
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ शुभोपयोगसाध्यत्वेनेन्द्रियसुखमाख्याति - अयमात्मेन्द्रियसुखसाधनीभूतस्य शुभोपयोगस्य सामर्थ्यात्तदधिष्ठानभूतानां तिर्यग्मानुषदेवत्वभूमिकानामन्यतमां भूमिकामवाप्य यावत्कालमवतिष्ठते, तावत्कालमनेकप्रकारमिन्द्रियसुखं समासादयतीति ॥७०॥ यह आत्मा इन्द्रिय-सुख के साधनभूत शुभोपयोग की सामर्थ्य से उसके अधिष्ठान-भूत (इन्द्रियसुख के स्थानभूत-आधारभूत ऐसी) तिर्यंच, मनुष्य और देवत्व की भूमिकाओं में से किसी एक भूमिका को प्राप्त करके जितने समय तक (उसमें) रहता है, उतने समय तक अनेक प्रकार का इन्द्रिय-सुख प्राप्त करता है ॥७०॥ |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ पूर्वोक्तशुभोपयोगेन साध्यमिन्द्रियसुखं कथयति -- सुहेणजुत्तो आदा यथा निश्चयरत्नत्रयात्मकशुद्धोपयोगेन युक्तो मुक्तो भूत्वाऽयं जीवोऽनन्तकालमतीन्द्रियसुखंलभते, तथा पूर्वसूत्रोक्तलक्षणशुभोपयोगेन युक्तः परिणतोऽयमात्मा तिरिओ वा माणुसो व देवो वा भूदो तिर्यग्मनुष्यदेवरूपो भूत्वा तावदि कालं तावत्कालं स्वकीयायुःपर्यन्तं लहदि सुहं इंदियं विविहं इन्द्रियजंविविधं सुखं लभते, इति सूत्राभिप्रायः ॥७०॥ अब पूर्वोक्त शुभोपयोग द्वारा साध्य इन्द्रिय-सुख को कहते हैं - [सुहेण जुत्तो आदा] - जैसे निश्चय रत्नत्रयात्मक शुद्धोपयोग से सहित यह जीव, मुक्त होकर अनन्तकाल तक अतीन्द्रिय सुख पाता रहता है; उसी प्रकार पूर्व गाथा (७३ गाथा) में कहे लक्षण वाले शुभोपयोग से सहित - परिणत यह आत्मा [तिरियो वा माणुसो वा देवो वा भूदो] - तिर्यंच, मनुष्य अथवा देव होकर [तावदि कालं] - अपनी आयु पर्यन्त [लहदि सुहं इंदियं विविहं] - इन्द्रियजन्य विविध सुखों को प्राप्त करता है - यह गाथा का अभिप्राय है । |