
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ किं तर्हि जीवस्य शरीरादिसर्वपरद्रव्यविभागसाधनमसाधारणं स्वलक्षणमित्यावेदयति- आत्मनो हि रसरूपगंधगुणाभावस्वभावत्वात्स्पर्शगुणव्यक्त्यभावस्वभावत्वात् शब्दपर्यायाभावस्वभावत्वात्तथा तन्मूलादलिङ्गग्राह्यत्वात्सर्वसंस्थानाभावास्वभावत्वाच्च पुद्गल-द्रव्यविभागसाधनमरसत्वमरूपत्वमगन्धत्वमव्यक्तत्वमशब्दत्वमलिङ्गग्राह्यत्वम-संस्थानत्वं चास्ति । सकलपुद्गलापुद्गलाजीवद्रव्यविभागसाधनं तु चेतनागुणत्वमस्ति । तदेव च तस्य स्वजीवद्रव्यमात्राश्रितत्वेन स्वलक्षणतां बिभ्राणं शेषद्रव्यान्तरविभागं साधयति । अलिङ्गग्राह्य इति वक्तव्ये यदलिङ्गग्रहणमित्युक्तं तद्बहुतरार्थप्रतिपत्तये । तथा हि - (१) न लिंगैरिन्द्रियैर्ग्राहकतामापन्नस्य ग्रहणं यस्येत्यतीन्द्रियज्ञानमयत्वस्य प्रतिपत्ति: ।(२) न लिंगैरिन्द्रियैर्ग्राह्यतामापन्नस्य ग्रहणं यस्येतीन्द्रियप्रत्यक्षाविषयत्वस्य । (३) न लिंगादिन्द्रियगम्याद्धूमादग्नेरिव ग्रहणं यस्येतीन्द्रियप्रत्यक्षपूर्वकानुमानाविषयत्वस्य । (४) न लिंगादेव परै: ग्रहणं यस्येत्यनुमेयमात्रस्याभावस्य । (५) न लिंगादेव परेषां ग्रहणं यस्येत्यनुमातृमात्रत्वा-भावस्य । (६) न लिंगात्स्वभावेन ग्रहणं यस्येति प्रत्यक्षज्ञातृत्वस्य । (७) न लिंगेनोपयोगाख्य-लक्षणेन ग्रहणं ज्ञेयार्थालम्बनं यस्येति बहिरर्थालम्बनज्ञानाभावस्य । (८) न लिंगस्यो-पयोगाख्यलक्षणस्य ग्रहणं स्वयमाहरणं यस्येत्यनाहार्यज्ञानत्वस्य । (९) न लिंगस्योपयोगाख्यलक्षणस्य ग्रहणं परेण हरणं यस्येत्यहार्यज्ञानत्वस्य । (१०) न लिंगे उपयोगाख्यलक्षणे ग्रहणं सूर्य इवोपरागो यस्येति शुद्धोपयोगस्वभावस्य । (११) न लिंगादुपयोगाख्यलक्षणाद्ग्रहणं पौद्गलिककर्मादान यस्येति द्रव्यकर्मासंपृथक्तत्वस्य । (१२) न लिंगेभ्य इन्द्रियेभ्यो ग्रहणं विषयाणामुपभोगो यस्येति विषयोपभोक्तृत्वाभावस्य । (१३) न लिंगात्मनो वेन्द्रियादिलक्षणाद्ग्रहणं जीवस्य धारणं यस्येति शुक्रार्तवानुविधायित्वाभावस्य । (१४) न लिंगस्य मेहनाकारस्य ग्रहणं यस्येति लौकिकसाधनमात्रत्वाभावस्य । (१५) न लिंगेनामेहनाकारेण ग्रहणं लोकव्याप्तिर्यस्येति कुहुकप्रसिद्धसाधनाकारलोकव्याप्तित्वाभावस्य । (१६) न लिंगानां स्त्रीपुत्रनपुंसकवेदानां ग्रहणं यस्येति स्त्रीपुत्रनपुंसकद्रव्यभावाभावस्य । (१७) न लिंगानां धर्मध्वजानां ग्रहणं यस्येति बहिरङ्गयतिलिंगाभावस्य । (१८) न लिंगं गुणो ग्रहणमर्थावबोधो यस्येति गुणविशेषनालीढशुद्धद्रव्यत्वस्य । (१९) न लिंगं पर्यायो ग्रहणमर्थावबोध-विशेषो यस्येति पर्यायविशेषानालीढशुद्धद्रव्यत्वस्य । (२०) न लिंगं प्रत्यभिज्ञानहेतुर्ग्रहण-मर्थावबोधसामान्यं यस्येति द्रव्यानालीढशुद्धपर्यायत्वस्य ॥१७२॥ आत्मा
जहाँ 'अलिंगग्राह्य' करना है वहाँ जो 'अलिंगग्रहण' कहा है, वह बहुत से अर्थों की प्रतिपत्ति (प्राप्ति, प्रतिपादन) करने के लिये है । वह इस प्रकार है :—
