+ पुन: पुण्य-जन्य इन्द्रिय-सुख को अनेक पकार से दुःखरूप प्रकाशित करते हैं -
सपरं बाधासहियं विच्छिण्णं बंधकारणं विसमं । (76)
जं इंदिएहि लद्धं तं सोक्खं दुक्खमेव तहा ॥80॥
सपरं बाधासहितं विच्छिन्नं बन्धकारणं विषमम् ।
यदिन्द्रियैर्लब्धं तत्सौख्यं दुःखमेव तथा ॥७६॥
इन्द्रियसुख सुख नहीं दुख है विषम बाधा सहित है
है बंध का कारण दुखद परतंत्र है विच्छिन्न है ॥८०॥
अन्वयार्थ : [यत्] जो [इन्द्रियै: लब्धं] इन्द्रियों से प्राप्त होता है [तत् सौख्य] वह सुख [सपरं] पर-सम्बन्ध-युक्त, [बाधासहितं] बाधासहित [विच्छिन्नं] विच्छिन्न [बंधकारणं] बंधका कारण [विषमं] और विषम है; [तथा] इस प्रकार [दुःखम् एव] वह दुःख ही है ॥७६॥
Meaning : The happiness brought about by the senses is misery in disguise as it is dependent, with impediments, transient, cause of bondage of karmas, and fluctuating.

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ पुनरपि पुण्यजन्यस्येन्द्रियसुखस्य बहुधा दु:खत्वमुद्योतयति -

सपररत्वात्‌ बाधासहितत्वात्‌ विच्छिन्नत्वात्‌ बंधकारणत्वात्‌ विषमत्वाच्च पुण्यजन्यमपीन्द्रियसुखं दु:खमेव स्यात्‌ । सपरं हि सत्‌ परप्रत्ययत्वात्‌ पराधीनतया, बाधासहितं हि सदशनायोदन्यावृषस्यादिभिस्तृष्णाव्यक्तिभिरुपेतत्वात्‌ अत्यन्ताकुलतया, विच्छिन्नं हि सदसद्वेद्योदयप्रच्यावितसद्वेद्योदयप्रवृत्ततयाऽनुभवत्वादुद्‌भूतविपक्षतया, बंधकारणं हि सद्विषयोपभोगमार्गानुलग्नरागादिदोषसेनानुसारसंगच्छमानघनकर्मपांसुपटलत्वादुदर्कदु:सहतया, विषमं हि सदभिवृद्धिपरिहाणिपरिणतत्वादत्यन्तविसंष्ठुलतया च दु:खमेव भवति । अथैवं पुण्यमपि पापवद्‌ दु:खसाधनमायातम्‌ ॥७६॥



पर-सम्बन्ध-युक्त होने से, बाधा सहित होने से, विच्छन्न होने से, बन्ध का कारण होने से, और विषम होने से - इन्द्रियसुख, पुण्यजन्य होने पर भी, दुःख ही है ।

इन्द्रियसुख
  1. 'पर के सम्बन्धवाला' होता हुआ पराश्रयता के कारण पराधीन है,
  2. बाधासहित होता हुआ खाने, पीने और मैथुन की इच्छा इत्यादि तृष्णा की व्यक्तियों से (तृष्णा की प्रगटताओं से) युक्त होने से अत्यन्त आकुल है,
  3. 'विच्छिन्न' होता हुआ असाता-वेदनीय का उदय जिसे च्युत कर देता है ऐसे साता-वेदनीय के उदय से प्रवर्तमान होता हुआ अनुभव में आता है, इसलिये विपक्ष की उत्पत्तिवाला है,
  4. 'बन्ध का कारण' होता हुआ विषयोपभोग के मार्ग में लगी हुई रागादि दोषों की सेना के अनुसार कर्म-रज के घन-पटल का सम्बन्ध होने के कारण परिणाम से दु:सह है, और
  5. 'विषम' होता हुआ हानि- वृद्धि में परिणमित होने से अत्यन्त अस्थिर है;
इसलिये वह (इन्द्रियसुख) दुःख ही है । जब कि ऐसा है (इन्द्रियसुख दुःख ही है) तो पुण्य भी, पाप की भाँति, दुख का साधन है ऐसा फलित हुआ ॥७६॥

