+ पुद्गल-परिणाम आत्मा का कर्म नहीं -
स इदाणिं कत्ता सं सगपरिणामस्स दव्वजादस्स । (186)
आदीयदे कदाइं विमुच्चदे कम्मधूलीहिं ॥198॥
स इदानीं कर्ता सन् स्वकपरिणामस्य द्रव्यजातस्य ।
आदीयते कदाचिद्विमुच्यते कर्मधूलिभिः ॥१८६॥
भवदशा में रागादि को करता हुआ यह आतमा
रे कर्मरज से कदाचित् यह ग्रहण होता छूटता ॥१९८॥
अन्वयार्थ : [सः] वह [इदानीं] अभी (संसारावस्था में) [द्रव्यजातस्य] द्रव्य से (आत्मद्रव्य से) उत्‍पन्‍न होने वाले [स्वकपरिणामस्य] (अशुद्ध) स्वपरिणाम का [कर्ता सन्] कर्ता होता हुआ [कर्मशुलभि:] कर्मरज से [आदीयते] ग्रहण किया जाता है और [कदाचित् विमुच्‍यते] कदाचित् छोड़ा जाता है । =
Meaning : The soul (jīva), in its worldly state, becomes the doer (kartā) of the transformation of the soul-substance (ātmadravya) into impure dispositions. It is then taken in by the particles of material-karmas, and is also given up by these particles of material-karmas on fruition.

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथात्मन: कुतस्तर्हि पुद्‌गलकर्मभिरुपादानं हानं चेति निरूपयति -

सोऽयमात्मा परद्रव्योपादानहानशून्योऽपि सांप्रतं संसारावस्थायां निमित्तमात्रीकृतपरद्रव्य-परिणामस्य स्वपरिणाममात्रस्य द्रव्यत्वभूतत्वात्केवलस्य कलयन्‌ कर्तृत्वं, तदेव तस्य स्वपरिणामं निमित्तमात्रीकृत्योपात्तकर्मपरिणामाभि: पुद्‌गलधूलीभिर्विशिष्टावगाहरूपेणोपादीयते कदाचिन्मुच्यते च ॥१८६॥


सो यह आत्मा परद्रव्य के ग्रहण-त्याग से रहित होता हुआ भी अभी संसारावस्था में, परद्रव्य-परिणाम को निमित्त-मात्र करते हुए केवल स्व-परिणाम-मात्र का—उस स्व-परिणाम के द्रव्यत्वभूत होने से—कर्तृत्व का अनुभव करता हुआ, उसके इसी स्व-परिणाम को निमित्त-मात्र करके कर्म-परिणाम को प्राप्त होती हुई ऐसी पुद्‌गलरज के द्वारा विशिष्ट अवगाहरूप से ग्रहण किया जाता है और कदाचित् छोड़ा जाता है ।

अब पुद्गल कर्मों की विचित्रता (ज्ञानावरण, दर्शनावरणादिरूप अनेक प्रकारता) को कौन करता है ? इसका निरूपण करते हैं :-
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ यद्ययमात्मा पुद्गलकर्म न करोति न च मुञ्चति तर्हि बन्धः कथं,तर्हि मोक्षोऽपि कथमिति प्रश्ने प्रत्युत्तरं ददाति --
स इदाणिं कत्ता सं स इदानीं कर्ता सन् । स पूर्वोक्तलक्षणआत्मा, इदानीं कोऽर्थः एवं पूर्वोक्त नयविभागेन, कर्ता सन् । कस्य । सगपरिणामस्स निर्विकारनित्या-नन्दैकलक्षणपरमसुखामृतव्यक्तिरूपकार्यसमयसारसाधकनिश्चयरत्नत्रयात्मककारणसमयसारविलक्षणस्यमिथ्यात्वरागादिविभावरूपस्य स्वकीयपरिणामस्य । पुनरपि किंविशिष्टस्य । दव्वजादस्स स्वकीयात्म-द्रव्योपादानकारणजातस्य । आदीयदे कदाई कम्मधूलीहिं आदीयते बध्यते । काभिः । कर्मधूलीभिः कर्तृ-भूताभिः कदाचित्पूर्वोक्तविभावपरिणामकाले । न केवलमादीयते, विमुच्चदे विशेषेण मुच्यते त्यज्यतेताभिः कर्मधूलीभिः कदाचित्पूर्वोक्तकारणसमयसारपरिणतिकाले । एतावता किमुक्तं भवति । अशुद्ध-परिणामेन बध्यते शुद्धपरिणामेन मुच्यत इति ॥१९८॥


तब (यदि आत्मा पुद्‌गलों को कर्मरूप परिणमित नहीं करता तो फिर) आत्मा किस प्रकार पुद्‌गल कर्मों के द्वारा ग्रहण किया जाता है और छोड़ा जाता है? इसका अब निरूपण करते हैं -

[स इदाणिं कत्त्ता सं] वह अब कर्ता होता हुआ । वह पहले कहे गये लक्षण-वाला आत्मा , 'इदानीं अर्थात् अब' का क्या अर्थ है ? इसप्रकार पहले (१९६ वीं गाथा मे) कहे गये नय-विभाग से कर्ता होता हुआ यह 'अब' का अर्थ है । किसका कर्ता होता हुआ ? [सगपरिणामस्स] विकार रहित हमेशा आनन्द एक लक्षण परमसुखरूपी अमृत की प्रगटतारूप कार्य-समयसार को साधनेवाले निश्चय रत्नत्रय स्वरूप कारण समयसार से विलक्षण, मिथ्यात्व-रागादि विभावरूप अपने परिणामों का कर्ता होता हुआ । और भी किस विशेषता वाला है? [दव्वजादस्स] अपने आत्मद्रव्य के उपादान-कारण से उत्पन्न परिणामों का कर्ता होता हुआ । [आदीयदे कदाई कम्मधूलीहिं] बँधता है । किनसे बँधता है ? कर्ताभूत (कर्म-वाच्य की अपेक्षा कर्ता-कारक में प्रयुक्त) कर्म-रजों से बंधता है, कदाचित्- पहले कहे गये विभाव परिणामों के समय बंधता है । न केवल बंधता है, [विमुच्चदे] विशेषरूप से छूटता है, उन कर्म-रजों से कदाचित् पहले कहे गये कारण समयसार- रूप परिणति के समय छूटता है ।

इससे क्या कहा गया है? अथवा इस सब कथन का क्या प्रयोजन है? अशुद्ध परिणामों से जीव बँधता है, शुद्ध परिणाम से छूटता है -- यह ज्ञान कराना इस कथन का प्रयोजन है ॥१९८॥