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जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ किं तर्हि जीवस्य शरीरादिपरद्रव्येभ्यो भिन्नमन्यद्रव्यासाधारणं स्वस्वरूपमितिप्रश्ने प्रत्युत्तरं ददाति -- अरसमरूवमगंधं रसरूपगन्धरहितत्वात्तथा चाध्याहार्यमाणास्पर्शरूपत्वाच्च अव्वत्तं अव्यक्तत्वात् असद्दं अशब्दत्वात् अलिंगग्गहणं अलिङ्गग्रहणत्वात् अणिद्दिट्ठसंठाणं अनिर्दिष्टसंस्थानत्वाच्च जाण जीवं जानीहि जीवम् । अरसमरूपमगन्धमस्पर्शमव्यक्तमशब्दमलिङ्गग्रहणमनिर्दिष्टसंस्थानलक्षणं च हे शिष्य, जीवं जीवद्रव्यं जानीहि । पुनरपि कथंभूतम् । चेदणागुणं समस्तपुद्गलादिभ्योऽचेतनेभ्योभिन्नः समस्तान्यद्रव्यासाधारणः स्वकीयानन्तजीवजातिसाधारणश्च चेतनागुणो यस्य तं चेतनागुणं च । अलिङ्गग्राह्यमिति वक्तव्ये यदलिङ्गग्रहणमित्युक्तं तत्किमर्थमिति चेत्, बहुतरार्थप्रतिपत्त्यर्थम् ।तथाहि -- लिङ्गमिन्द्रियं तेनार्थानां ग्रहणं परिच्छेदनं न करोति तेनालिङ्गग्रहणो भवति । तदपिकस्मात् । स्वयमेवातीन्द्रियाखण्डज्ञानसहितत्वात् । तेनैव लिङ्गशब्दवाच्येन चक्षुरादीन्द्रियेणान्यजीवानांयस्य ग्रहणं परिच्छेदनं कर्तुं नायाति तेनालिङ्गग्रहण उच्यते । तदपि कस्मात् । निर्विकारातीन्द्रिय-स्वसंवेदनप्रत्यक्षज्ञानगम्यत्वात् । लिङ्गं धूमादि तेन धूमलिङ्गोद्भवानुमानेनाग्निवदनुमेयभूतपरपदार्थानांग्रहणं न करोति तेनालिङ्गग्रहण इति । तदपि कस्मात् । स्वयमेवालिङ्गोद्भवातीन्द्रियज्ञानसहितत्वात् । तेनैव लिङ्गोद्भवानुमानेनाग्निग्रहणवत् परपुरुषाणां यस्यात्मनो ग्रहणं परिज्ञानं कर्तुं नायाति तेनालिङ्ग-ग्रहण इति । तदपि कस्मात् । अलिङ्गोद्भवातीन्द्रियज्ञानगम्यत्वात् । अथवा लिङ्गं चिह्नं लाञ्छनंशिखाजटाधारणादि तेनार्थानां ग्रहणं परिच्छेदनं न क रोति तेनालिङ्गग्रहण इति । तदपि क स्मात् । स्वाभाविकाचिह्नोद्भवातीन्द्रियज्ञानसहितत्वात् । तेनैव चिह्नोद्भवज्ञानेन परपुरुषाणां यस्यात्मनो ग्रहणंपरिज्ञानं कर्तृं नायाति तेनालिङ्गग्रहण इति । तदपि कस्मात् । निरुपरागस्वसंवेदनज्ञानगम्यत्वादिति एवमलिङ्गग्रहणशब्दस्य व्याख्यानक्रमेण शुद्धजीवस्वरूपं ज्ञातव्यमित्यभिप्रायः ॥१८४॥ [अरसमरूवमगंधं] रस-रूप-गंध रहित होने के कारण और उसी प्रकार विविध-रूप से ग्रहण करने योग्य नहीं होने से तथा गाथा में जिसका ग्रहण नहीं हो पाया है ऐसा अस्पर्श-रूप होने से [अव्वत्तं] अव्यक्त होने से, [असद्दं] अशब्द होने से, [अलिंग्गहणं] अलिंग-ग्रहण होने से, [अणिद्दिट्ठसंठाणं] और अनिर्दिष्ट-संस्थान वाला होने से [जाण जीवं] जीव को जानो । हे शिष्य ! जीवद्रव्य को अरस, अरूप, अगन्ध, अस्पर्श, अव्यक्त, अशब्द, अलिंग-ग्रहण और अनिर्दिष्ट-संस्थान लक्षण-वाला जानो । और वह जीव कैसा है ? [चेदणागुणम] सम्पूर्ण पुद्गलादि अचेतन द्रव्यों से भिन्न, सम्पूर्ण