+ तब फिर जीव का, शरीरादि सर्वपरद्रव्यों से विभाग का साधनभूत, असाधारण स्वलक्षण क्या है, सो कहते हैं -
अरसमरूवमगंधं अव्वत्तं चेदणागुणमसद्‌दं । (172)
जाण अलिंग्गहणं जीवमणिद्दिट्ठसंठाणं ॥184॥
अरसमरूपमगन्धमव्यक्तं चेतनागुणमशब्दम् ।
जानीह्यलिङ्गग्रहणं जीवमनिर्दिष्टसंस्थानम् ॥१७२॥
चैतन्य गुणमय आतमा अव्यक्त अरस अरूप है
जानो अलिंगग्रहण इसे यह अनिर्दिष्ट अशब्द है ॥१८४॥
अन्वयार्थ : [जीवम्] जीव को [अरस] रस-रहित [अरूपम्] रूप-रहित, [अगंधम्] गंध-रहित, [अव्यक्तम्] अव्यक्त, [चेतनागुणम्] चेतना-गुणयुक्त, [अशब्दम्] अशब्द, [अलिंगग्रहणम्] अलिंगग्रहण (लिंग द्वारा ग्रहण न होने योग्य) और [अनिर्दिष्टसंस्थानम्] जिसका कोई निश्चित संस्थान नहीं कहा गया है ऐसा [जानीहि] जानो ।
Meaning : O bhavya soul! Know that the (pure) soul (jīva) does not have the qualities of taste (rasa), colour (varna), smell (gandha), touch (sparsha), and sound (shabda), which is the mode (paryāya) of the matter (pudgala). It cannot be comprehended through any mark typical of the matter (pudgala) - alingagrahana. Its shape cannot be defined, and it has this quality of consciousness (chetanā).

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ किं तर्हि जीवस्य शरीरादिसर्वपरद्रव्यविभागसाधनमसाधारणं स्वलक्षणमित्यावेदयति-

आत्मनो हि रसरूपगंधगुणाभावस्वभावत्वात्स्पर्शगुणव्यक्त्यभावस्वभावत्वात्‌
शब्दपर्यायाभावस्वभावत्वात्तथा तन्मूलादलिङ्गग्राह्यत्वात्सर्वसंस्थानाभावास्वभावत्वाच्च पुद्‌गल-द्रव्यविभागसाधनमरसत्वमरूपत्वमगन्धत्वमव्यक्तत्वमशब्दत्वमलिङ्गग्राह्यत्वम-संस्थानत्वं चास्ति । सकलपुद्‌गलापुद्‌गलाजीवद्रव्यविभागसाधनं तु चेतनागुणत्वमस्ति । तदेव च तस्य स्वजीवद्रव्यमात्राश्रितत्वेन स्वलक्षणतां बिभ्राणं शेषद्रव्यान्तरविभागं साधयति ।
अलिङ्गग्राह्य इति वक्तव्ये यदलिङ्गग्रहणमित्युक्तं तद्‌बहुतरार्थप्रतिपत्तये । तथा हि -
(१) न लिंगैरिन्द्रियैर्ग्राहकतामापन्नस्य ग्रहणं यस्येत्यतीन्द्रियज्ञानमयत्वस्य प्रतिपत्ति: ।(२) न लिंगैरिन्द्रियैर्ग्राह्यतामापन्नस्य ग्रहणं यस्येतीन्द्रियप्रत्यक्षाविषयत्वस्य । (३) न लिंगादिन्द्रियगम्याद्‌धूमादग्नेरिव ग्रहणं यस्येतीन्द्रियप्रत्यक्षपूर्वकानुमानाविषयत्वस्य । (४) न लिंगादेव परै: ग्रहणं यस्येत्यनुमेयमात्रस्याभावस्य । (५) न लिंगादेव परेषां ग्रहणं यस्येत्यनुमातृमात्रत्वा-भावस्य । (६) न लिंगात्स्वभावेन ग्रहणं यस्येति प्रत्यक्षज्ञातृत्वस्य । (७) न लिंगेनोपयोगाख्य-लक्षणेन ग्रहणं ज्ञेयार्थालम्बनं यस्येति बहिरर्थालम्बनज्ञानाभावस्य । (८) न लिंगस्यो-पयोगाख्यलक्षणस्य ग्रहणं स्वयमाहरणं यस्येत्यनाहार्यज्ञानत्वस्य ।
(९) न लिंगस्योपयोगाख्यलक्षणस्य ग्रहणं परेण हरणं यस्येत्यहार्यज्ञानत्वस्य । (१०) न लिंगे उपयोगाख्यलक्षणे ग्रहणं सूर्य इवोपरागो यस्येति शुद्धोपयोगस्वभावस्य । (११) न लिंगादुपयोगाख्यलक्षणाद्‌ग्रहणं पौद्‌गलिककर्मादान यस्येति द्रव्यकर्मासंपृथक्तत्वस्य । (१२) न लिंगेभ्य इन्द्रियेभ्यो ग्रहणं विषयाणामुपभोगो यस्येति विषयोपभोक्तृत्वाभावस्य । (१३) न लिंगात्मनो वेन्द्रियादिलक्षणाद्‌ग्रहणं जीवस्य धारणं यस्येति शुक्रार्तवानुविधायित्वाभावस्य । (१४) न लिंगस्य मेहनाकारस्य ग्रहणं यस्येति लौकिकसाधनमात्रत्वाभावस्य । (१५) न लिंगेनामेहनाकारेण ग्रहणं लोकव्याप्तिर्यस्येति कुहुकप्रसिद्धसाधनाकारलोकव्याप्तित्वाभावस्य । (१६) न लिंगानां स्त्रीपुत्रनपुंसकवेदानां ग्रहणं यस्येति स्त्रीपुत्रनपुंसकद्रव्यभावाभावस्य । (१७) न लिंगानां धर्मध्वजानां ग्रहणं यस्येति बहिरङ्गयतिलिंगाभावस्य । (१८) न लिंगं गुणो ग्रहणमर्थावबोधो यस्येति गुणविशेषनालीढशुद्धद्रव्यत्वस्य । (१९) न लिंगं पर्यायो ग्रहणमर्थावबोध-विशेषो यस्येति पर्यायविशेषानालीढशुद्धद्रव्यत्वस्य । (२०) न लिंगं प्रत्यभिज्ञानहेतुर्ग्रहण-मर्थावबोधसामान्यं यस्येति द्रव्यानालीढशुद्धपर्यायत्वस्य ॥१७२॥





