
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथात्मन: पुद्गलपिण्डानां कर्मत्व-कर्तृत्वाभावमवधारयति - यतो हि तुल्यक्षेत्रावगाढजीवपरिणाममात्रं बहिरङ्गसाधनमाश्रित्य जीवं परिणमयितार-मन्तरेणापि कर्मत्वपरिणमनशक्तियोगिन: पुद्गलस्कन्धा: स्वयमेव कर्मभावेन परिणमन्ति । ततोऽवधार्यते न पुद्गलपिण्डानां कर्मत्वकर्ता पुरुषोऽस्ति ॥१६९॥ कर्मरूप परिणमित होने की शक्तिवाले पुद्गलस्कंध तुल्य (समान) क्षेत्रावगाह जीव के परिणाममात्र का, जो कि बहिरंग साधन (बाह्यकारण) है, उसका आश्रय करके, जीव उनको परिणमाने वाला न होने पर भी, स्वयमेव कर्मभाव से परिणमित होते हैं । इससे निश्चित होता है कि पुद्गलपिण्डों को कर्मरूप करने वाला आत्मा नहीं है । |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ कर्मस्कन्धानां जीव उपादानकर्तान भवतीति प्रज्ञापयति -- कम्मत्तणपाओग्गा खंधा कर्मत्वप्रायोग्याः स्कन्धाः कर्तारः जीवस्स परिणइंपप्पा जीवस्य परिणतिं प्राप्य निर्दोषिपरमात्मभावनोत्पन्नसहजानन्दैकलक्षणसुखामृतपरिणतेः प्रतिपक्षभूतां जीवसंबन्धिनीं मिथ्यात्वरागादिपरिणतिं प्राप्य गच्छंति कम्मभावं गच्छन्ति परिणमन्ति । कम् । कर्मभावं ज्ञानावरणादिद्रव्यकर्मपर्यायम् । ण हि ते जीवेण परिणमिदा न हि नैव ते कर्म-स्कन्धा जीवेनोपादानकर्तृभूतेन परिणमिताः परिणतिं नीता इत्यर्थः । अनेन व्याख्यानेनैतदुक्तं भवतिकर्मस्कन्धानां निश्चयेन जीवः कर्ता न भवतीति ॥१८१॥ [कम्मत्तणपाओग्गा खंधा] कर्म-पने को प्राप्त करने योग्य स्कन्ध-रूपी कर्ता, [जीवस्स परिणइं पप्पा] जीव की परिणति को प्राप्त कर -- निर्दोषी परमात्मा की भावना से उत्पन्न सहजानन्द एक लक्षण सुखरूपी अमृतमयी परिणति -- पर्याय से विपरीत, जीव सम्बन्धी मिथ्यात्व रागादि परिणति -- पर्याय को प्राप्त-कर [गच्छंति कम्मभावं] जाते हैं -- परिणमन करते हैं । किसरूप परिणमन करते हैं ? कर्म-भाव-रूप -- ज्ञानावरणादि द्रव्य-कर्म पर्यायरूप परिणमन करते हैं । [ण हि ते जीवेण परिणमिदा] वे कर्म-स्कन्ध जीव-रूप उपादानकर्ता से परिणमित नहीं हैं -- परिणमन को प्राप्त नहीं किये जाते हैं । इस विशेष कथन से यह कहा गया है कि कर्म स्कन्धों का कर्ता निश्चय से जीव नहीं है ॥१८१॥ |