
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथैवं प्राप्तचिन्तामणेरपि मे प्रमादो दस्युरिति जागर्ति - एवमुपवर्णितस्वरूपेणोपायेन मोहमपसार्यापि सम्यगात्मतत्त्वमुपलभ्यापि यदि नाम रागद्वेषौ निर्मूलयति तदा शुद्धमात्मानमनुभवति । यदि पुन: पुनरपि तावनुवर्तते तदा प्रमादतन्त्रतया लुण्ठितशुद्धात्मतत्त्वोपलम्भचिन्तारत्नोऽन्तस्ताम्यति । अतो मया रागद्वेषनिषेधायात्यन्तं जागरितव्यम् ॥८१॥ इस प्रकार जिस उपाय का स्वरूप वर्णन किया है, उस उपाय के द्वारा मोह को दूर करके भी सम्यक् आत्म-तत्त्व को (यथार्थ स्वरूप को) प्राप्त करके भी यदि जीव राग-द्वेष को निर्मूल करता है, तो शुद्ध आत्मा का अनुभव करता है । (किन्तु) यदि पुन:-पुन: उनका अनुसरण करता है, -रागद्वेषरूप परिणमन करता है, तो प्रमाद के अधीन होने से शुद्धात्म-तत्त्व के अनुभव रूप चिंतामणि-रत्न के चुराये जाने से अन्तरंग में खेद को प्राप्त होता है । इसलिये मुझे रागद्वेष को दूर करने के लिये अत्यन्त जाग्रत रहना चाहिये ॥८१॥ |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ प्रमादोत्पादकचारित्रमोहसंज्ञश्चौरोऽस्तीतिमत्वाऽऽप्तपरिज्ञानादुपलब्धस्य शुद्धात्मचिन्तामणेः रक्षणार्थं जागर्तीति कथयति -- जीवो जीवः कर्ता । किंविशिष्टः । ववगदमोहो शुद्धात्मतत्त्वरुचिप्रतिबन्धकविनाशितदर्शनमोहः । पुनरपि किंविशिष्टः । उवलद्धो उपलब्धवान् ज्ञातवान् । किम् । तच्चं परमानन्दैकस्वभावात्मतत्त्वम् । कस्य संबन्धि । अप्पणो निजशुद्धात्मनः । कथम् । सम्मं सम्यक् संशयादिरहितत्वेन जहदि जदि रागदोसे शुद्धात्मानुभूति-लक्षणवीतरागचारित्रप्रतिबन्धकौ चारित्रमोहसंज्ञौ रागद्वेषौ यदि त्यजति सो अप्पाणं लहदि सुद्धं स एवमभेदरत्नत्रयपरिणतो जीवः शुद्धबुद्धैकस्वभावमात्मानं लभते मुक्तो भवतीति । किंच पूर्वंज्ञानकण्डिकायां 'उवओगविसुद्धो सो खवेदि देहुब्भवं दुक्खं' इत्युक्तं, अत्र तु 'जहदि जदि रागदोसे सो अप्पाणं लहदि सुद्धं' इति भणितम्, उभयत्र मोक्षोऽस्ति । को विशेषः । प्रत्युत्तरमाह -- तत्रशुभाशुभयोर्निश्चयेन समानत्वं ज्ञात्वा पश्चाच्छुद्धे शुभरहिते निजस्वरूपे स्थित्वा मोक्षं लभते, तेन कारणेन शुभाशुभमूढत्वनिरासार्थं ज्ञानकण्डिका भण्यते । अत्र तु द्रव्यगुणपर्यायैराप्तस्वरूपं ज्ञात्वापश्चात्तद्रूपे स्वशुद्धात्मनि स्थित्वा मोक्षं प्राप्नोति, ततः कारणादियमाप्तात्ममूढत्वनिरासार्थं ज्ञानकण्डिका इत्येतावान् विशेषः ॥८७॥ [जीवो] जीवरूप कर्ता - इस गाथा में कर्ता कारक में प्रयुक्त जीव । वह जीव किस विशेषता वाला है । [ववगदमोहो] शुद्धात्म-तत्त्व की रुचि को रोकने वाले दर्शन-मोह से रहित है । वह और किस विशेषता वाला है? [उवलद्धो] जानने वाला है । किसे जानने वाला है? [तच्चं] परमानन्द एक स्वभावी आत्म-तत्त्व को जानने वाला है । किसके आत्म-तत्त्व को जाननेवाला है? [अप्पणो] निज शुद्धात्मा सम्बन्धी आत्म-तत्त्व को जानने वाला है । निज शुद्धात्म-तत्व को कैसे जानता है? [सम्मं] संशयादि दोषों से रहित होने के कारण अच्छी तरह जानता है । [जहदि जदि रागदोसे] यदि शुद्धात्मानुभूति लक्षण वीतराग-चारित्र को रोकने वाले चारित्र-मोह नामक राग-द्वेष को छोड़ता है, [सो अप्पाणं लहदि सुद्धं] वही अभेद रत्नत्रय परिणत जीव शुद्ध-बुद्ध एक स्वभावी आत्मा को प्राप्त करता है - मुक्त होता है । यहाँ प्रश्न है कि पहली ज्ञान कण्डिका में - उवओगविसुद्धो सो खवेदि देहुब्भवं दुक्खं -- (गाथा ८२ उत्तरार्द्ध) उपयोग की विशुद्धि (शुद्धोपयोग) वाला वह जीव, देहज दुःखों का क्षय करता है। - ऐसा कहा गया है और यहाँ - जहदि जदि रागदोसे सो अप्पाणं लहदि सुद्धं -- (प्रकृत गाथा उत्तरार्द्ध) यदि वह राग-द्वेष को छोड़ता है तो शुद्धात्मा को प्राप्त करता है - ऐसा कहा गया है । दोनों ही गाथाओं से मोक्ष फलित होता है; अन्तर क्या है? आचार्य उसके प्रति उत्तर कहते हैं -- वहाँ (गाथा ८२ मे) निश्चय से शुभाशुभ में समानता जानकर, बाद में शुभ रहित निज शुद्धस्वरूप में लीन होकर मोक्ष प्राप्त करता है, इस कारण शुभाशुभ-मूढ़ता के निराकरण के लिये (वह) ज्ञानकण्डिका कही गई है । और यहाँ द्रव्य-गुण-पर्याय से आप्त का स्वरूप जानकर, बाद में उसरूप स्व-शुद्धात्मा में लीन होकर मोक्ष प्राप्त करता है, इस कारण यह आप्त और आत्म-स्वरूप विषयक मूढ़ता के निराकरण के लिए ज्ञान-कण्डिका है - इन दोनों में इतना ही अन्तर है । |