
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ मोहक्षपणोपायान्तरमालोचयति - यत्किल द्रव्यगुणपर्यायस्वभावेनार्हतो ज्ञानादात्मनस्तथाज्ञानं मोहक्षपणोपायत्वेन प्राक् प्रतिपन्नम्, तत् खलूपायान्तरमिदपेक्षते । इदं हि विहितप्रथमभूमिकासंक्रमणस्य सर्वज्ञोपज्ञतया सर्वतोऽप्यबाधितं शाब्दं प्रमाणमाक्रम्य क्रीडतस्तत्संस्कारस्फुटीकृतविशिष्टसंवेदनशक्तिसंपद: सहृदयहृदयानंदोद्भेददायिना प्रत्यक्षेणान्येन वा तदविरोधिना प्रमाणजातेन तत्त्वत: समस्तमपि वस्तुजातं परिच्छिन्दत: क्षीयत एवातत्त्वाभिनिवेशसंस्कारकारी मोहोपचय: । अतो हि मोहक्षपणे परमं शब्दब्रह्मोपासनं भावज्ञानावष्टम्भदृढीकृतपरिणामेन सम्यगधीयमानमुपायान्तरम् ॥८६॥ द्रव्य-गुण-पर्याय स्वभाव से अर्हन्त के ज्ञान द्वारा आत्मा का उस प्रकार का ज्ञान मोह-क्षय के उपाय के रूप में पहले (८० वीं गाथा में) प्रतिपादित किया गया था, वह वास्तव में इस (निम्न-लिखित) उपायान्तर की अपेक्षा रखता है । (वह उपायान्तर क्या है सो कहा जाता है) : - जिसने प्रथम भूमिका में गमन किया है ऐसे जीव को, जो १सर्वज्ञोपज्ञ होने से सर्व प्रकार से अबाधित है ऐसे, शब्द प्रमाण को (द्रव्य श्रुत-प्रमाण को) प्राप्त करके क्रीड़ा करने पर, उसके संस्कार से विशिष्ट संवेदन (ज्ञान) शक्ति रूप सम्पदा प्रगट करने पर, २सहृदय-जनों के हृदय को आनन्द का ३उद्भेद देने वाले प्रत्यक्ष प्रमाण से अथवा उससे (प्रत्यक्ष प्रमाण से) अविरुद्ध अन्य प्रमाण समूह से १तत्त्वतः समस्त वस्तु-मात्र को जानने पर १अतत्त्व-अभिनिवेश के संस्कार करने वाला मोहोपचय (मोहसमूह) अवश्य ही क्षय को प्राप्त होता है । इसलिये मोह का क्षय करने में, परम शब्द-ब्रह्म की उपासना का भाव-ज्ञान के अवलम्बन द्वारा दृढ़ किये गये परिणाम से सम्यक् प्रकार अभ्यास करना सो उपायान्तर है । (जो परिणाम भाव-ज्ञान के अवलम्बन से दृढ़ीकृत हो ऐसे परिणाम से द्रव्य-श्रुत का अभ्यास करना सो मोह-क्षय करने के लिये उपायान्तर है) ॥८६॥ १सर्वज्ञोपज्ञ = सर्वज्ञ द्वारा स्वयं जाना हुआ (और कहा हुआ) २सहृदय = भावुक; शास्त्र में जिस समय जिस भाव का प्रसंग होय उस भाव को हृदय में ग्रहण करने वाला; बुध; पंडित ३उद्भेद = स्फुरण; प्रगटता; फुवारा |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ द्रव्यगुणपर्यायपरिज्ञानाभावे मोहो भवतीति यदुक्तं पूर्वंतदर्थमागमाभ्यासं कारयति । अथवा द्रव्यगुणपर्यायत्वैरर्हत्परिज्ञानादात्मपरिज्ञानं भवतीति यदुक्तंतदात्मपरिज्ञानमिममागमाभ्यासमपेक्षत इति पातनिकाद्वयं मनसि धृत्वा सूत्रमिदं प्रतिपादयति — जिणसत्थादो अट्ठे पच्चक्खादीहिं बुज्झदो णियमा जिनशास्त्रात्सकाशाच्छुद्धात्मादिपदार्थान् प्रत्यक्षादि-प्रमाणैर्बुध्यमानस्य जानतो जीवस्य नियमान्निश्चयात् । किं फलं भवति । खीयदि मोहोवचयोदुरभिनिवेशसंस्कारकारी मोहोपचयः क्षीयते प्रलीयते क्षयं याति । तम्हा सत्थं समधिदव्वं तस्माच्छास्त्रंसम्यगध्येतव्यं पठनीयमिति । तद्यथा – वीतरागसर्वज्ञप्रणीतशास्त्रात् 'एगो मे सस्सदो अप्पा' इत्यादिपरमात्मोपदेशकश्रुतज्ञानेन तावदात्मानं जानीते कश्चिद्भव्यः, तदनन्तरं विशिष्टाभ्यासवशेन परमसमाधिकाले रागादिविकल्परहितमानसप्रत्यक्षेण च तमेवात्मानं परिच्छिनत्ति, तथैवानुमानेन वा । तथाहि — अत्रैव देहे निश्चयनयेन शुद्धबुद्धैकस्वभावः परमात्मास्ति । कस्माद्धेतोः । निर्विकारस्वसंवेदन-प्रत्यक्षत्वात् सुखादिवत् इति, तथैवान्येऽपि पदार्था यथासंभवमागमाभ्यासबलोत्पन्नप्रत्यक्षेणानुमानेन वा ज्ञायन्ते । ततो मोक्षार्थिना भव्येनागमाभ्यासः कर्तव्य इति तात्पर्यम् ॥८६॥ [जिणसत्थादो अट्ठे पच्चक्खादीहिं बुज्झदो णियमा] जिन-शास्त्र से प्रत्यक्षादि प्रमाणों द्वारा शुद्धात्मादि पदार्थों को जाननेवाले जीव का निश्चय से । उन्हें जानने का क्या फल है? [खीयदि मोहोवचयो] - उन्हें जानने से विपरीत अभिप्रायरूप संस्कार करनेवाला मोह समूह नष्ट हो जाता है । [तम्हा सत्थं समधिदव्वं] - इसलिये शास्त्र का अच्छी तरह से अध्ययन करना चाहिये । वह इसप्रकार - कोई भव्य,
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