
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ द्रव्यस्योत्पादव्ययध्रौव्याण्यनेकद्रव्यपर्यायद्वारेण चिन्तयति - इह हि यथा किलैकस्त्र्य्युणक: समानजातीयोऽनेकद्रव्यपर्यायोविनश्यत्यन्यश्चतुरणुक: प्रजायते, ते तु त्रयश्चत्वारो वा पुद्गला अविष्टानुत्पन्ना एवावतिष्ठन्ते । तथा सर्वेऽपि समानजातीया द्रव्यपर्याया विनश्यन्ति प्रजायन्ते च समानजातीनि द्रव्याणि त्वविनष्टानुत्पन्नान्येवावतिष्ठन्ते । यथा चैको मनुष्यत्वलक्षणोऽसमानजातीयो द्रव्यपर्यायो विनश्यत्यन्यस्त्रिदशत्व-लक्षण: प्रजायते तौ च जीवपुद्गलौ अविनष्टानुत्पन्नावेवावतिष्ठेते । तथा सर्वऽप्यसमानजातीया द्रव्यपर्याया विनश्यन्ति प्रजायन्ते च असमानजातीनि द्रव्याणि त्वविनष्टानुत्पन्नान्यवावतिष्ठन्ते । एवमात्मना ध्रुवाणि द्रव्यपर्यायद्वारेणोत्पादव्ययीभूतन्युत्पादव्ययध्रौव्याणि द्रव्याणि भवन्ति ॥१०३॥ यहाँ (विश्व में) जैसे एक त्रि-अणुक समान-जातीय अनेक द्रव्य-पर्याय विनष्ट होती है और दूसरी १चतुरणुक (समान-जातीय अनेक द्रव्य-पर्याय) उत्पन्न होती है; परन्तु वे तीन या चार पुद्गल (परमाणु) तो अविनष्ट और अनुत्पन्न ही रहते हैं (ध्रुव हैं); इसी प्रकार सभी समान-जातीय द्रव्य-पर्यायें विनष्ट होती हैं और उत्पन्न होती हैं, किन्तु समान-जातीय द्रव्य तो अविनष्ट और अनुत्पन्न ही रहते हैं (ध्रुव हैं) । और, जैसे एक मनुष्यत्व-स्वरूप असमान-जातीय द्रव्य-पर्याय विनष्ट होती है और दूसरी देवत्व-स्वरूप (असमान-जातीय द्रव्य-पर्याय) उत्पन्न होती है, परन्तु वह जीव और पुद्गल तो अविनष्ट और अनुत्पन्न ही रहते हैं, इसी प्रकार सभी असमान-जातीय द्रव्य-पर्यायें विनष्ट हो जाती हैं और उत्पन्न होती हैं, परन्तु असमान-जातीय द्रव्य तो अविनष्ट और अनुत्पन्न ही रहते हैं । इस प्रकार अपने से (१द्रव्य-रूप से) ध्रुव और द्रव्य-पर्यायों द्वारा उत्पाद-व्ययरूप ऐसे द्रव्य उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य हैं ॥१०३॥ १चतुरणुक = चार अणुओं का (परमाणुओं का) बना हुआ स्कंध । २ 'द्रव्य' शब्द मुख्यतया दो अर्थों में प्रयुक्त होता है : (१) एक तो सामान्य-विशेष के पिण्ड को अर्थात् वस्तु को द्रव्य कहा जाता है; जैसे- 'द्रव्य उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यस्वरूप है'; (२) दूसरे - वस्तु के सामान्य अंश को भी द्रव्य कहा जाता है; जैसे- 'द्रव्यार्थिक नय' अर्थात् सामान्यांशग्राही नय । जहाँ जो अर्थ घटित होता हो वहाँ वह अर्थ समझना चाहिये । |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ द्रव्यपर्यायेणोत्पादव्ययध्रौव्याणि दर्शयति -- पाडुब्भवदि य प्रादुर्भवति चजायते । अण्णो अन्यः कश्चिदपूर्वानन्तज्ञानसुखादिगुणास्पदभूतः शाश्वतिकः । स कः । पज्जाओ परमात्मावाप्तिरूपः स्वभावद्रव्यपर्यायः । पज्जओ वयदि अण्णो पर्यायो व्येति विनश्यति । कथंभूतः । अन्यःपूर्वोक्तमोक्षपर्यायाद्भिन्नो निश्चयरत्नत्रयात्मकनिर्विकल्पसमाधिरूपस्यैव मोक्षपर्यायस्योपादानकारणभूतः । कस्य संबन्धी पर्यायः । दव्वस्स परमात्मद्रव्यस्य । तं पि दव्वं तदपि परमात्मद्रव्यं णेव पणट्ठं ण उप्पण्णं शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन नैव नष्टं न चोत्पन्नम् । अथवा संसारिजीवापेक्षया देवादिरूपो विभावद्रव्यपर्यायोजायते मनुष्यादिरूपो विनश्यति तदेव जीवद्रव्यं निश्चयेन न चोत्पन्नं न च विनष्टं, पुद्गलद्रव्यं वा द्वयणुक ादिस्कन्धरूपस्वजातीयविभावद्रव्यपर्यायाणां विनाशोत्पादेऽपि निश्चयेन न चोत्पन्नं न च विनष्टमिति । ततः स्थितं यतः कारणादुत्पादव्ययध्रौव्यरूपेण द्रव्यपर्यायाणां विनाशोत्पादेऽपि द्रव्यस्य विनाशो नास्ति, ततः कारणाद्द्रव्यपर्याया अपि द्रव्यलक्षणं भवन्तीत्यभिप्रायः ॥११३॥ [पाडुब्भवदि य] और उत्पन्न होती है । [अण्णो] शाश्वत रहनेवाली (वैसी की वैसी रहने वाली) कोई नवीन अनन्त ज्ञान-सुखादि गुणों की स्थानभूत दूसरी । वह दूसरी कौन है? [पज्जाओ] परमात्मा (दशा) की प्राप्तिरूप स्वभाव-द्रव्यपर्याय । [पज्जओ वयदि अण्णो] पर्याय नष्ट होती है । कैसी पर्याय नष्ट होती है? पूर्वोक्त मोक्षपर्याय से भिन्न निश्चय रत्नत्रय स्वरूप निर्विकल्प समाधिरूप मोक्षपर्याय की उपादान कारणभूत पर्याय नष्ट होती है । वह पर्याय किस सम्बन्धी - किसकी है? [दव्वस्स] परमात्म द्रव्य की वह पर्याय है | [तं पि दव्वं] तो भी परमात्मद्रव्य [णेव पणट्ठं ण उप्पण्णं] शुद्ध द्रव्यार्थिकनय से न तो नष्ट होता है और न उत्पन्न ही होता है । अथवा संसारी जीव की अपेक्षा देवादिरूप विभाव-द्रव्यपर्याय उत्पन्न होती है, मनुष्यादिरूप पर्याय नष्ट होती है और वह जीवद्रव्य निश्चय से न उत्पन्न होता है और न नष्ट होता है अथवा पुद्गलद्रव्य द्वयणुकादि स्कंधरूप स्वजातीय-विभाव-द्रव्यपर्यायों के नष्ट और उत्पन्न होने पर भी निश्चय से उत्पन्न और विनष्ट नहीं होता है । इससे यह फलित हुआ कि जिस कारण उत्पाद-व्यय-धौव्य रूप से द्रव्य पर्यायों का विनाश और उत्पाद होने पर भी द्रव्य का विनाश नहीं होता है, उस कारण द्रव्यपर्यायें भी द्रव्य का लक्षण होती हैं - यह अभिप्राय है ॥११३॥ |