च्युत करना = हटा देना; पदभ्रष्ट करना; (साता-वेदनीय का उदय उसकी स्थिति अनुसार रहकर हट जाता है और असाता-वेदनीय का उदय आता है)
घन पटल = सघन (गाढ) पर्त, बड़ा झुण्ड
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ पुनरपि पुण्योत्पन्नस्येन्द्रियसुखस्य बहुधा दुःखत्वं प्रकाशयति --
सपरं सह परद्रव्यापेक्षया वर्ततेसपरं भवतीन्द्रियसुखं, पारमार्थिकसुखं तु परद्रव्यनिरपेक्षत्वादात्माधीनं भवति । बाधासहिदं तीव्रक्षुधा-तृष्णाद्यनेकबाधासहितत्वाद्बाधासहितमिन्द्रियसुखं, निजात्मसुखं तु पूर्वोक्तसमस्तबाधारहितत्वादव्याबाधम् । विच्छिण्णं प्रतिपक्षभूतासातोदयेन सहितत्वाद्विच्छिन्नं सान्तरितं भवतीन्द्रियसुखं,अतीन्द्रियसुखं तु प्रतिपक्षभूतासातोदयाभावान्निरन्तरम् । बंधकारणं दृष्टश्रुतानुभूतभोगाकाङ्क्षा-प्रभृत्यनेकापध्यानवशेन भाविनरकादिदुःखोत्पादककर्मबन्धोत्पादकत्वाद्बन्धकारणमिन्द्रियसुखं, अतीन्द्रिय-सुखं तु सर्वापध्यानरहितत्वादबन्धकारणम् । विसमं विगतः शमः परमोपशमो यत्र तद्विषममतृप्तिकरंहानिवृद्धिसहितत्वाद्वा विषमं, अतीन्द्रियसुखं तु परमतृप्तिकरं हानिवृद्धिरहितम् । जं इंदिएहिं लद्धं तं सोक्खंदुक्खमेव तहा यदिन्द्रियैर्लब्धं संसारसुखं तत्सुखं यथा पूर्वोक्तपञ्चविशेषणविशिष्टं भवति तथैवदुःखमेवेत्यभिप्रायः ॥७६॥
एवं पुण्यानि जीवस्य तृष्णोत्पादकत्वेन दुःखकारणानि भवन्तीति कथनरूपेणद्वितीयस्थले गाथाचतुष्टयं गतम् ।



  • [सपरं] - पर-द्रव्य की अपेक्षा वाला होने से सपर-पराधीन है, और पारमार्थिक सुख परद्रव्य से निरपेक्ष होने के कारण स्वाधीन है ।
  • [बाधासहियं] - इन्द्रिय-सुख तीव्र क्षुधा (भूख), तृष्णा आदि अनेक बाधाओं से सहित होने के कारण विघ्न-सहित है । और निजात्म-सुख पूर्वोक्त सब बाधाओं से रहित होने के कारण अव्याबाध निर्विघ्न है ।
  • [विच्छिण्णं] - इन्द्रिय-सुःख अपने विरोधी असाता के उदय सहित होने के कारण विच्छिन्न - अन्तर सहित - खण्डित है और अतीन्द्रिय सुख अपने विरोधी असाता के उदय का अभाव होने से अविच्छिन्न - अन्तर रहित - अखण्डित है ।
  • [बंधकारणं] - इन्द्रिय-सुख देखे हुए, सुने हुए, भोगे हुए भोगों की इच्छा को लेकर (इच्छा से) होने वाले अनेक प्रकार के अपध्यानों (खोटे-ध्यानों) के वश भविष्य काल में नरकादि दु:खों को उत्पन्न करने वाले कर्म-बंध का उत्पादक होने से बंध का कारण है, और अतीन्द्रिय-सुख सम्पूर्ण अपध्यानों रहित होने के कारण बन्ध का कारण नहीं है ।
  • [विसमं] - वह शम अर्थात् परमोपशम से रहित अथवा संतुष्टि कारक नहीं होने से या हानि-वृद्धि सहित होने के कारण विषम है और अतीन्द्रिय सुख परम संतुष्टि कारक तथा हानि-वृद्धि रहित है ।
[जं इंदियेहिं लद्धं तं सोक्खं दुक्खमेव तहा] - जो इन्द्रियों से प्राप्त संसार-सुख है, वह सुख जिस प्रकार पूर्वोक्त पाँच विशेषणों सहित है, उसी प्रकार दुःख ही है - यह अभिप्राय है ।

इस प्रकार पुण्य जीव की तृष्णा के उत्पादक होने से दुःख के कारण हैं - इस कथनरूप से दूसरे स्थल में चार गाथायें पूर्ण हुईं ।