
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ पुद्गलप्राणसन्ततिप्रवृत्तिहेतुमन्तरङ्गमासूत्रयति - येययात्मन: पौद्गलिकप्राणानां संतानेन प्रवृत्ति:, तस्या अनादिपौद्गलकर्ममूलं शरीरादि-ममत्वरूपमुपरक्तत्वमन्तरङ्गो हेतु: ॥१५०॥ जो इस आत्मा को पौद्गलिक प्राणों की संतानरूप प्रवृत्ति है, उसका अन्तरंग हेतु शरीरादि का ममत्वरूप उपरक्तपना है, जिसका मूल (निमित्त) अनादि पौद्गलिक कर्म है । |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथेन्द्रि-यादिप्राणोत्पत्तेरन्तरङ्गहेतुमुपदिशति -- आदा कम्ममलिमसो अयमात्मा स्वभावेन भावकर्मद्रव्यकर्मनोकर्म-मलरहितत्वेनात्यन्तनिर्मलोऽपि व्यवहारेणानादिकर्मबन्धवशान्मलीमसो भवति । तथाभूतः सन् किंकरोति । धरेदि पाणे पुणो पुणो अण्णे धारयति प्राणान् पुनःपुनः अन्यान्नवतरान् । यावत्किम् । ण चयदि जाव ममत्तिं निस्नेहचिच्चमत्कारपरिणतेर्विपरीतां ममतां यावत्कालं न त्यजति । केषु विषयेषु । देहपधाणेसु विसयेसु देहविषयरहितपरमचैतन्यप्रकाशपरिणतेः प्रतिपक्षभूतेषु देहप्रधानेषु पञ्चेन्द्रियविषयेष्विति । ततःस्थितमेतत् — इन्द्रियादिप्राणोत्पत्तेर्देहादिममत्वमेवान्तरङ्गकारणमिति ॥१६२॥ [आदा कम्ममलिमसो] - यह आत्मा स्वभाव से भावकर्म, द्रव्यकर्म और नोकर्म रूपी कर्ममल से रहित होने के कारण अत्यन्त निर्मल होने पर भी व्यवहार से अनादि (से चले आये) कर्मों के बन्ध-वश मलिन होता है । वैसा होता हुआ (मलिन होता हुआ) आत्मा क्या करता है? [धरेदि पाणे पुणो पुणो अण्णे] - बारम्बार दूसरे-दूसरे नवीन प्राणों को धारण करता है । जब तक क्या नहीं करता है? [ ण चयदि जाव ममत्तं] - स्नेह से रहित, चैतन्य चमत्कार परिणति से विपरीत, ममता (मेरेपन) को जितने समय तक (जब तक) नहीं छोड़ता है । वह किन विषयों में ममता को जब तक नहीं छोड़ता है? [देहपधाणेसु विसयेसु] - शरीर और विषयों से रहित उकृष्ट चैतन्य प्रकाशरूप परिणति से विपरीत, शरीर है प्रधान जिसमें ऐसे पाँचों इन्द्रियों के विषयों में जब तक ममता को नहीं छोड़ता है । इससे यह निश्चित हुआ कि शरीरादि में ममता ही इन्द्रिय आदि प्राणों की उत्पत्ति का अन्तरंग कारण है ॥१६२॥ |