
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ श्रामणस्य छेदायतनत्वात् परद्रव्यप्रतिबन्धा: प्रतिषेध्या इत्युपदिशति - सर्व एव हि परद्रव्यप्रतिबन्धा उपयोगोपरञ्जकत्वेन निरुपरागोपयोगरूपस्य श्रामण्यस्य छेदायतनानि तदभावादेवाछिन्नश्रामण्यम् । अत आत्मन्येवात्मनो नित्याधिकृत्य वासे वा, गुरुत्वेन गुरूनधिकृत्य वासे वा, गुरुभ्यो विशिष्टे वासे वा, नित्यमेव प्रतिषेधयन् परद्रव्यप्रतिबन्धान् श्रामण्ये छेदविहीनो भूत्वा श्रमणो वर्तताम् ॥२१३॥ वास्तव में सभी पर-द्रव्य-प्रतिबंध उपयोग के उपरंजक होने से निरुपराग उपयोग-रूप श्रामण्य के छेद के आयतन हैं; उनके अभाव से ही अछिन्न श्रामण्य होता है । इसलिये आत्मा में ही आत्मा को सदा अधिकृत करके (आत्मा के भीतर) बसते हुए अथवा गुरु-रूप से गुरुओं को अधिकृत करके (गुरुओं के सहवास में) निवास करते हुए या गुरुओं से विशिष्ट—भिन्न वास में वसते हुए, सदा ही पर-द्रव्य-प्रतिबंधों को निषेधता (परिहरता) हुआ श्रामण्य में छेदविहीन होकर श्रमण वर्तो ॥२१३॥ |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ निर्विकारश्रामण्यच्छेदजनकान्परद्रव्यानु-बन्धान्निषेधयति -- विहरदु विहरतु विहारं करोतु । स कः । समणो शत्रुमित्रादिसमचित्तश्रमणः । णिच्चं नित्यं सर्वकालम् । किं कुर्वन्सन् । परिहरमाणो परिहरन्सन् । कान् । णिबंधाणि चेतनाचेतनमिश्र-परद्रव्येष्वनुबन्धान् । क्व विहरतु । अधिवासे अधिकृतगुरुकुलवासे निश्चयेन स्वकीयशुद्धात्मवासेवा, विवासे गुरुविरहितवासे वा । किं कृत्वा । सामण्णे निजशुद्धात्मानुभूतिलक्षणनिश्चयचारित्रे छेदविहूणो भवीय छेदविहीनो भूत्वा, रागादिरहितनिजशुद्धात्मानुभूतिलक्षणनिश्चयचारित्रच्युतिरूपच्छेदरहितो भूत्वा । तथाहि -- गुरुपार्श्वे यावन्ति शास्त्राणि तावन्ति पठित्वा तदनन्तरं गुरुं पृष्ट्वा च समशीलतपोधनैः सह,भेदाभेदरत्नत्रयभावनया भव्यानामानन्दं जनयन्, तपःश्रुतसत्त्वैकत्वसन्तोषभावनापञ्चकं भावयन्,तीर्थकरपरमदेवगणधरदेवादिमहापुरुषाणां चरितानि स्वयं भावयन्, परेषां प्रकाशयंश्च, विहरतीति भावः ॥२२७॥ [विहरदु] विहार करें । वे कौन विहार करें? [समणो] शत्रु-मित्र आदि में समान चित्तवाले श्रमण, विहार करें । [णिच्चं] नित्य-सभी कालों में । क्या करते हुए वे, विहार करें? [परिहरमाणो] परिहार-निराकरण करते हुए वे विहार करें । किनका परिहार करते हुये वे विहार करें ? [णिबंधाणि] चेतन-अचेतन और मिश्र परद्रव्यों में अनुबन्ध-सम्बन्ध का परिहार करते हुये वे विहार करें । वे कहाँ विहार करें? [अधिवासे] अधिकृत गुरु-कुल वास में अथवा निश्चय में अपने शुद्धाआत्मारूपी वास में [विवासे] अथवा गुरु से भिन्न वास में विहार करें । क्या करके यहाँ विहार करें ? [सामण्णे] अपने शुद्धात्मा की अनुभूति स्वरूप निश्चल चारित्र में [छेदोविहूणो भवीय] छेद से रहित होकर रागादि रहित अपने शुद्धात्मा की अनुभूति लक्षण निश्चय चारित्र से च्युतिरूप छेद-रहित होकर यहाँ विहार करें । वह इसप्रकार- गुरु के पास जितने शास्त्र हों, उतने पढ़कर और उसके बाद गुरु से पूछकर समान, शीलवाले तपस्वियों के साथ, भेद-अभेद रत्नत्रय की भावना से, भव्यों को आनन्द उत्पन्न करते हुए, तप-श्रुत-सत्व-एकत्व-सन्तोष रूप पाँच भावनाओं को भाते हुए, तीर्थंकर-परमदेव, गणधरदेव आदि महापुरुषों के चरित्रों को स्वयं भाते हुए और दूसरों को बताते विहार करते हैं । |