
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ ज्ञानकर्मकर्मफलान्यात्मत्वेन निश्चिनोति - आत्मा हि तावत्परिणामात्मैव, परिणाम: स्वयमात्मेति स्वयमुक्तत्वात् । परिणामस्तु चेतनात्मकत्वेन ज्ञानं कर्म कर्मफलं वा भावितुं शील:, तन्मयत्वाच्चेतनाया: । ततो ज्ञानं कर्म कर्मफलं चात्मैव । एवं हि शुद्धद्रव्यनिरूपणायां परद्रव्यसंपर्कासंभवात्पर्यायाणां द्रव्यान्त:-प्रलयाच्च शुद्धद्रव्य एवात्मावतिष्ठते ॥१२५॥ प्रथम तो आत्मा वास्तव में परिणाम-स्वरूप ही है, क्योंकि परिणाम स्वयं आत्मा है ऐसा (११२वीं गाथा में भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेव ने) स्वयं कहा है; तथा परिणाम चेतना-स्वरूप होने से ज्ञान, कर्म और कर्मफलरूप होने के स्वभाव वाला है, क्योंकि चेतना तन्मय (ज्ञानमय, कर्ममय अथवा कर्मफलमय) होती है । इसलिये ज्ञान, कर्म, कर्मफल आत्मा ही है । इस प्रकार वास्तव में शुद्धद्रव्य के निरूपण में परद्रव्य के संपर्क का (सम्बन्ध; संग) असंभव होने से और पर्यायें द्रव्य के भीतर प्रलीन हो जाने से आत्मा शुद्धद्रव्य ही रहता है ॥१२५॥ |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ ज्ञानकर्मकर्मफलान्यभेदनयेनात्मैव भवतीति प्रज्ञापयति -- अप्पा परिणामप्पा आत्माभवति । कथंभूतः । परिणामात्मा परिणामस्वभावः । कस्मादिति चेत् 'परिणामो सयमादा' इति पूर्वंस्वयमेव भणितत्वात् । परिणामः कथ्यते — परिणामो णाणकम्मफलभावी परिणामो भवति । किंविशिष्टः । ज्ञानकर्मकर्मफलभावी; ज्ञानकर्मकर्मफलरूपेण भवितुं शील इत्यर्थः । तम्हा यस्मादेवं तस्मात्कारणात् । णाणं पूर्वसूत्रोक्ता ज्ञानचेतना । कम्मं तत्रैवौक्तलक्षणा कर्मचेतना । फलं च पूर्वोक्तलक्षणफलचेतना च । आदा मुणेदव्वो इयं चेतना त्रिविधाप्यभेदनयेनात्मैव मन्तव्यो ज्ञातव्य इति । एतावता किमुक्तं भवति । त्रिविधचेतनापरिणामेन परिणामी सन्नात्मा किं करोति । निश्चयरत्नत्रयात्मकशुद्धपरिणामेन मोक्षंसाधयति, शुभाशुभाभ्यां पुनर्बन्धमिति ॥१३५॥ एवं त्रिविधचेतनाकथनमुख्यतया गाथात्रयेण चतुर्थ-स्थलं गतम् । [अप्पा परिणामप्पा] आत्मा है । आत्मा कैसा है? आत्मा परिणाम-स्वभावी है । आत्मा परिणाम-स्वभावी क्यों है? [परिणामो सयमादा] परिणाम स्वयं आत्मा है, ऐसा पहले (गाथा नं. १३२ में) स्वयं ही कहा गया होने से आत्मा परिणाम-स्वभावी है । परिणाम कहा जाता है -- [परिणामो णाणकम्मफलभावी] परिणाम है । परिणाम किस विशेषता वाला है?
इससे क्या कहा गया है? तीन प्रकार के चेतना परिणाम से परिणमित होता हुआ आत्मा क्या करता है? परिणामी आत्मा निश्चय रत्नत्रय स्वरूप शुद्धोपयोग से मोक्ष को तथा शुभ-अशुभ परिणाम से बन्ध को साधता है- प्राप्त करता है ॥१३५॥ |