
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथेदानीं पुरुषाणां दीक्षाग्रहणे वर्णव्यवस्थां कथयति -- वण्णेसु तीसु एक्को वर्णेषु त्रिष्वेकः ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यवर्णेष्वेकः । कल्लाणंगो कल्याणाङ्गआरोग्यः । तवोसहो वयसा तपःसहः तपःक्षमः । केन । अतिवृद्धबालत्वरहितवयसा । सुमुहो निर्विकाराभ्यन्तरपरमचैतन्यपरिणतिविशुद्धिज्ञापकं गमकं बहिरङ्गनिर्विकारं मुखं यस्य, मुखावयवभङ्ग-रहितं वा, स भवति सुमुखः । कुच्छारहिदो लोकमध्ये दुराचाराद्यपवादरहितः । लिंगग्गहणे हवदि जोग्गो एवंगुणविशिष्टपुरुषो जिनदीक्षाग्रहणे योग्यो भवति । यथायोग्यं सच्छूद्राद्यपि ॥२५३॥ अब, इस समय पुरुषों के दीक्षाग्रहण में वर्ण व्यवस्था कहते हैं - [वण्णेसु तीसु एक्को] तीन वर्णों में से एक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वर्णों में से कोई एक वर्ण । [कल्लाणंगो] कल्याणांग-निरोग शरीर । [तवोसहो वयसा] तप: सह-तप को सहने में समर्थ । किसके द्वारा तप को सहने में समर्थ हो? अधिक वृद्धता और अधिक बालता से रहित वय द्वारा तप को सहनेवाला । [सुमुहो] विकार रहित अंतरंग में परम चैतन्य परिणतिरूप विशुद्धि को बतानेवाला; गमक (ज्ञान करानेवाला), बाहर में विकार रहित है मुख जिसका अथवा जो मुख के अवयवों के भंग से रहित है, वह सुमुख है । [कुच्छारहिदो] लोक में दुराचार आदि अपवादों से रहित । [लिंगग्गहणे हवदि जोग्गो] इन गुणों से विशिष्ट पुरुष जिन-दीक्षा ग्रहण करने के योग्य है । यथा योग्य सत् शूद्र आदि भी जिन-दीक्षा ग्रहण के योग्य हैं ॥२५३॥ |