+ दूसरी पातनिका - सम्यक्त्व के अभाव में श्रमण (मुनि) नहीं है, उस श्रमण से धर्म भी नहीं है । तो कैसे श्रमण हैं? एसा प्रश्न पूछने पर उत्तर देते हुए ज्ञानाधिकार का उपसंहार करते हैं -
जो णिहदमोहदिट्ठी आगमकुसलो विरागचरियम्हि । (92)
अब्भुट्ठिदो महप्पा धम्मो त्ति विसेसिदो समणो ॥99॥
यो निहतमोहदृष्टिरागमकुशलो विरागचरिते ।
अभ्युत्थितो महात्मा धर्म इति विशेषितः श्रमणः ॥९२॥
आगमकुशल दृगमोहहत आरुढ़ हों चारित्र में
बस उन महात्मन श्रमण को ही धर्म कहते शास्त्र में ॥९९॥
अन्वयार्थ : [यः आगमकुशल:] जो आगम में कुशल हैं, [निहतमोहदृष्टि:] जिसकी मोह-दृष्टि हत हो गई है और [विरागचरिते अभ्युत्थित:] जो वीतराग-चारित्र में आरुढ़ है, [महात्मा श्रमण:] उस महात्मा श्रमण को [धर्म: इति विशेषित:] (शास्त्र में) 'धर्म' कहा है ॥९२॥
Meaning : The ascetic (muni, shramana) who has destroyed the delusion-ofperception (darshanamoha), has grasped the Doctrine of Lord Jina, and is established in conduct that is rid of attachment (rāga), is 'dharma'. Such a profound ascetic is of the nature of supreme conduct (dharma).

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ —
‘उपसंपयामि सम्मं जत्ते णिव्वाणसंपत्ती’
इति प्रतिज्ञाय —
‘चारित्तं खलु धम्मो धम्मो जो सो समो त्ति णिद्दिट्ठो’
इति साम्यस्य धर्मत्वं निश्चित्य —
‘परिणमदि जेण दव्वं तक्कालं तम्मयं त्ति पण्णत्तं ।
तम्हा धम्मपरिणदो आदा धम्मो मुणेयव्वो॥’

इति यदात्मनो धर्मत्वमासूत्रयितुमुपक्रान्तं, यत्प्रसिद्धये च —
‘धम्मेण परिणदप्पा अप्पा जदि सुद्धसंपओगजुदो पावदि णिव्वाणसुहं’
इति निर्वाणसुखसाधनशुद्धोपयोगोऽधिकर्तुमारब्ध:, शुभाशुभोपयोगौ च विरोधिनौ निर्ध्वस्तौ, शुद्धोपयोगस्वरूपं चोपवर्णितं, तत्प्रसादजौ चात्मनो ज्ञानानन्दौ सहजौ समुद्योतयता संवेदनस्वरूपं सुखस्वरूपं च प्रपञ्चितम्‌, तदधुना कथं कथमपि शुद्धोपयोगप्रसादेन प्रसाध्य परमनिस्पृहामात्मतृप्तां पारमेश्वरीप्रवृत्तिमभ्युपगत: कृतकृत्यतामवाप्य नितान्तमनाकुलो भूत्वा प्रलीनभेदवासनोन्मेष स्वयं साक्षाद्धर्म एवास्मीत्यवतिष्ठते -

यदयं स्वयमात्मा धर्मो भवति स खलु मनोरथ एव । तस्य त्वेका बहिर्मोहदृष्टिरेव विहन्त्री । सा चागमकौशलेनात्मज्ञानेन च निहता, नात्र मम पुनर्भावमापत्स्यते । ततो वीतरागचारित्रसूत्रितावतारो ममायमात्मा स्वयं धर्मो भूत्वा निरस्तसमस्तप्रत्यूहतया नित्यमेव निष्कम्प एवावतिष्ठते । अलमतिविस्तरेण । स्वस्ति स्याद्वादमुद्रिताय जैनेन्द्राय शब्दब्रह्मणे । स्वस्ति तन्मूलायात्मतत्त्वोपलम्भाय च, यत्प्रसादादुद्‌ग्रन्थितो झगित्येवासंसारबद्धो मोहग्रन्थि: । स्वस्ति च परमवीतरागचारित्रात्मने शुद्धोपयोगाय, यत्प्रसादादयमात्मा स्वयमेव धर्मो भूत: ॥९२॥

(कलश-५)
आत्मा धर्म: स्वयमिति भवन्‌ प्राप्य शुद्धोपयोगं
नित्यानन्दप्रसरसरसे ज्ञानतत्त्वे निलीय
प्राप्स्यत्युच्चैरविचलतया निष्प्रकम्पप्रकाशां
स्फूर्जज्ज्योति: सहजविलसद्रत्नदीपस्य लक्ष्मीम्‌ ॥५॥


