+ उपकरण का स्वरूप -
अप्पडिकुट्ठं उवधिं अपत्थणिज्जं असंजदजणेहिं । (223)
मुच्छादिजणणरहिदं गेण्हदु समणो जदि वि अप्पं ॥242॥
अप्रतिक्रुष्टमुपधिमप्रार्थनीयमसंयतजनैः ।
मूर्च्छादिजननरहितं गृह्णातु श्रमणो यद्यप्यल्पम् ॥२२३॥
मूर्छादि उत्पादन रहित चाहे जिसे न असंयमी ।
अत्यल्प हो ऐसी उपधि ही अनिंदित अनिषिद्ध है ॥२२३॥
अन्वयार्थ : [यद्यपि अल्पम्] भले ही अल्प हो तथापि, [अप्रतिक्रुष्टम्] जो अनिंदित हो, [असंयतजनै: अप्रार्थनीयं] असंयतजनों में अप्रार्थनीय हो और [मूर्च्छादिजनन रहितं] जो मूर्च्छादि की जननरहित हो [उपधि] ऐसी ही उपधि को [श्रमण:] श्रमण [गृह्णतु] ग्रहण करो ।
Meaning : The ascetic (muni, shramana) who has to follow the exception path (apavāda mārga) accepts a little of external possessions (parigraha) which do not result in bondage of karmas, are not suitable for adoption by those without restraint, and do not cause faults like infatuation (mūrcchā).

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथाप्रतिषिद्धोपधिस्वरूपमुपदिशति -

य: किलोपधि: सर्वथा बन्धासाधकत्वादप्रतिक्रुष्ट: संयमादन्यत्रानुचितत्वादसंयतजना-प्रार्थनीयो, रागादिपरिणाममन्तरेण धार्यमाणत्वान्मूर्च्छादिजननरहितश्च भवति; स खल्व-प्रतिषिद्ध: । अतो यथोदितस्वरूप एवोपधिरूपादेयो, न पुनरल्पोऽपि यथोदितविपर्यस्तत्स्वरूप: ॥२२३॥


अब, अनिषिद्ध उपधि का स्वरूप कहते हैं :-

जो उपधि
  • सर्वथा बंध का असाधक होने से अनिन्दित है,
  • संयत के अतिरिक्त अन्यत्र अनुचित होने से असंयत-जनों के द्वारा अप्रार्थनीय (अनिच्छनीय) है और
  • रागादि-परिणाम के बिना धारण की जाने से मूर्च्छादि के उत्पादन से रहित है,
वह वास्तव में अनिषिद्ध है । इससे यथोक्त स्वरूप वाली उपधि ही उपादेय है, किन्तु किन्चित्मात्र भी यथोक्त स्वरूप से विपरीत स्वरूप वाली उपधि उपादेय नहीं है ॥२२३॥
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ पूर्वसूत्रोदितोपकरणस्वरूपं दर्शयति --
अप्पडिकुट्ठं उवधिं निश्चयव्यवहारमोक्षमार्गसहकारिकारणत्वेनाप्रतिषिद्धमुपधिमुपकरणरूपोपधिं, अपत्थणिज्जं असंजदजणेहिं अप्रार्थनीयं निर्विकारात्मोपलब्धिलक्षणभावसंयमरहितस्यासंयतजनस्यानभिलषणीयम्, मुच्छादिजणणरहिदं परमात्मद्रव्यविलक्षणबहिर्द्रव्यममत्वरूपमूर्च्छारक्षणार्जनसंस्कारादिदोषजननरहितम्, गेण्हदु समणो जदि वि अप्पं गृह्णातु श्रमणो यमप्यल्पं पूर्वोक्तमुपकरणोपधिं यद्यप्यल्पं तथापि पूर्वोक्तोचितलक्षणमेव ग्राह्यं,न च तद्विपरीतमधिकं वेत्यभिप्रायः ॥२४२॥


अब पहले (२४१ वीं) गाथा में कहे गये उपकरण का स्वरूप दिखाते हैं -

[अप्पडिकुट्ठं उवधिं] निश्चय-व्यवहार मोक्षमार्ग के सहकारी कारणरूप से अनिषिद्ध उपधि-उपकरणरूप उपधि को, [अपत्थणिज्जं असंजदजणेहिं] अप्रार्थनीय-विकार रहित आत्मा की प्रगटता लक्षण भावसंयम से रहित असंयमी मनुष्यों द्वारा इच्छा नहीं करने योग्य, [मुच्छादिजणरहिदं] परमात्मद्रव्य से विलक्षण बाह्यद्रव्य में ममत्वरूप मूर्च्छा-रक्षण-अर्जन (रक्षा करना, इकट्ठा करना), संस्कार (साज-संवार) आदि दोषों को उत्पन्न करने से रहित, [गेण्हदु समणो जदि वि अप्पं] मुनिराज जो भी ऊपर कहे गये थोड़े उपकरण-उपधि को ग्रहण करें, यद्यपि वह अल्प हो, तथापि पहले (ऊपर) कहे गये उचित लक्षण-वान को ही ग्रहण करना चाहिये, उससे विपरीत अथवा अधिक को ग्रहण नहीं करना चाहिये -- ऐसा अभिप्राय है ॥२४२॥