+ अब यह बतलाते हैं कि कैसे स्निग्धत्व-रूक्षत्व से पिण्डपना होता है -
णिद्धा वा लुक्खा वा अणुपरिणामा समा व विसमा वा । (165)
समदो दुराधिगा जदि बज्झन्ति हि आदिपरिहीणा ॥177॥
स्निग्धा वा रूक्षा वा अणुपरिणामाः समा वा विषमा वा ।
समतो द्वयधिका यदि बध्यन्ते हि आदिपरिहीणाः ॥१६५॥
परमाणुओं का परिणमन सम-विषम अर स्निग्ध हो
अर रूक्ष हो तो बंध हो दो अधिक पर न जघन्य हो ॥१७७॥
अन्वयार्थ : [अणुपरिणामा:] परमाणु-परिणाम, [स्निग्धा: वा रूक्षा: वा] स्निग्ध हों या रूक्ष हों [समा: विषमा: वा] सम अंश वाले हों या विषम अंश वाले हों [यदि समत: द्वधिका:] यदि समान से दो अधिक अंश वाले हों तो [बध्यन्ते हि] बँधते हैं, [आदि परिहीना:] जघन्यांश वाले नहीं बंधते ।
Meaning : With the exception of the lowest degree, wherever there is difference of two degrees in greasiness and roughness, whether even or odd, there is combination of similar or dissimilar types (greasiness with greasiness, roughness with roughness, and greasiness with roughness).

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथात्र कीदृशात्स्निग्धरूक्षत्वात्पिण्डत्वमित्यावेदयति -

समतो द्वय्यधिकगुणाद्धि स्निग्धरूक्षत्वाद्‌बन्ध इत्युत्सर्ग:, स्निग्धरूक्षद्बय्यधिकगुणत्वस्य हि परिणामकत्वेन बन्धसाधनत्वात्‌ । न खल्वेकगुणात्‌ स्निग्धरूक्षत्वाद्‌बन्ध इत्यपवाद:, एकगुणस्निग्धरूक्षत्वस्य हि परिणम्यपरिणामकत्वाभावेन बन्धस्यासाधनत्वात्‌ ॥१६५॥


समान से दो गुण (अंश) अधिक स्निग्धत्व या रूक्षत्व हो तो बंध होता है यह उत्सर्ग (सामान्य नियम) है क्योंकि स्निग्धत्व या रूक्षत्व की द्विगुणाधिकता का होना वह परिणामक (परिणमन कराने वाला) होने से बंध का कारण है ।

यदि एक गुण स्निग्धत्व या रूक्षत्व हो तो बंध नहीं होता यह अपवाद है; क्योंकि एक गुण स्निग्धत्व या रूक्षत्व के परिणम्य-परिणामकता का अभाव होने से बंध के कारणपने का अभाव है ॥१६५॥
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथात्रकीद्रशात्स्निग्धरूक्षत्वगुणात् पिण्डो भवतीति प्रश्ने समाधानं ददाति --
बज्झंति बध्यन्ते हि स्फुटम् । के । कर्मतापन्नाः अणुपरिणामा अणुपरिणामाः । अणुपरिणामशब्देनात्र परिणामपरिणताअणवो गृह्यन्ते । कथंभूताः । णिद्धा वा लुक्खा वा स्निग्धपरिणामपरिणता वा रूक्षपरिणामपरिणता। पुनरपि किंविशिष्टाः । समा व विसमा वा द्विशक्तिचतुःशक्तिषट्शक्त्यादिपरिणतानां समइति संज्ञा, त्रिशक्तिपञ्चशक्तिसप्तशक्यादिपरिणतानां विषम इति संज्ञा । पुनश्च किंरूपाः । समदो दुराधिगा जदि समतः समसंख्यानात्सकाशाद् द्वाभ्यां गुणाभ्यामधिका यदि चेत् । कथं द्विगुणाधिकत्वमिति चेत् । एको द्विगुणस्तिष्ठति द्वितीयोऽपि द्विगुण इति द्वौ समसंख्यानौ तिष्ठतस्तावत् एक स्यविवक्षितद्विगुणस्य द्विगुणाधिक त्वे कृ ते सति सः चतुर्गुणो भवति शक्तिचतुष्टयपरिणतो भवति । तस्यचतुर्गुणस्य पूर्वोक्तद्विगुणेन सह बन्धो भवतीति । तथैव द्वौ त्रिशक्तियुक्तो तिष्ठतस्तावत्, तत्राप्येकस्यत्रिगुणशब्दाभिधेयस्य त्रिशक्तियुक्तस्य परमाणोः शक्तिद्वयमेलापके कृते सति पञ्चगुणत्वं भवति । तेनपञ्चगुणेन सह पूर्वोक्तत्रिगुणस्य बन्धो भवति । एवं द्वयोर्द्वयोः स्निग्धयोर्द्वयोर्द्वयो रूक्षयोर्द्वयोर्द्वयोःस्निग्धरूक्षयोर्वा समयोः विषमयोश्च द्विगुणाधिक त्वे सति बन्धो भवतीत्यर्थः, किंतु विशेषोऽस्ति ।आदिपरिहीणा आदिशब्देन जलस्थानीयं जघन्यस्निग्धत्वं वालुकास्थानीयं जघन्यरूक्षत्वं भण्यते, ताभ्यांविहीना आदिपरिहीणा बध्यन्ते । किंच – परमचैतन्यपरिणतिलक्षणपरमात्मतत्त्वभावनारूपधर्मध्यान-शुक्लध्यानबलेन यथा जधन्यस्निग्धशक्तिस्थानीये क्षीणरागत्वे सति जधन्यरूक्षशक्तिस्थानीये क्षीणद्वेषत्वे च सति जलवालुकयोरिव जीवस्य बन्धो न भवति, तथा पुद्गलपरमाणोरपि जघन्यस्निग्ध-रूक्षशक्तिप्रस्तावे बन्धो न भवतीत्यभिप्रायः ॥१६५॥