आत्मा
  1. रसगुण के अभावरूप स्वभाव वाला होने से,
  2. रूपगुण के अभावरूप स्वभाववाला होने से,
  3. गंधगुण के अभावरूप स्वभाव वाला होने से,
  4. स्पर्शगुण रूप व्यक्तता के अभावरूप स्वभाववाला होने से,
  5. शब्द पर्याय के अभावरूप स्वभाववाला होने से, तथा
  6. इन सबके कारण (अर्थात् रस-रूप-गंध इत्यादि के अभावरूप स्वभाव के कारण) लिंग के द्वारा अग्राह्य होने से और
  7. सर्व संस्थानों के अभावरूप स्वभाववाला होने से,
आत्मा को पुद्‌गलद्रव्य से विभाग का साधनभूत
  1. अरसत्‍व,
  2. अरूपत्‍व,
  3. अगंधत्‍व,
  4. अव्यक्तता,
  5. अशब्दत्‍व,
  6. अलिंगग्राह्यत्‍व और
  7. असंस्थानत्‍व
है । पुद्‌गल तथा अपुद्‌गल ऐसे समस्त अजीव द्रव्यों से विभाग का साधन तो चेतनागुणमयपना है; और वही, मात्र स्व-जीव-द्रव्याश्रित होने से स्व-लक्षणत्‍व को धारण करता हुआ, आत्मा का शेष अन्य द्रव्यों से विभाग (भेद) सिद्ध करता है ।

जहाँ 'अलिंगग्राह्य' करना है वहाँ जो 'अलिंगग्रहण' कहा है, वह बहुत से अर्थों की प्रतिपत्ति (प्राप्ति, प्रतिपादन) करने के लिये है । वह इस प्रकार है :—

