+ शुभोपयोग साधन है और उनका साध्य इन्द्रियसुख है -
जुत्तो सुहेण आदा तिरिओ वा माणुसो व देवो वा । (70)
भूदो तावदि कालं लहदि सुहं इन्दियं विविहं ॥74॥
युक्तः शुभेन आत्मा तिर्यग्वा मानुषो वा देवो वा ।
भूतस्तावत्कालं लभते सुखमैन्द्रियं विविधम् ॥७०॥
अरे शुभ उपयोग से जो युक्त वह तिर्यग्गति
अर देव मानुष गति में रह प्राप्त करता विषयसुख ॥७४॥
अन्वयार्थ : [शुभेन युक्त:] शुभोपयोग-युक्त [आत्मा] आत्मा [तिर्यक् वा] तिर्यंच, [मानुष: वा] मनुष्य [देव: वा] अथवा देव [भूत:] होकर, [तावत्कालं] उतने समय तक [विविधं] विविध [ऐन्द्रियं सुखं] इन्द्रिय-सुख [लभते] प्राप्त करता है ॥७०॥
Meaning : The soul endowed with auspicious-cognition (shubhopayoga) is born as worthy sub-human (plant or animal), human, or celestial being, and, during such existence, obtains an assortment of sensual-pleasures.

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ शुभोपयोगसाध्यत्वेनेन्द्रियसुखमाख्याति -

अयमात्मेन्द्रियसुखसाधनीभूतस्य शुभोपयोगस्य सामर्थ्यात्तदधिष्ठानभूतानां तिर्यग्मानुषदेवत्वभूमिकानामन्यतमां भूमिकामवाप्य यावत्कालमवतिष्ठते, तावत्कालमनेकप्रकारमिन्द्रियसुखं समासादयतीति ॥७०॥


यह आत्मा इन्द्रिय-सुख के साधनभूत शुभोपयोग की सामर्थ्य से उसके अधिष्ठान-भूत (इन्द्रियसुख के स्थानभूत-आधारभूत ऐसी) तिर्यंच, मनुष्य और देवत्व की भूमिकाओं में से किसी एक भूमिका को प्राप्त करके जितने समय तक (उसमें) रहता है, उतने समय तक अनेक प्रकार का इन्द्रिय-सुख प्राप्त करता है ॥७०॥
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ पूर्वोक्तशुभोपयोगेन साध्यमिन्द्रियसुखं कथयति --
सुहेणजुत्तो आदा यथा निश्चयरत्नत्रयात्मकशुद्धोपयोगेन युक्तो मुक्तो भूत्वाऽयं जीवोऽनन्तकालमतीन्द्रियसुखंलभते, तथा पूर्वसूत्रोक्तलक्षणशुभोपयोगेन युक्तः परिणतोऽयमात्मा तिरिओ वा माणुसो व देवो वा भूदो तिर्यग्मनुष्यदेवरूपो भूत्वा तावदि कालं तावत्कालं स्वकीयायुःपर्यन्तं लहदि सुहं इंदियं विविहं इन्द्रियजंविविधं सुखं लभते, इति सूत्राभिप्रायः ॥७०॥


अब पूर्वोक्त शुभोपयोग द्वारा साध्य इन्द्रिय-सुख को कहते हैं -

[सुहेण जुत्तो आदा] - जैसे निश्चय रत्नत्रयात्मक शुद्धोपयोग से सहित यह जीव, मुक्त होकर अनन्तकाल तक अतीन्द्रिय सुख पाता रहता है; उसी प्रकार पूर्व गाथा (७३ गाथा) में कहे लक्षण वाले शुभोपयोग से सहित - परिणत यह आत्मा [तिरियो वा माणुसो वा देवो वा भूदो] - तिर्यंच, मनुष्य अथवा देव होकर [तावदि कालं] - अपनी आयु पर्यन्त [लहदि सुहं इंदियं विविहं] - इन्द्रियजन्य विविध सुखों को प्राप्त करता है - यह गाथा का अभिप्राय है ।