[बज्झन्ति हि] वास्तव में बँधते हैं । कौन बँधते हैं ? कर्मता को प्राप्त [अणुपरिणामा] अणु-परिणाम बँधते हैं । अणु-परिणाम शब्द से यहाँ परिणाम (पर्याय) रूप से परिणत अणु ग्रहण किये गये हैं । वे अणु परिणाम कैसे हैं ? [णिद्धा वा लुक्खा वा] वे स्निग्ध परिणाम-रूप से परिणमित अथवा रूक्ष परिणाम-रूप परिणत हैं । वे और किस विशेषता वाले हैं ? [समा व विसमा वा] दो शक्ति, चार शक्ति, छह शक्ति आदि रूप परिणत अणुओं की सम संज्ञा है; तथा तीन शक्ति पाँच शक्ति सात शक्ति आदि रूप से परिणत अणुओं की विषम संज्ञा है (संज्ञा अर्थात् नाम) । और वे किस स्वरूप वाले हैं ? [समदो दुराधिगा जदि] सम से -- यदि समसंख्या से दो गुणों से अधिक हैं तो । दो गुणों की अधिकता कैसे है - यदि ऐसा प्रश्न हो तो (उत्तर कहते हैं) -- एक दो गुणवाला है, दूसरा भी दो गुणवाला है -- इसप्रकार दो समान संख्या -वाले परमाणु हैं एक विवक्षित दो गुण-वाले के दो गुणों की अधिकता होने पर वह चार गुण-वाला होता है -- चार शक्तियों-रूप परिणत होता है । उस चार गुणवाले का पहले कहे हुये दो गुणवाले के साथ बन्ध होता है । उसीप्रकार कोई दो परमाणु तीन शक्ति-वाले हैं वहाँ भी एक तीन गुण शब्द से कहे जानेवाले तीन शक्ति से युक्त परमाणु के दो शक्तियों का मिलाप (दो गुणों की अधिकता) होने पर पाँच गुणवाला होता है । उस पाँच गुणवाले के साथ पहले कहे हुये तीन गुणवाले का बन्ध होता है ।

इसप्रकार दो-दो स्निग्ध का दो-दो रूक्ष का, दो-दो स्निग्धरूक्ष का अथवा सम का और विषम का दो गुण अधिक होने पर बन्ध होता है -- ऐसा अर्थ है; परन्तु विशेषता यह है - [आदिपरिहीणा] आदि शब्द से जल के स्थानीय जघन्य स्निग्धत्व और रेत के स्थानीय जघन्य रूक्षत्व कहा जाता है; उनसे रहित अर्थात् आदि परिहीणा बँधते हैं (एक अविभागी-प्रतिच्छेद वाला परमाणु बन्ध योग्य नहीं है)

विशेष यह है कि -- परम चैतन्य परिणति लक्षण परमात्मतत्त्व की भावनारूप-धर्मध्यान, शुक्लध्यान के बल से जैसे जघन्य स्निग्ध शक्ति के स्थानीय राग के क्षीण होने पर और जघन्य रूक्ष शक्ति के स्थानीय द्वेष के क्षीण होने पर जल और रेत के समान जीव का बन्ध नहीं होता है; उसी प्रकार पुद्गल परमाणु के भी जघन्य

स्निग्ध और रूक्ष शक्ति का प्रसंग होने पर बन्ध नहीं होता है - ऐसा अभिप्राय है ॥१७७॥