  1. ग्राहक (ज्ञायक) जिसके लिंगों के द्वारा अर्थात् इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण (जानना) नहीं होता वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा अतीन्द्रियज्ञानमय है' इस अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  2. ग्राह्य (ज्ञेय) जिसका लिंगों के द्वारा अर्थात् इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण (जानना) नहीं होता वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा इन्द्रियप्रत्यक्ष का विषय नहीं है' इस अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  3. जैसे धुएँ से अग्नि का ग्रहण (ज्ञान) होता है, उसी प्रकार लिंग द्वारा, अर्थात् इन्द्रियगम्य (इन्द्रियों से जानने योग्य चिह्न) द्वारा जिसका ग्रहण नहीं होता वह अलिंगग्रहण है । इस प्रकार 'आत्मा इन्द्रियप्रत्यक्षपूर्वक अनुमान का विषय नहीं है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  4. दूसरों के द्वारा—मात्र लिंग द्वारा ही जिसका ग्रहण नहीं होता वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा अनुमेय मात्र नहीं है' (आत्मा केवल अनुमान से ही ज्ञात होने योग्य नहीं है) ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  5. जिसके लिंग से ही पर का ग्रहण नहीं होता वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा अनुमाता मात्र नहीं है' (आत्मा केवल अनुमान करने वाला नहीं है) ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  6. जिसके लिंग के द्वारा नहीं किन्तु स्वभाव के द्वारा ग्रहण होता है वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा प्रत्यक्ष ज्ञाता है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  7. जिसके लिंग द्वारा अर्थात् उपयोगनामक लक्षण द्वारा ग्रहण नहीं है अर्थात् ज्ञेय पदार्थों का आलम्बन नहीं है, वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा के बाह्य पदार्थों का आलम्बनवाला ज्ञान नहीं है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  8. जो लिंग को अर्थात् उपयोग नामक लक्षण को ग्रहण नहीं करता अर्थात् स्वयं (कहीं बाहर से) नहीं लाता सो अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा जो कहीं से नहीं लाया जाता ऐसे ज्ञानवाला है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  9. लिंग का अर्थात् उपयोगनामक लक्षण का ग्रहण अर्थात् पर से हरण नहीं हो सकता सो अलिंग ग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा के ज्ञान का हरण नहीं किया जा सकता' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  10. जिसे लिंग में अर्थात् उपयोगनामक लक्षण में ग्रहण अर्थात् सूर्य की भाँति उपराग (मलिनता, विकार) नहीं है वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा शुद्धोपयोगस्वभावी है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  11. लिंग द्वारा अर्थात् उपयोगनामक लक्षण द्वारा ग्रहण अर्थात् पौद्‌गलिक कर्म का ग्रहण जिसके नहीं है, वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा द्रव्यकर्म से असंयुक्त (असंबद्ध) है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  12. जिसे 'लिंगों के द्वारा अर्थात् इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण अर्थात् विषयों का उपभोग नहीं है’ सो अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा विषयों का उपभोक्ता नहीं है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  13. लिंग द्वारा अर्थात् मन अथवा इन्द्रियादि लक्षण के द्वारा ग्रहण अर्थात् जीवत्व को धारण कर रखना जिसके नहीं है वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा शुक्र और आर्तव (रक्त) को अनुविधायी (अनुसार होने-वाला) नहीं है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  14. लिंग का अर्थात् मेहनाकार (पुरुषादि की इन्द्रिय का आकार) का ग्रहण जिसके नहीं है सो अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा लौकिक साधन-मात्र नहीं है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  15. लिंग के द्वारा अर्थात् अमेहनाकार के द्वारा जिसका ग्रहण अर्थात् लोक में व्यापकत्व नहीं है सो अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा पाखण्डियों के प्रसिद्ध साधनरूप आकार वाला—लोकव्याप्तिवाला नहीं है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  16. जिसके लिंगों का अर्थात् स्त्री, पुरुष और नपुंसक वेदों का ग्रहण नहीं है वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा द्रव्य से तथा भाव से स्त्री, पुरुष तथा नपुंसक नहीं है' इस अर्थ की प्राप्ति होती है
  17. लिंगों का अर्थात् धर्मचिह्नों का ग्रहण जिसके नहीं है वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा के बहिरंग यतिलिंगों का अभाव है' इस अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  18. लिंग अर्थात् गुण ऐसा जो ग्रहण अर्थात् अर्थावबोध (पदार्थज्ञान) जिसके नहीं है सो अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा गुणविशेष से आलिंगित न होनेवाला ऐसा शुद्ध द्रव्य है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  19. लिंग अर्थात् पर्याय ऐसा जो ग्रहण, अर्थात् अर्थावबोध-विशेष जिसके नहीं है सो अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा पर्यायविशेष से आलिंगित न होनेवाला ऐसा शुद्ध द्रव्य है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  20. लिंग अर्थात् प्रत्यभिज्ञान का कारण ऐसा जो ग्रहण अर्थात् अर्थावबोध सामान्य जिसके नहीं है वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा द्रव्य से नहीं आलिंगित ऐसी शुद्ध पर्याय है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ॥१७२॥
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ किं तर्हि जीवस्य शरीरादिपरद्रव्येभ्यो भिन्नमन्यद्रव्यासाधारणं स्वस्वरूपमितिप्रश्ने प्रत्युत्तरं ददाति --
अरसमरूवमगंधं रसरूपगन्धरहितत्वात्तथा चाध्याहार्यमाणास्पर्शरूपत्वाच्च अव्वत्तं अव्यक्तत्वात् असद्दं अशब्दत्वात् अलिंगग्गहणं अलिङ्गग्रहणत्वात् अणिद्दिट्ठसंठाणं अनिर्दिष्टसंस्थानत्वाच्च जाण जीवं जानीहि जीवम् । अरसमरूपमगन्धमस्पर्शमव्यक्तमशब्दमलिङ्गग्रहणमनिर्दिष्टसंस्थानलक्षणं च हे शिष्य, जीवं जीवद्रव्यं जानीहि । पुनरपि कथंभूतम् । चेदणागुणं समस्तपुद्गलादिभ्योऽचेतनेभ्योभिन्नः समस्तान्यद्रव्यासाधारणः स्वकीयानन्तजीवजातिसाधारणश्च चेतनागुणो यस्य तं चेतनागुणं च । अलिङ्गग्राह्यमिति वक्तव्ये यदलिङ्गग्रहणमित्युक्तं तत्किमर्थमिति चेत्, बहुतरार्थप्रतिपत्त्यर्थम् ।तथाहि --
लिङ्गमिन्द्रियं तेनार्थानां ग्रहणं परिच्छेदनं न करोति तेनालिङ्गग्रहणो भवति । तदपिकस्मात् । स्वयमेवातीन्द्रियाखण्डज्ञानसहितत्वात् । तेनैव लिङ्गशब्दवाच्येन चक्षुरादीन्द्रियेणान्यजीवानांयस्य ग्रहणं परिच्छेदनं कर्तुं नायाति तेनालिङ्गग्रहण उच्यते । तदपि कस्मात् । निर्विकारातीन्द्रिय-स्वसंवेदनप्रत्यक्षज्ञानगम्यत्वात् । लिङ्गं धूमादि तेन धूमलिङ्गोद्भवानुमानेनाग्निवदनुमेयभूतपरपदार्थानांग्रहणं न करोति तेनालिङ्गग्रहण इति । तदपि कस्मात् । स्वयमेवालिङ्गोद्भवातीन्द्रियज्ञानसहितत्वात् । तेनैव लिङ्गोद्भवानुमानेनाग्निग्रहणवत् परपुरुषाणां यस्यात्मनो ग्रहणं परिज्ञानं कर्तुं नायाति तेनालिङ्ग-ग्रहण इति । तदपि कस्मात् । अलिङ्गोद्भवातीन्द्रियज्ञानगम्यत्वात् । अथवा लिङ्गं चिह्नं लाञ्छनंशिखाजटाधारणादि तेनार्थानां ग्रहणं परिच्छेदनं न क रोति तेनालिङ्गग्रहण इति । तदपि क स्मात् । स्वाभाविकाचिह्नोद्भवातीन्द्रियज्ञानसहितत्वात् । तेनैव चिह्नोद्भवज्ञानेन परपुरुषाणां यस्यात्मनो ग्रहणंपरिज्ञानं कर्तृं नायाति तेनालिङ्गग्रहण इति । तदपि कस्मात् । निरुपरागस्वसंवेदनज्ञानगम्यत्वादिति एवमलिङ्गग्रहणशब्दस्य व्याख्यानक्रमेण शुद्धजीवस्वरूपं ज्ञातव्यमित्यभिप्रायः ॥१८४॥


