+ स्व-पर के विवेक की सिद्धि से ही मोह का क्षय हो सकता है, इसलिये स्व-पर के विभाग की सिद्धि के लिये प्रयत्न करते हैं -
णाणप्पगमप्पाणं परं च दव्वत्तणाहिसंबद्धं । (89)
जाणदि जदि णिच्छयदो जो सो मोहक्खयं कुणदि ॥96॥
ज्ञानात्मकमात्मानं परं च द्रव्यत्वेनाभिसंबद्धम् ।
जानाति यदि निश्चयतो यः स मोहक्षयं करोति ॥८९॥
जो जानता ज्ञानात्मक निजरूप अर परद्रव्य को
वह नियम से ही क्षय करे दृगमोह एवं क्षोभ को ॥९६॥
अन्वयार्थ : [यः] जो [निश्चयत:] निश्चय से [ज्ञानात्मकं आत्मानं] ज्ञानात्मक ऐसे अपने को [च] और [परं] पर को [द्रव्यत्वेन अभिसंबद्धम्] निज-निज द्रव्यत्व से संबद्ध (संयुक्त) [यदि जानाति] जानता है, [सः] वह [मोह क्षयं करोति] मोह का क्षय करता है ॥८९॥
Meaning : The man who knows, with certainty, that he (his soul) is a substance (dravya) established in own knowledge-nature, and all external substances are similarly established in their own nature, destroys delusion (moha).

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ स्वपरविवेकसिद्धेरेव मोहक्षपणं भवतीति स्वपरविभागसिद्धये प्रयतते -

य एव स्वकीयेन चैतन्यात्मकेन द्रव्यत्वेनाभिसंबद्धमात्मानं परं च परकीयेन यथोचितेन द्रव्यत्वेनाभिसंबद्धमेव निश्चयत: परिच्छिनत्ति, स एव सम्यगवाप्तस्वपरविवेक: सकलं मोहं क्षपयति । अत: स्वपरविवेकाय प्रयतोऽस्मि ॥८९॥


जो निश्चय से अपने को स्वकीय (अपने) चैतन्यात्मक द्रव्यत्व से संबद्ध (संयुक्त) और पर को परकीय (दूसरे के) यथोचित द्रव्यत्व से संबद्ध जानता है, वही (जीव), जिसने कि सम्यक्त्व-रूप से स्व-पर के विवेक को प्राप्त किया है, सम्पूर्ण मोह का क्षय करता है । इसलिये मैं स्व-पर के विवेक के लिये प्रयत्नशील हूँ ॥८९॥

यथोचित = यथायोग्य-चेतन या अचेतन (पुद्गलादि द्रव्य परकीय अचेतन द्रव्यत्व से और अन्य आत्मा परकीय चेतन द्रव्यत्व से संयुक्त हैं)
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ स्वपरात्मनोर्भेद-ज्ञानात् मोहक्षयो भवतीति प्रज्ञापयति --
णाणप्पगमप्पाणं परं च दव्वत्तणाहिसंबद्धं जाणदि जदि ज्ञानात्मकमात्मानं जानाति यदि । कथंभूतम् । स्वकीयशुद्धचैतन्यद्रव्यत्वेनाभिसंबद्धं, न केवलमात्मानम्, परं चयथोचितचेतनाचेतनपरकीयद्रव्यत्वेनाभिसंबद्धम् । कस्मात् । णिच्छयदो निश्चयतः निश्चयनयानुकूलं भेदज्ञानमाश्रित्य । जो यः कर्ता सोमोहक्खयं कुणदि निर्मोहपरमानन्दैकस्वभावशुद्धात्मनोविपरीतस्य मोहस्य क्षयं करोतीति सूत्रार्थः ॥९६॥


(अब स्व-पर तत्त्व परिज्ञान विषयक मूढ़ता का निराकरण करनेवाला दो गाथाओं में निबद्ध चतुर्थ ज्ञान-कण्डिका नामक चौथा अन्तराधिकार प्रारम्भ होता है ।)

[णाणप्पगमप्पाणं परं च दव्वत्तणाहिसंबद्धं जाणदि जदि] - यदि ज्ञान-स्वरूपी आत्मा को जानता है । कैसे ज्ञान-स्वरूपी आत्मा को जानता है? अपने शुद्ध चैतन्य द्रव्यत्व से अभिसम्बद्ध - बँधे हुये - जुड़े हुये आत्मा को जानता है । मात्र अपने आत्मा को ही नहीं जानता अपितु अपने-अपने द्रव्यरूप से सम्बन्धित चेतन-अचेतन दूसरे द्रव्यों को जानता है । इन सबको कैसे जानता है? [णिच्छयदो] - निश्चयनय के अनुकूल भेदज्ञान का आश्रय लेकर जानता है । [जो] - जो कर्ता - इस वाक्य का कर्ता जो, [सो] - वह [मोहक्खयं कुणदि] - मोह रहित परमानन्द एक स्वभावी शुद्धात्मा से विपरीत मोह का क्षय करता है - यह गाथा का अर्थ है ।