अन्य द्रव्यों से असाधारण और अपनी अनन्त जीव-जाति में साधारण चेतना-गुण है जिसका, उस चेतना गुण-वाले जीव को जानो, तथा '[अलिंगग्राह्य]' ऐसा कहने योग्य होने पर भी जो '[अलिंगग्रहण]' ऐसा कहा गया है, वह किसलिये कहा गया है ? यदि ऐसा प्रश्न हो तो (उत्तर कहते हैं) अनेक अर्थों का ज्ञान कराने के लिये अलिंगग्राह्य के स्थान पर अलिंगग्रहण कहा गया है । वह इसप्रकार -- लिंग अर्थात् इन्द्रिय, उसके द्वारा पदार्थों का ग्रहण अर्थात् ज्ञान नहीं करता है, उससे अलिंगग्रहण है । वह इन्द्रियों द्वारा पदार्थों का ज्ञान क्यों नहीं करता है ? स्वयं ही अतीन्द्रिय अखण्ड-ज्ञान सहित होने के कारण, वह उनके द्वारा पदार्थों का ज्ञान नहीं करता है । उसी लिंग शब्द द्वारा कहने योग्य नेत्र आदि इन्द्रियों से अन्य जीवों के जिसका ग्रहण -- ज्ञान करने को नहीं आता है -- जिसका जानना संभव नहीं है, उससे अलिंगग्रहण कहा है । अन्य जीव इसे नेत्रादि इन्द्रियों द्वारा क्यों नहीं जान सकते हैं ? विकार रहित अतीन्द्रिय स्वसंवेदन-प्रत्यक्ष ज्ञान दारा गम्य होने से, वे उसे उनके द्वारा नहीं जान सकते हैं । लिंग अर्थात् धूम (धुँआ) आदि कारण--साधन, उस धूम-लिंग से उत्पन्न अनुमान के द्वारा (ज्ञात हुई) अग्नि के समान अनुमेय-भूत (अनुमान द्वारा जानने योग्य) पर-पदार्थों का ग्रहण -- ज्ञान नहीं करता है, उससे अलिंगग्रहण है । वह लिंग द्वारा पर-पदार्थों का ज्ञान क्यों नहीं करता है ? स्वयं ही अलिंग--लिंग के बिना उत्पन्न अतीन्द्रिय-ज्ञान से सहित होने के कारण, वह लिंग द्वारा उनका ज्ञान नहीं करता है । उसी लिंग से उत्पन्न अनुमान द्वारा अग्नि के ज्ञान के समान, दूसरे पुरुषों को जिस आत्मा का ग्रहण -- ज्ञान करने को नहीं आता है -- जानना संभव नहीं है, उससे अलिंगग्रहण है । लिंग द्वारा अन्य पुरुष इसे क्यों नहीं जान सकते हैं ? लिंग के बिना उत्पन्न अतीन्द्रिय-ज्ञान से गम्य -- ज्ञात होने के कारण, वे लिंग द्वारा उसे नहीं जान सकते हैं । अथवा लिंग अर्थात् चिन्ह--लांछन--निशान; शिखा--चोटी, जटाधारण आदि, उनसे पदार्थों का ग्रहण--ज्ञान नहीं करता है, उससे अलिंगग्रहण है । वह, शिखा आदि चिन्हों द्वारा पदार्थों का ज्ञान क्यों नहीं करता है? चिन्हों के बिना उत्पन्न स्वाभाविक अतीन्द्रिय-ज्ञान से सहित होने के कारण, वह इनके द्वारा उनका ज्ञान नहीं करता है । उसी चिन्ह से उत्पन्न ज्ञान द्वारा, दूसरे पुरुषों को जिस आत्मा का ग्रहण--ज्ञान करने को नहीं आता है--जानना संभव नहीं है, उससे अलिंगग्रहण है । चिन्ह से उत्पन्न ज्ञान द्वारा पुरुष इसे क्यों नहीं जान सकते हैं? उपराग (रागादि मलिनता) रहित स्वसंवेदन-ज्ञान द्वारा गम्य होने से इसके द्वारा उसे नहीं जान सकते हैं । इसप्रकार अलिंगग्रहण शब्द के विशेष कथन क्रम से शुद्ध जीव का स्वरूप जानना चाहिये -- ऐसा अभिप्राय है ॥१८४॥ |