
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथासत्संगं प्रतिषेध्यत्वेन दर्शयति - यत: सकलस्यापि विश्ववाचकस्य सल्लक्ष्मण: शब्दब्रह्मणस्तद्वाच्यस्य सकलस्यापि सल्लक्ष्मणो विश्वस्य च युगपदनुस्यूततदुभयज्ञेयाकारतयाधिष्ठानभूतस्य सल्लक्ष्मणो ज्ञातृ-तत्त्वस्य निश्चयनान्निश्चितसूत्रार्थपदत्वेन, निरुपरागोपयोगत्वात् समितकषायत्वेन, बहुशो- ऽभ्यस्तनिष्कम्पोपयोगत्वात्तपोऽधिकत्वेन च सुष्ठु संयतोऽपि सप्तार्चि:संगतं तोयमिवावश्यं-भाविविकारत्वात् लौकिकसंगादसंयत एव स्यात् । ततस्तत्संग: सर्वथा प्रतिषेध्य एव ॥२६८॥ अब, असत्संग निषेध्य है ऐसा बतलाते हैं :-
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जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ लौकिकसंसर्गं प्रतिषेधयति -- णिच्छिदसुत्तत्थपदो निश्चितानि ज्ञातानिनिर्णीतान्यनेकान्तस्वभावनिजशुद्धात्मादिपदार्थप्रतिपादकानि सूत्रार्थपदानि येन स भवति निश्चित-सूत्रार्थपदः, समिदकसाओ परविषये क्रोधादिपरिहारेण तथाभ्यन्तरे परमोपशमभावपरिणतनिजशुद्धात्म-भावनाबलेन च शमितकषायः, तवोधिगो चावि अनशनादिबहिरङ्गतपोबलेन तथैवाभ्यन्तरे शुद्धात्मतत्त्व-भावनाविषये प्रतपनाद्विजयनाच्च तपोऽधिकश्चापि सन् स्वयं संयतः कर्ता लोगिगजणसंसग्गं ण चयदि जदि लौकिकाः स्वेच्छाचारिणस्तेषां संसर्गो लौकिकसंसर्गस्तं न त्यजति यदि चेत् संजदो ण हवदि तर्हि संयतोन भवतीति । अयमत्रार्थः — स्वयं भावितात्मापि यद्यसंवृतजनसंसर्गं न त्यजति तदातिपरिचयादग्निसङ्गतंजलमिव विकृतिभावं गच्छतीति ॥२८०॥ अब लौकिक संसर्ग का निषेध करते है - [णिच्छिदसुत्त्त्थपदो] जिसके द्वारा अनेकान्त स्वभावी अपने शुद्धात्मा आदि पदार्थों का प्रतिपादन करनेवाले सूत्र-अर्थ-पद निश्चितरूप से जाने गये है- निर्णय किये गये हैं वे निश्चित सूत्रार्थपद हैं [समिदकसाओ] दूसरे विषय में क्रोधादि के त्याग से अन्तरंग में उपशम भाव से परिणत अपने शुद्धात्मा की भावना के बल से कषायों का शमन करनेवाले हैं, [तवोधिगो चावि] अनशन आदि बाह्य तप के बल से और उसीप्रकार अन्तरंग में शुद्धात्म-तत्व की भावना के विषय में प्रतपन और विजयन से, जो तप में अधिक होते हुये भी स्वयं मुनि रूप कर्ता [लोगिगजणसंग्गं ण चयदि जदि] लौकिक अर्थात् स्वेच्छाचारी उनका संसर्ग-लौकिक संसर्ग है (षष्ठी तत्पुरुष समास किया), उसे यदि नहीं छोड़ता है, [संजदो ण हवदि] तब (वह) संयत-मुनि नहीं है । यहाँ अर्थ यह है- स्वयं आत्मा की भावना करनेवाला होने पर भी, यदि असंवृत-असंयमी जनों का संसर्ग नहीं छोड़ता है, तो अग्नि की संगति में रहनेवाले जल के समान, अतिपरिचय से विकृति भाव (रागादि भाव) को प्राप्त होता है ॥२८०॥ |