[अरसमरूवमगंधं] रस-रूप-गंध रहित होने के कारण और उसी प्रकार विविध-रूप से ग्रहण करने योग्य नहीं होने से तथा गाथा में जिसका ग्रहण नहीं हो पाया है ऐसा अस्पर्श-रूप होने से [अव्वत्तं] अव्यक्त होने से, [असद्दं] अशब्द होने से, [अलिंग्गहणं] अलिंग-ग्रहण होने से, [अणिद्दिट्ठसंठाणं] और अनिर्दिष्ट-संस्थान वाला होने से [जाण जीवं] जीव को जानो । हे शिष्य ! जीवद्रव्य को अरस, अरूप, अगन्ध, अस्पर्श, अव्यक्त, अशब्द, अलिंग-ग्रहण और अनिर्दिष्ट-संस्थान लक्षण-वाला जानो । और वह जीव कैसा है ? [चेदणागुणम] सम्पूर्ण पुद्गलादि अचेतन द्रव्यों से भिन्न, सम्पूर्ण अन्य द्रव्यों से असाधारण और अपनी अनन्त जीव-जाति में साधारण चेतना-गुण है जिसका, उस चेतना गुण-वाले जीव को जानो, तथा '[अलिंगग्राह्य]' ऐसा कहने योग्य होने पर भी जो '[अलिंगग्रहण]' ऐसा कहा गया है, वह किसलिये कहा गया है ? यदि ऐसा प्रश्न हो तो (उत्तर कहते हैं) अनेक अर्थों का ज्ञान कराने के लिये अलिंगग्राह्य के स्थान पर अलिंगग्रहण कहा गया है ।

