+ अतीन्द्रिय ज्ञान भूत-भावि सूक्ष्मादि पदार्थों को जानता है -
अपदेसं सपदेसं मुत्तममुत्तं च पज्जयमजादं । (41)
पलयं गदं च जाणदि तं णाणमदिंदियं भणियं ॥42॥
अप्रदेशं सप्रदेशं मूर्तममूर्तं च पर्ययमजातम् ।
प्रलयं गतं च जानाति तज्ज्ञानमतीन्द्रियं भणितम् ॥४१॥
सप्रदेशी अप्रदेशी मूर्त और अमूर्त को
अनुत्पन्न विनष्ट को जाने अतीन्द्रिय ज्ञान ही ॥४२॥
अन्वयार्थ : [अप्रदेशं] जो ज्ञान अप्रदेश को, [सप्रदेशं] सप्रदेश को, [मूर्तं] मूर्त को, [अमूर्त: च] और अमूर्त को तथा [अजातं] अनुत्पन्न [च] और [प्रलयंगतं] नष्ट [पर्यायं] पर्याय को [जानाति] जानता है, [तत् ज्ञानं] वह ज्ञान [अतीन्द्रियं] अतीन्द्रिय [भणितम्‌] कहा गया है ॥४१॥
Meaning : The knowledge which knows objects that are without spacepoints - kalanu or anu, with space-points - pancastikaya, with form - pudgala, without form - jiva etc., the modes of the future that are yet to originate, and the modes of the past that have vanished, is the perfect-knowledge (omniscience or kevalagyaana), that is beyond the five senses - atindriya gyaana.

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथातीन्द्रियज्ञानस्य तु यद्यदुच्यते तत्तत्संभवतीति संभावयति –

इन्द्रियज्ञानं नाम उपदेशान्त:करणेन्द्रियादीनि विरूपकारणत्वेनोपलब्धिसंस्कारादीन्‌ अन्तरङ्गस्वरूपकारणत्वेनोपादाय प्रवर्तते; प्रवर्तमानं च सप्रदेशमेवाध्यवस्यति स्थूलोप-लम्भकत्वान्नाप्रदेशम्‌; मूर्तमेवावगच्छति तथाविधविषयनिबन्धनसद्भावान्नामूर्तम्‌; वर्तमानमेव परिच्छिनत्ति विषयविषयिसन्निपातसद्भावान्न तु वृत्तं वर्त्स्यच्च । यत्तु पुनरनावरणमतीन्द्रियं ज्ञानं तस्य समिद्धधूमध्वजस्येवानेकप्रकारतालिङ्गितं दाह्यं दाह्य-तानतिक्रमाद्दाह्यमेव यथा तथात्मन: अप्रदेशं सप्रदेशं मूर्तममूर्तमजातमतिवाहितं च पर्यायजातं ज्ञेयतानतिक्रमात्परिच्छेद्यमेव भवतीति ॥४१॥



अब, ऐसा स्पष्ट करते हैं कि अतीन्द्रिय-ज्ञान के लिये जो जो कहा जाता है वह (सब) संभव है :-

इन्द्रिय-ज्ञान उपदेश, अन्तःकरण और इन्द्रिय इत्यादि को विरूप-कारणता से (ग्रहण करके) और उपलब्धि (क्षयोपशम), संस्कार इत्यादिको अंतरंग स्वरूप-कारणता से ग्रहण करके प्रवृत्त होता है; और वह प्रवृत्त होता हुआ सप्रदेश को ही जानता है क्योंकि वह स्थूल को जाननेवाला है, अप्रदेश को नहीं जानता, (क्योंकि वह सूक्ष्म को जाननेवाला नहीं है); वह मूर्त को ही जानता है क्योंकि वैसे (मूर्तिक) विषय के साथ उसका सम्बन्ध है, वह अमूर्त को नहीं जानता (क्योंकि अमूर्तिक विषय के साथ इन्द्रियज्ञान का सम्बन्ध नहीं है); वह वर्तमान को ही जानता है, क्योंकि विषय-विषयी के सन्निपात सद्भाव है, वह प्रवर्तित हो चुकनेवाले को और भविष्य में प्रवृत्त होनेवाले को नहीं जानता (क्योंकि इन्द्रिय और पदार्थ के सन्निकर्ष का अभाव है)

परन्तु जो अनावरण अतीन्द्रिय ज्ञान है उसे अपने अप्रदेश, सप्रदेश, मूर्त और अमूर्त (पदार्थ मात्र) तथा अनुत्पन्न एवं व्यतीत पर्यायमात्र, ज्ञेयता का अतिक्रमण न करने से ज्ञेय ही है-जैसे प्रज्वलित अग्नि को अनेक प्रकार का ईंधन, दाह्यता का अतिक्रमण न करने से दाह्य ही है । (जैसे प्रदीप्त अग्नि दाह्यमात्र को-ईंधनमात्र को - जला देती है, उसीप्रकार निरावरण ज्ञान ज्ञेयमात्र को - द्रव्य-पर्याय मात्र को - जानता है)

