
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ को नाम छेद इत्युपदिशति - अशुद्धोपयोगो हि छेद:, शुद्धोपयोगरूपस्य श्रामण्यस्य छेदनात्, तस्य हिंसनात् स एव च हिंसा । अत: श्रमणस्याशुद्धोपयोगाविनाभाविनी शयनासनस्थानचंक्रमणादिष्वप्रयता या चर्या सा खलु तस्य सर्वकालमेव संतानवाहिनी छेदानर्थान्तरभूता हिंसैव ॥२१६॥ अशुद्धोपयोग वास्तव में छेद है, क्योंकि (उससे) शुद्धोपयोगरूप श्रामण्य का छेदन होता है; और वही (अशुद्धोपयोग ही) हिंसा है, क्योंकि (उससे) शुद्धोपयोगरूप श्रामण्य का हिंसन (हनन) होता है । इसलिये श्रमण के, जो अशुद्धोपयोग के बिना नहीं होती ऐसे शयन-आसन-स्थान-गमन इत्यादि में *अप्रयत चर्या (आचरण) वह वास्तव में उसके लिये सर्वकाल में (सदा) ही संतानवाहिनी हिंसा ही है, -- जो कि छेद से अनन्यभूत है (अर्थात् छेद से कोई भिन्न वस्तु नहीं है) ॥२१६॥ *अप्रयत = = प्रयत्न रहित, असावधान, असंयमी, निरंकुश, स्वच्छन्दी । |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ शुद्धोपयोगभावनाप्रतिबन्धकच्छेदं कथयति -- मदा मता सम्मता । का । हिंसा शुद्धोपयोगलक्षणश्रामण्यछेदकारणभूता हिंसा । कथंभूता । संतत्रिय त्ति संतता निरन्तरेति । का हिंसा मता । चरिया चर्या चेष्टा । यदि चेत् कथंभूता । अपयत्ता वा अप्रयत्ना वा, निःकषायस्वसंवित्ति-रूपप्रयत्नरहिता संक्लेशसहितेत्यर्थः । केषु विषयेषु । सयणासणठाणचंकमादीसु शयनासनस्थान-चङ्क्र मणस्वाध्यायतपश्चरणादिषु । कस्य । समणस्स श्रमणस्य तपोधनस्य । क्व । सव्वकाले सर्वकाले । अयमत्रार्थः -- बाह्यव्यापाररूपाः शत्रवस्तावत्पूर्वमेव त्यक्तास्तपोधनैः, अशनशयनादिव्यापारैः पुनस्त्यक्तुं नायाति । ततः कारणादन्तरङ्गक्रोधादिशत्रुनिग्रहार्थं तत्रापि संक्लेशो न कर्तव्य इति ॥२३०॥ [मदा] मानी गई है-सम्मत की गई है-स्वीकृत की गई है । कौन मानी गई है? [हिंसा] शुद्धोपयोग लक्षण श्रामण्य (मुनिपना) में छेद की कारणभूत हिंसा मानी गई है । वह हिंसा कैसी है? [संततिय त्ति] वह हिंसा सतत-निरन्तर है । हिंसा क्या मानी गई है ? [चरिया] चर्या-चेष्टा हिंसा मानी गई है । यदि वह चर्या कैसी हो तो हिंसा मानी गई है? [अपयत्ता वा] प्रयत्न रहित अथवा कषाय रहित आत्मानुभूतिरूप प्रयत्न से रहित-संक्लेश से सहित चर्या हिंसा मानी गई है - ऐसा अर्थ है । किन विषयों में आत्मानुभूति रहित चर्या हिंसा है? [सयणासणठाणचंकमादीसु] सोने, बैठने, उठने, जाने, स्वाध्याय करने, तपश्चरण करने आदि में आत्मानुभूति रहित-अप्रयत चर्या सतत हिंसा है । यह हिंसा किसके है? [समणस्स] श्रमण- मुनिराज के यह हिंसा है । उन्हें यह हिंसा कब है ? [सव्वकाले] सभी काली में उन्हें यह हिंसा है । यहाँ अर्थ यह है- मुनिराजों द्वारा बाह्य व्यापार रूप शत्रु तो पहले ही छोड़ दिये गये थे; भोजन, शयन आदि व्यापार छोड़ना संभव नहीं है । इस कारण अंतरंग क्रोधादि शत्रुओं के निग्रह के लिए, वहां भी संक्लेश नहीं करना चाहिये । |