वह इसप्रकार -- लिंग अर्थात् इन्द्रिय, उसके द्वारा पदार्थों का ग्रहण अर्थात् ज्ञान नहीं करता है, उससे अलिंगग्रहण है । वह इन्द्रियों द्वारा पदार्थों का ज्ञान क्यों नहीं करता है ? स्वयं ही अतीन्द्रिय अखण्ड-ज्ञान सहित होने के कारण, वह उनके द्वारा पदार्थों का ज्ञान नहीं करता है । उसी लिंग शब्द द्वारा कहने योग्य नेत्र आदि इन्द्रियों से अन्य जीवों के जिसका ग्रहण -- ज्ञान करने को नहीं आता है -- जिसका जानना संभव नहीं है, उससे अलिंगग्रहण कहा है । अन्य जीव इसे नेत्रादि इन्द्रियों द्वारा क्यों नहीं जान सकते हैं ? विकार रहित अतीन्द्रिय स्वसंवेदन-प्रत्यक्ष ज्ञान दारा गम्य होने से, वे उसे उनके द्वारा नहीं जान सकते हैं ।

लिंग अर्थात् धूम (धुँआ) आदि कारण--साधन, उस धूम-लिंग से उत्पन्न अनुमान के द्वारा (ज्ञात हुई) अग्नि के समान अनुमेय-भूत (अनुमान द्वारा जानने योग्य) पर-पदार्थों का ग्रहण -- ज्ञान नहीं करता है, उससे अलिंगग्रहण है । वह लिंग द्वारा पर-पदार्थों का ज्ञान क्यों नहीं करता है ? स्वयं ही अलिंग--लिंग के बिना उत्पन्न अतीन्द्रिय-ज्ञान से सहित होने के कारण, वह लिंग द्वारा उनका ज्ञान नहीं करता है । उसी लिंग से उत्पन्न अनुमान द्वारा अग्नि के ज्ञान के समान, दूसरे पुरुषों को जिस आत्मा का ग्रहण -- ज्ञान करने को नहीं आता है -- जानना संभव नहीं है, उससे अलिंगग्रहण है । लिंग द्वारा अन्य पुरुष इसे क्यों नहीं जान सकते हैं ? लिंग के बिना उत्पन्न अतीन्द्रिय-ज्ञान से गम्य -- ज्ञात होने के कारण, वे लिंग द्वारा उसे नहीं जान सकते हैं ।

अथवा लिंग अर्थात् चिन्ह--लांछन--निशान; शिखा--चोटी, जटाधारण आदि, उनसे पदार्थों का ग्रहण--ज्ञान नहीं करता है, उससे अलिंगग्रहण है । वह, शिखा आदि चिन्हों द्वारा पदार्थों का ज्ञान क्यों नहीं करता है? चिन्हों के बिना उत्पन्न स्वाभाविक अतीन्द्रिय-ज्ञान से सहित होने के कारण, वह इनके द्वारा उनका ज्ञान नहीं करता है । उसी चिन्ह से उत्पन्न ज्ञान द्वारा, दूसरे पुरुषों को जिस आत्मा का ग्रहण--ज्ञान करने को नहीं आता है--जानना संभव नहीं है, उससे अलिंगग्रहण है । चिन्ह से उत्पन्न ज्ञान द्वारा पुरुष इसे क्यों नहीं जान सकते हैं? उपराग (रागादि मलिनता) रहित स्वसंवेदन-ज्ञान द्वारा गम्य होने से इसके द्वारा उसे नहीं जान सकते हैं ।

इसप्रकार अलिंगग्रहण शब्द के विशेष कथन क्रम से शुद्ध जीव का स्वरूप जानना चाहिये -- ऐसा अभिप्राय है ॥१८४॥