससे भिन्न जो शुभाशुभ मन, वचन, काय के व्यापार रूप कर्म है वह वास्तव में मोक्ष-मार्ग नहीं हो सकता है ऐसा आगे बतलाते हैं -- [मोत्तूण णिच्छयट्ठं ववहारेण विदुसा पवट्टंति] निश्चय के विषय को छोड़कर व्यवहार के विषय में विद्वान-ज्ञानी-जीव प्रवृत्त नहीं होते हैं, क्योंकि [परमट्ठमस्सिदाण दु जदीण कम्मक्खओ होदि] सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र की एकाग्रता परिणति है लक्षण जिसका, ऐसा अपने शुद्धात्मा की भावनारूप परमार्थ को आश्रय करने वाले यतियों के ही कर्मों का क्षय होता है ॥१६३॥ |