विरूप = ज्ञान के स्वरूप से भिन्न स्वरूपवाले । (उपदेश, मन और इन्द्रियाँ पौद्गलिक होने से उनका रूप ज्ञान के स्वरूप से भिन्न है । वे इन्द्रियज्ञान में बहिरंग कारण हैं)
उपलब्धि = ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम के निमित्त से पदार्थों को जानने की शक्ति (यह 'लब्ध' शक्ति जब 'उपयुक्त' होती हैं तभी पदार्थ जानने में आते है)
संस्कार = भूतकाल में जाने हुये पदार्थों की धारणा ।
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथातीन्द्रियज्ञानमतीतानागतसूक्ष्मादिपदार्थान् जानातीत्युपदिशति -
-अपदेसं अप्रदेशं कालाणुपरमाण्वादिसपदेसं शुद्धजीवास्तिकायादिपञ्चास्तिकायस्वरूपं मुत्तं मूर्तं पुद्गलद्रव्यं अमुत्तं च अमूर्तं चशुद्धजीवद्रव्यादि पज्जयमजादं पलयं गदं च पर्यायमजातं भाविनं प्रलयं गतं चातीतमेतत्सर्वं पूर्वोक्तं ज्ञेयंवस्तु जाणदि जानाति यद्ज्ञानं कर्तृ तं णाणमदिंदियं भणियं तद्ज्ञानमतीन्द्रियं भणितं, तेनैव सर्वज्ञोभवति । तत एव च पूर्वगाथोदितमिन्द्रियज्ञानं मानसज्ञानं च त्यक्त्वा ये निर्विकल्पसमाधि-रूपस्वसंवेदनज्ञाने समस्तविभावपरिणामत्यागेन रतिं कुर्वन्ति त एव परमाह्लादैकलक्षणसुखस्वभावं सर्वज्ञपदं लभन्ते इत्यभिप्रायः ॥४१॥
एवमतीतानागतपर्याया वर्तमानज्ञाने प्रत्यक्षा न भवन्तीति बौद्धमतनिराकरणमुख्यत्वेन गाथात्रयं, तदनन्तरमिन्द्रियज्ञानेन सर्वज्ञो न भवत्यतीन्द्रियज्ञानेन भवतीति नैयायिकमतानुसारिशिष्यसंबोधनार्थं च गाथाद्वयमिति समुदायेन पञ्चमस्थले गाथापञ्चकं गतम् ॥


[अपदेसं] अप्रदेशी--कालाणु, परमाणु आदि (एक प्रदेशी द्रव्य), [सपदेसं] शुद्ध जीवास्तिकाय आदि पाँच अस्तिकाय स्वरूप (बहुप्रदेशी द्रव्य), [मुत्तं] मूर्तिक पुद्गल द्रव्य, [अमुत्तं च] और शुद्ध जीव द्रव्यादि अमूर्तिक द्रव्य [पज्जयमजादं पलयं गयं च] अनुत्पन्न भावि तथा नष्ट हुई भूतकालीन पर्यायें -- पूर्वोक्त इन सभी ज्ञेय वस्तुओं को, [जाणदि] जो ज्ञानरूप कर्ता जानता है, [तं णाणमदिंदियं भणियं] उस ज्ञान को अतीन्द्रिय ज्ञान कहते हैं उससे ही सर्वज्ञ होते हैं ।

इसलिये पहले (४१ वी) गाथा में कहे गये इन्द्रिय-ज्ञान और मानस-ज्ञान को छोड़कर जो समस्त विभाव परिणामों के त्याग पूर्वक निर्विकल्प समाधिरूप स्वसंवेदन-ज्ञान में प्रीति करते हैं, वे ही परमाह्लाद एक लक्षण स्वभाव वाले सर्वज्ञ पद को प्राप्त करते हैं - यह अभिप्राय है ।

इसप्रकार भूत-भावि पर्यायें वर्तमान ज्ञान में प्रत्यक्ष नहीं होती है - इस मान्यता वाले बौद्धमत के निराकरण की मुख्यता से तीन गाथायें, और उसके बाद नैयायिक मतानुसारि शिष्य के सम्बोधन के लिए इन्द्रिय-ज्ञान से सर्वज्ञ नहीं होते अतीन्द्रिय-ज्ञान से सर्वज्ञ होते हैं - इसप्रकार दो गाथायें -- इसप्रकार समूहरूप से पाँचवें स्थल में पाँच गाथायें पूर्ण हुईं ।