(कलश-६)
निश्चित्यात्मन्यधिकृतमिति ज्ञानतत्त्वं यथावत्‌
तत्सिद्धय्यर्थं प्रशमविषयं ज्ञेयतत्त्वं बुभुत्सु:
सर्वानर्थान्‌ कलयति गुणद्रव्यपर्याययुक्त्या
प्रादुर्भूतिर्न भवति यथा जातु मोहांकुरस्य ॥६॥

इति प्रवचनसारवृत्तै तत्त्वदीपिकायां श्रीमदमृतचन्द्रसूरिविरचितायां ज्ञानतत्त्वप्रज्ञापनो नाम प्रथम: श्रुतस्कन्ध: समाप्त: ॥




यह आत्मा स्वयं धर्म हो, यह वास्तव में मनोरथ है । उसमें विघ्न डालने वाली एक बहिर्मोह-दृष्टि ही है । और वह (बहिर्मोह-दृष्टि) तो आगम-कौशल्य तथा आत्म-ज्ञान से नष्ट हो जाने के कारण अब मुझ में पुन: उत्पन्न नहीं होगी । इसलिये वीतराग-चारित्र रूप से प्रगटता को प्राप्त (वीतराग-चारित्र रूप पर्याय में परिणत) मेरा यह आत्मा स्वयं धर्म होकर, समस्त विघ्नों का नाश हो जाने से सदा निष्कंप ही रहता है । अधिक विस्तार से बस हो ! जयवंत वर्तो स्याद्वाद-मुद्रित जैनेन्द्र शब्दब्रह्म; जयवंत वर्तो शब्दब्रह्म-मूलक आत्म-तत्त्वोपलब्धि-कि जिसके प्रसाद से, अनादि संसार से बंधी हुई मोह-ग्रंथि तत्काल ही छूट गई है; और जयवंत वर्तो परम वीतराग-चारित्र-स्वरूप शुद्धोपयोग कि जिसके प्रसाद से यह आत्मा स्वयमेव धर्म हुआ है ॥९२॥

(कलश)
विलीन मोह-राग-द्वेष मेघ चहुँ ओर के, चेतना के गुणगण कहाँ तक बखानिये ।
अविचल जोत निष्कंप रत्नदीप सम, विलसत सहजानन्द मय जानिये ॥
नित्य आनंद के प्रशमरस में मगन, शुद्ध उपयोग का महत्त्व पहिचानिये ।
नित्य ज्ञानतत्त्व में विलीन यह आत्मा, स्वयं धर्मरूप परिणत पहिचानिये ॥५॥
इसप्रकार शुद्धोपयोग को प्राप्त करके आत्मा स्वयं धर्म होता हुआ अर्थात् स्वयं धर्मरूप परिणमित होता हुआ नित्य आनन्द के प्रसार से सरस (अर्थात् जो शाश्वत आनन्द के प्रसार से रस-युक्त) ऐसे ज्ञान-तत्त्व में लीन होकर, अत्यन्त अविचलता के कारण, दैदीप्यमान ज्योतिमय और सहजरूप से विलसित (स्वभाव से ही प्रकाशित) रत्न-दीपक की निष्कंप-प्रकाशमय शोभा को पाता है । (अर्थात् रत्न-दीपक की भाँति स्वभाव से ही निष्कंपतया अत्यन्त प्रकाशित होता-जानता-रहता है)

(कलश)
आत्मा में विद्यमान ज्ञान तत्त्व पहिचान, पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के शुद्धभाव से ।
ज्ञानतत्त्वप्रज्ञापन के उपरान्त स अब, ज्ञेयतत्त्वप्रज्ञापन करते हैं चाव से ॥
सामान्य और असामान्य ज्ञेय तत्त्व सब, जानने के लिए द्रव्य गुण पर्याय से
मोह अंकुर उत्पन्न न हो इसलिए, ज्ञेय का स्वरूप बतलाते विस्तार से ॥६॥
आत्मा-रूपी अधिकरण में रहने वाले अर्थात् आत्मा के आश्रित रहने वाले ज्ञान-तत्त्व का इस प्रकार यथार्थतया निश्चय करके, उसकी सिद्धि के लिये (केवल-ज्ञान प्रगट करने के लिये) प्रशम के लक्ष से (उपशम प्राप्त करने के हेतु से) ज्ञेय-तत्त्व को जानने का इच्छुक (जीव) सर्व पदार्थों को द्रव्य-गुण-पर्याय सहित जानता है, जिससे कभी मोहांकुर की किंचित् मात्र भी उत्पत्ति न हो ।

इस प्रकार (श्रीमद्भगवत्कृन्दकुन्दाचार्यदेव प्रणीत) श्री प्रवचनसार शास्त्र की श्रीमद् अमृतचंद्राचार्य-देव विरचित तत्त्व-दीपिका नामक टीका में ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन नामक प्रथम श्रुतस्कंध समाप्त हुआ ।

