
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
यथा ममात्मना दु:खमोक्षार्थिना - किच्चा अरहंताणं सिद्धाणं तह णमो गणहराणं । अज्झावयवग्गाणं साहूणं चेव सव्वेसिं ॥४ ॥ तेसिं विसुद्धदंसणणाणपहाणासमं समासेज्ज । उवसंपयामि सम्मं जत्ते णिव्वाणसंपत्ती ॥५॥१ इति अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसाधूनां प्रणतिवन्दनात्मकनमस्कारपुर:सरं विशुद्धदर्शन-ज्ञानप्रधानं साम्यनाम श्रामण्यमवान्तरग्रन्थसंदर्भोभयसंभावितसौस्थित्यं स्वयं प्रतिपन्नं, परेषामात्मापि यदि दु:खमोक्षार्थी तथा तत्प्रतिपद्यताम् । यथानुभूतस्य तत्प्रत्तिपत्तिवर्त्मन: प्रणेतारो वयमिमे तिष्ठाम इति ॥२०१॥ अब दूसरों को चरणानुयोग की सूचक चूलिका है । ज्ञान-ज्ञेय को जानकर धर चारित्र महान ।
(उसमें, प्रथम श्री अमृतचन्द्राचार्य-देव श्लोक के द्वारा अब इस आगामी गाथा की उत्थानिका करते हैं ।)शिवमग की परिपूर्णता पावैं श्रद्धावान ॥ द्रव्यसिद्धि से चरण अर चरण सिद्धि से द्रव्य ।
द्रव्य की सिद्धि में चरण की सिद्धि है, और चरण की सिद्धि में द्रव्य की सिद्धि है,—यह जानकर, कर्मों से (शुभाशुभ भावों से) अविरत दूसरे भी, द्रव्य से अविरुद्ध चरण (चारित्र) का आचरण करो ।यह लखकर सब आचरो द्रव्यों से अविरुद्ध ॥१३॥ इस प्रकार (श्रीमद् भगवत्कृन्दकुन्दाचार्यदेव इस आगामी गाथा के द्वारा) दूसरों को चरण (चारित्र) के आचरण करने में युक्त करते (जोड़ते) हैं । अब गाथा के प्रारंभ करने से पूर्व उसकी संधि के लिये श्री अमृतचन्द्राचार्यदेव ने पंच परमेष्ठी को नमस्कार करने के लिये निम्न प्रकार से ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन अधिकार की प्रथम तीन गाथायें लिखी हैं:— एस सुरासुरमणुसिंदवंदिदंधोदघाइकम्ममलं ।
(अब, इस अधिकार की गाथा प्रारंभ करते हैं : )पणमामि वड्ढमाणं तित्थंधम्मस्स कत्तारं ॥ सेसे पुण तित्थयरे ससव्वसिद्धे विसुद्धसब्भावे । समणे य णाणदंसणचरित्ततववीरियायारे ॥ ते ते सव्वे समगं समगं पत्तेगमेव पत्तेगं । वंदामि य वट्टंते अरहंते माणुसे खेत्ते ॥ जैसे दुःखों से मुक्त होने के अर्थी मेरे आत्माने - किच्चा अरहंताणं सिद्धाणं तह णमो गणहराणं ।
इस प्रकार अर्हन्तों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों तथा साधुओं को प्रणाम--वंदनात्मक नमस्कार पूर्वक विशुद्ध दर्शन-ज्ञान-प्रधान साम्य नामक श्रामण्य को--जिसका इस ग्रंथ में कहे हुए (ज्ञानतत्त्व—प्रज्ञापन और ज्ञेयतत्त्वप्रज्ञापन नामक) दो अधिकारों की रचना द्वारा सुस्थितपन हुआ है उसे--स्वयं अंगीकार किया, उसी प्रकार दूसरों का आत्मा भी, यदि दु:खों से मुक्त होने का अर्थी (इच्छुक) हो तो, उसे अंगीकार करे । उस (श्रामण्य) को अंगीकार करने का जो यथानुभूत मार्ग है उसके प्रणेता हम यह खड़े हुये हैं ॥२०१॥अज्झावयवग्गाणं साहूणं चेव सव्वेसिं ॥ तेसिं विसुद्धदंसणणाणपहाणासमं समासेज्ज । उवसंपयामि सम्मं जत्तो णिव्वाणसंपत्ती ॥ अब, श्रमण होने का इच्छुक पहले क्या-क्या करता है उसका उपदेश करते हैं :- | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अतःपरं यथाक्रमेण सप्ताधिकनवतिगाथापर्यन्तं चूलिकारूपेण चारित्राधिकारव्याख्यानंप्रारभ्यते । तत्र तावदुत्सर्गरूपेण चारित्रस्य संक्षेपव्याख्यानम् । तदनन्तरमपवादरूपेण तस्यैव चारित्रस्यविस्तरव्याख्यानम् । ततश्च श्रामण्यापरनाममोक्षमार्गव्याख्यानम् । तदनन्तरं शुभोपयोगव्याख्यान-मित्यन्तराधिकारचतुष्टयं भवति । तत्रापि प्रथमान्तराधिकारे पञ्च स्थलानि । 'एवं पणमिय सिद्धे'इत्यादिगाथासप्तकेन दीक्षाभिमुखपुरुषस्य दीक्षाविधानकथनमुख्यतया प्रथमस्थलम् । अतःपरं'वदसमिदिंदिय' इत्यादि मूलगुणकथनरूपेण द्वितीयस्थले गाथाद्वयम् । तदनन्तरं गुरुव्यवस्थाज्ञापनार्थं 'लिंगग्गहणे' इत्यादि एका गाथा, तथैव प्रायश्चित्तकथनमुख्यतया 'पयदम्हि' इत्यादि गाथाद्वयमिति समुदायेन तृतीयस्थले गाथात्रयम् । अथाचारादिशास्त्रकथितक्रमेण तपोधनस्य संक्षेपसमाचारकथनार्थं'अधिवासे व' इत्यादि चतुर्थस्थले गाथात्रयम् । तदनन्तरं भावहिंसाद्रव्यहिंसापरिहारार्थं 'अपयत्ता वाचरिया' इत्यादि पञ्चमस्थले सूत्रषट्कमित्येकविंशतिगाथाभिः स्थलपञ्चकेन प्रथमान्तराधिकारे समुदायपातनिका । तद्यथा – अथासन्नभव्यजीवांश्चारित्रे प्रेरयति -- पडिवज्जदु प्रतिपद्यतां स्वीकरोतु । किम् । सामण्णं श्रामण्यं चारित्रम् । यदि किम् । इच्छदि जदि दुक्खपरिमोक्खं यदि चेत्दुःखपरिमोक्षमिच्छति । स कः कर्ता । परेषामात्मा । कथं प्रतिपद्यताम् । एवं एवं पूर्वोक्तप्रकारेण 'एससुरासुरमणुसिंद' इत्यादिगाथापञ्चकेन पञ्चपरमेष्ठिनमस्कारं कृत्वा ममात्मना दुःखमोक्षार्थिनान्यैः पूर्वोक्तभव्यैर्वा यथा तच्चारित्रं प्रतिपन्नं तथा प्रतिपद्यताम् । किं कृत्वा पूर्वम् । पणमिय प्रणम्य । कान् । सिद्धे अञ्ञनपादुकादिसिद्धिविलक्षणस्वात्मोपलब्धिसिद्धिसमेतसिद्धान् । जिणवरवसहे सासादनादिक्षीण-कषायान्ता एकदेशजिना उच्यन्ते, शेषाश्चानागारकेवलिनो जिनवरा भण्यन्ते, तीर्थंकरपरमदेवाश्च जिनवरवृषभा इति, तान् जिनवरवृषभान् । न केवलं तान् प्रणम्य, पुणो पुणो समणे चिच्चमत्कारमात्र-निजात्मसम्यक्श्रद्धानज्ञानानुष्ठानरूपनिश्चयरत्नत्रयाचरणप्रतिपादनसाधकत्वोद्यतान् श्रमणशब्दवाच्याना-चार्योपाध्यायसाधूंश्च पुनः पुनः प्रणम्येति । किंच पूर्वं ग्रन्थप्रारम्भकाले साम्यमाश्रयामीति शिवकुमारमहाराजनामा प्रतिज्ञां करोतीति भणितम्, इदानीं तु ममात्मना चारित्रं प्रतिपन्नमिति पूर्वापरविरोधः । परिहारमाह-- ग्रन्थप्रारम्भात्पूर्वमेव दीक्षा गृहीता तिष्ठति, परं किंतु ग्रन्थकरणव्याजेनक्वाप्यात्मानं भावनापरिणतं दर्शयति, क्वापि शिवकुमारमहाराजं, क्वाप्यन्यं भव्यजीवं वा । तेनकारणेनात्र ग्रन्थे पुरुषनियमो नास्ति, कालनियमो नास्तीत्यभिप्रायः ॥२०१॥ इससे आगे यथाक्रम से ९७ गाथांओं तक चूलिकारूप से चारित्राधिकार का व्याख्यान प्रारम्भ होता है । वहाँ सबसे पहले उत्सर्गरूप से चारित्र का संक्षिप्त व्याख्यान है। उसके बाद अपवादरूप से उस चारित्र का विस्तृत व्याख्यान है। तत्पश्चात् श्रामण्य अपरनाम मोक्षमार्ग का व्याख्यान है । तथा तदुपरान्त शुभोपयोग का व्याख्यान है -- इसप्रकार चार अन्तराधिकार हैं ।
उनमें से भी पहले अन्तराधिकार में पाँच स्थल हैं ।
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