
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ द्रव्यबन्धहेतुत्वेन रागपरिणाममात्रस्य भावबन्धस्य निश्चयबन्धत्वं साधयति - यतो रागपरिणत एवाभिनवेन द्रव्यकर्मणा बध्यते, न वैराग्यपरिणत:, अभिनवेन द्रव्यकर्मणा रागपरिणतो न मुच्यते वैराग्यपरिणत एव, बध्यत एव संस्पृशतैवाभिनवेन द्रव्य-कर्मणा चिरसंचितेन पुराणेन च, न मुच्यते रागपरिणत:, मुच्यत एव संस्पृशतैवाभिनवेन द्रव्यकर्मणा चिरसंचितेन पुराणेन च वैराग्यपरिणतो न बध्यते; ततोऽवधार्यते द्रव्यबन्धस्य साधकतमत्वाद्रागपरिणाम एव निश्चयेन बन्ध: ॥१७९॥ रागपरिणत जीव ही नवीन द्रव्यकर्म से बँधता है, वैराग्यपरिणत नहीं बँधता रागपरिणत जीव नवीन द्रव्यकर्म से मुक्त नहीं होता, वैराग्यपरिणत ही मुक्त होता है; रागपरिणत जीव संस्पर्श करने (सम्बन्ध में आने) वाले नवीन द्रव्यकर्म से, और चिरसंचित (दीर्घकाल से संचित ऐसे) पुराने द्रव्यकर्म से बँधता ही है, मुक्त नहीं होता; वैराग्यपरिणत जीव संस्पर्श करने (सम्बन्ध में आने) वाले नवीन द्रव्यकर्म से और चिरसंचित ऐसे पुराने द्रव्यकर्म से मुक्त ही होता है, बँधता नहीं है; इससे निश्चित होता है कि—द्रव्यबंध का साधकतम (उत्कृष्ट हेतु) होने से रागपरिणाम ही निश्चय से बन्ध है ॥१७९॥ |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ द्रव्य-बन्धकारणत्वान्निश्चयेन रागादिविकल्परूपो भावबन्ध एव बन्ध इति प्रज्ञापयति -- रत्तो बंधदि कम्मं रक्तो बध्नाति कर्म । रक्त एव कर्म बध्नाति, न च वैराग्यपरिणतः । मुच्चदि कम्मेहिं रागरहिदप्पा मुच्यते कर्मभ्यांरागरहितात्मा । मुच्यत एव शुभाशुभकर्मभ्यां रागरहितात्मा, न च बध्यते । एसो बंधसमासो एषप्रत्यक्षीभूतो बन्धसंक्षेपः । जीवाणं जीवानां सम्बन्धी । जाण णिच्छयदो जानीहि त्वं हे शिष्य, निश्चयतोनिश्चयनयाभिप्रायेणेति । एवं रागपरिणाम एव बन्धकारणं ज्ञात्वा समस्तरागादिविकल्पजालत्यागेनविशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावनिजात्मतत्त्वे निरन्तरं भावना कर्तव्येति ॥१७९॥ [रत्ते बंधदि कम्मं] रक्त (रागादि से रँगा हुआ) कर्म बाँधता है । रक्त ही कर्म बांधता है और वैराग्य परिणत कर्म नहीं बांधता है । [मुच्चदि कम्मेहिं रागरहिदप्पा] राग-रहित आत्मा कर्मों से छूटता है । राग रहित आत्मा शुभाशुभ कर्मों से छूटता ही है, बँधता नहीं है । [एसो बंधसमासो] प्रत्यक्षीभूत बन्ध का यह संक्षेप है । [जीवाणं] जीवों सम्बन्धी । [जाण णिच्छयदो] हे शिष्य! तुम जानो, निश्चय से -- निश्चयनय के अभिप्राय से । इसप्रकार राग परिणाम ही बन्ध का कारण है - ऐसा जानकर सम्पूर्ण रागादि विकल्प समूहों के त्याग- पूर्वक विशुद्ध ज्ञान-दर्शन स्वभावी निजात्म-तत्त्व में निरन्तर भावना करना चाहिये ॥१९१॥ |