बहिर्मोहदृष्टि = बहिर्मुख ऐसी मोहदृष्टि (आत्मा को धर्मरूप होने में विम्न डालने वाली एक बहिर्मोह-दृष्टि ही है)
आगम-कौशल्य = आगम में कुशलता-प्रवीणता
स्याद्वाद-मुद्रित जैनेन्द्र शब्दब्रह्म = स्याद्वादकी छापवाला जिनेन्द्र का द्रव्यश्रुत
शब्दब्रह्म-मूलक = शब्दब्रह्म जिसका मूल कारण है
जयसेनाचार्य : संस्कृत
तर्हिकथं श्रमणो भवति, इति पृष्टे प्रत्युत्तरं प्रयच्छन् ज्ञानाधिकारमुपसंहरति --
जो णिहदमोहदिट्ठी तत्त्वार्थ-श्रद्धानलक्षणव्यवहारसम्यक्त्वोत्पन्नेन निजशुद्धात्मरुचिरूपेण निश्चयसम्यक्त्वेन परिणतत्वान्निहतमोह-
दृष्टिर्विध्वंसितदर्शनमोहो यः । पुनश्च किंरूपः । आगमकुसलो निर्दोषिपरमात्मप्रणीतपरमागमाभ्यासेननिरुपाधिस्वसंवेदनज्ञानकुशलत्वादागमकुशल आगमप्रवीणः । पुनश्च किंरूपः । विरागचरियम्हिअब्भुट्ठिदो व्रतसमितिगु प्त्यादिबहिरङ्गचारित्रानुष्ठानवशेन स्वशुद्धात्मनिश्चलपरिणतिरूपवीतरागचारित्र-परिणतत्वात् परमवीतरागचारित्रे सम्यगभ्युत्थितः उद्यतः । पुनरपि कथंभूतः । महप्पा मोक्षलक्षण-महार्थसाधकत्वेन महात्मा धम्मो त्ति विसेसिदो समणो जीवितमरणलाभालाभादिसमताभावनापरिणतात्मास श्रमण एवाभेदनयेन धर्म इति विशेषितो मोहक्षोभविहीनात्मपरिणामरूपो निश्चयधर्मो भणित इत्यर्थः ॥९९॥


अब, "[उवसंपयामि सम्मं] - साम्य का आश्रय ग्रहण करता हूँ'', इत्यादि नमस्कार गाथा में जो प्रतिज्ञा की थी, उसके बाद "[चारित्तं खलु धम्मो] - चारित्र वास्तविक धर्म है" - इत्यादि गाथा द्वारा चारित्र का धर्मपना स्थापित किया था । इसके बाद "[परिणमदि जेण दव्वं] - द्रव्य जिसरूप से परिणमित होता है" - इत्यादि गाथा द्वारा आत्मा का धर्मपना कहा था - इत्यादि । वह सब शुद्धोपयोग के प्रसाद से सिद्ध करने योग्य है । अब निश्चय रत्नत्रय परिणत आत्मा ही धर्म है, यह सिद्ध है ।

अथवा दूसरी पातनिका - सम्यक्त्व के अभाव में श्रमण(मुनि) नहीं है, उस श्रमण से धर्म भी नहीं है । तो कैसे श्रमण हैं? ऐसा प्रश्न पूछने पर उत्तर देते हुये ज्ञानाधिकार का उपसंहार करते हैं -

[जो णिहदमोहदिट्ठी] - तत्वार्थ-श्रद्धान लक्षण व्यवहार-सम्यक्त्व से उत्पन्न निज शुद्धात्मा की रुचिरूप निश्चय-सम्यक्त्व रूप से परिणत होने के कारण जो मोहदृष्टि - दर्शनमोह से रहित है । और जो किस स्वरूप वाले हैं? [आगमकुसलो] - सर्व-दोष रहित परमात्मा द्वारा कहे गये परमागम के अभ्यास से उपाधि रहित स्व-संवेदन ज्ञान मे होने से आगम में कुशल - चतुर हैं । और जो किस स्वरूप वाले हैं? [विराग चरियम्हि अब्भुट्ठिदो] - व्रत, समित, गुप्ति आदि बाह्य चारित्र के अनुष्ठान के वश से स्व-शुद्धात्मा में निश्चल परिणति रूप वीतराग चारित्रमय परिणत होने के कारण परमवीतराग चारित्र में अच्छी तरह से स्थित हैं - तत्पर हैं । जो और कैसे हैं? [महप्पा] - मोक्ष लक्षण रूप महान अर्थ – पुरुषार्थ के साधक होने से महात्मा हैं, [धम्मो त्ति विसेसिदो समणो] - जीवन-मरण, लाभ-अलाभ आदि में समता भावरूप परिणत जो आत्मा हैं, वे श्रमण (मुनिराज) ही अभेदनय से धर्म हैं - ऐसा मोह और क्षोभ से रहित आत्मपरिणाम-रूप निश्चय धर्म कहा गया है - ऐसा अर्थ है ।