
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ पाणिगताहारःप्रासुकोऽप्यन्यस्मै न दातव्य इत्युपादिशति -- अप्पडिकुट्ठं पिंडं पाणिगयं णेव देयमण्णस्स अप्रतिकृष्ट आगमाविरुद्ध आहारः पाणिगतो हस्तगतोनैव देयो, न दातव्योऽन्यस्मै, दत्ता भोत्तुमजोग्गं दत्वा पश्चाद्भोक्तुमयोग्यं, भुत्तो वा होदि पडिकुट्ठो कथंचित्भुक्तो वा, भोजनं कृतवान्, तर्हि प्रतिकृष्टो भवति, प्रायश्चित्तयोग्यो भवतीति । अयमत्र भावः -- हस्तगताहारं योऽसावन्यस्मै न ददाति तस्य निर्मोहात्मतत्त्वभावनारूपं निर्मोहत्वं ज्ञायत इति ॥२६३॥ अब, हाथ में आया हुआ प्रासुक आहार भी दूसरों को नहीं देना चाहिये, ऐसा उपदेश देते हैं -- [अप्पडिकुट्ठं पिंडं पाणिगयं णेव देयमण्णस्स] आगम से अविरुद्ध-निर्दोष, हाथ में आया हुआ आहार, देने योग्य नहीं है- दूसरों को नहीं देना चाहिये । [दत्ता भोत्तुम्जोग्गं] देने के बाद भोजन के लिये अयोग्य है; [भुत्तो वा होदि पडिकुट्ठो] अथवा कथंचित् भुक्त है, (मानकर) भोजन करता है तो प्रतिकृष्ट है- प्रायश्चित्त के योग्य है । यहाँ भाव यह है -- जो वह हाथ में आया हुआ आहार दूसरों को नहीं देता है, उससे मोह रहित आत्मतत्त्व की भावनारूप मोह रहितता-वीतरागता ज्ञात होती है ॥२६३॥ |