
जयसेनाचार्य : संस्कृत
गेण्हदि व चेलखंडं गृह्णाति वा चेलखण्डं वस्त्रखण्डं, भायणं भिक्षाभाजनं वा अत्थि त्ति भणिदं अस्तीति भणितमास्ते । क्व । इह सुत्ते इह विवक्षितागमसूत्रे जदि यदि चेत् । सो चत्तालंबो हवदि कहं निरालम्बनपरमात्मतत्त्वभावनाशून्यः सन् स पुरुषो बहिर्द्रव्यालम्बनरहितः कथं भवति, न कथमपि; वा अणारंभो निःक्रियनिरारम्भनिजात्मतत्त्वभावनारहितत्वेन निरारम्भो वा कथं भवति, किंतु सारम्भ एव; इति प्रथमगाथा । वत्थक्खंडं दुद्दियभायणं वस्त्रखण्डं दुग्धिकाभाजनं अण्णं च गेण्हदि अन्यच्च गृह्णातिकम्बलमृदुशयनादिकं यदि चेत् । तदा किं भवति । णियदं विज्जदि पाणारंभो निजशुद्धचैतन्य-लक्षणप्राणविनाशरूपो परजीवप्राणविनाशरूपो वा नियतं निश्चितं प्राणारम्भः प्राणवधो विद्यते, न केवलं प्राणारम्भः, विक्खेवो तस्स चित्तम्मि अविक्षिप्तचित्तपरमयोगरहितस्य सपरिग्रहपुरुषस्य विक्षेपस्तस्य विद्यतेचित्ते मनसीति । इति द्वितीयगाथा । गेण्हइ स्वशुद्धात्मग्रहणशून्यः सन् गृह्णाति किमपि बहिर्द्रव्यं; विधुणइ कर्मधूलिं विहाय बहिरङ्गधूलिं विधूनोति विनाशयति; धोवइ निर्मलपरमात्मतत्त्वमलजनकरागादिमलंविहाय बहिरङ्गमलं धौति प्रक्षालयति; सोसेइ जदं तु आदवे खित्ता निर्विकल्पध्यानातपेन संसारनदी-शोषणमकुर्वन् शोषयति शुष्कं करोति यतं तु यत्नपरं तु यथा भवति । किं कृत्वा । आतपे निक्षिप्य । किं तत् । पत्तं व चेलखंडं पात्रं वस्त्रखण्डं वा । बिभेदि निर्भयशुद्धात्मतत्त्वभावनाशून्यः सन् बिभेति भयंकरोति । कस्मात्सकाशात् । परदो य परतश्चौरादेः । पालयदि परमात्मभावनां न पालयन्न रक्षन्परद्रव्यंकिमपि पालयतीति तृतीयगाथा ॥२३७-२३९॥ अब उसी परिग्रह त्याग को दृढ करते हैं - [गेण्हदि व चेलखंडं] चेलखंड-खण्डवस्त्र को ग्रहण करता है, [भायणं] अथवा भिक्षा आहार के लिये पात्र अत्थि त्ति भणिदं- है - ऐसा कहा गया है । कहाँ कहा गया है? [इह सुत्ते] यहाँ विवक्षित आगम सूत्र में कहा गया है, [जदि] यदि तो । [सो चत्तालंबो हवदि कहं] पर के आलम्बन से रहित परमात्मतत्व की भावना से शून्य होता हुआ वह बाह्य द्रव्य के आलम्बन से रहित कैसे हो सकता है ? किसी भी प्रकार नहीं हो सकता है, [वा अणारम्भो] क्रिया रहित-आरम्भ रहित अपने आत्मतत्त्व की भावना से रहित होने के कारण वह आरम्भ रहित कैसे हो सकता है? अपितु आरम्भ सहित ही है- इसप्रकार पहली (२३७ वीं) गाथा पूर्ण हुई । [वत्थक्खंडं दुद्दियभायणं] वस्त्र का टुकडा अथवा खण्ड वस्त्र, दूध का बर्तन अण्णं च गेण्हदि- और दूसरे कम्बल, कोमल शैया आदि यदि ग्रहण करता है तो । यदि ये सब ग्रहण करता है तो क्या होता है? [णियदं विज्जदि पाणारम्भो] यदि ये सब यहण करता है तो उसके अपने शुद्ध-चैतन्य लक्षण प्राणों के विनाशरूप अथवा दूसरे जीवों के प्राणों के विनाशरूप प्राणारम्भ-प्राणवध निश्चित पाया जाता है; मात्र प्राणारम्भ ही नहीं अपितु [विक्खेवो तस्स चित्तम्मि] विक्षिप्त मन से रहित परम योग से रहित, परिग्रह सहित उस पुरुष के चित्त में- मन में विक्षेप (चंचलपना) पाया जाता है- इसप्रकार दूसरी (२३८ वीं) गाथा पूर्ण हुई । [गेण्हइ] अपने शुद्धात्मा के ग्रहण से रहित होता हुआ किसी भी बाह्य द्रव्य को ग्रहण करता है; [विधुणड़] कर्मरूपी रज को (कर्मरज को धोना) छोड़कर, बाहर की रज को साफ करता है- नष्ट करता है; [धोवइ] मल रहित परमात्मतत्व में मल उत्पन्न करनेवाले रागादि मल को (धोना) छोड़कर, बाह्य मल को धोता है- प्रक्षालित करता है । [सोसइ जदं तु आदवे खित्ता] विकल्प रहित ध्यानरूपी आतप द्वारा संसाररूपी नदी को नहीं सुखाता हुआ यथासंभव प्रयत्नपूर्वक सुखाता है । क्या करके सुखाता है? धूप में डालकर सुखाता है । वहाँ डालकर किसे सुखाता है? [पत्तं व चेलखंडं] बर्तन या वस्त्रखण्ड को वहाँ डालकर सुखाता है । [बिभेदि] भय रहित शुद्धात्मा की भावना से रहित होता हुआ, भय करता है । किससे भय करता है? [परदो य] और दूसरे चोरों आदि से भय करता है - डरता है । [पालयदि] परमात्मभावना का पालन रक्षण नहीं करता हुआ किसी भी दूसरे द्रव्य का पालन-रक्षण करता है । इसप्रकार तीसरी (२३९ वीं), गाथा पूर्ण हुई ॥२३७-२३८-२३९॥ |