
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ सत्संगं विधेयत्वेन दर्शयति - यत: परिणामस्वभावत्वेनात्मन: सप्तार्चि:संगतं तोयमिवावश्यंभाविविकारत्वाल्लौकिक- संगात्संयतोऽप्यसंयत एव स्यात्, ततो दु:खमोक्षार्थिना गुणै: समोऽधिको वा श्रमण: श्रमणेन नित्यमेवाधिवसनीय: तथास्य शीतापवरककोणनिहितशीततोयवत्समगुणसंङ्गात्गुणरक्षा शीत-तरतुहिनर्शकरासंपृक्तशीततोयवत् गुणाधिकसंगात् गुणवृद्धि: ॥२७०॥ इत्यध्यास्य शुभोपयोगजनितां कान्चित्प्रवृत्तिं यति: सम्यक संयमसौष्ठवेन परमां क्रामन्निवृत्तिं क्रमात हेलाक्रान्त-समस्त-वस्तु-विसर-प्रस्तार-राम्योदयां ज्ञानानन्दमयीं दशामनुभवत्वेकान्तात: शास्व्तीम ॥१७॥ अथ पंचरत्नम् । तन्त्रस्यास्य शिखण्डमण्डनमिव प्रद्योतयत्सर्वतो ऽद्वैतीयीकमथार्हतो भगवत: संक्षेपत: शासनम व्याकुर्वन्जगतो विलक्षणपंथा संसारमोक्षस्थितिं जीयात्सम्प्रति पंचरत्नमनघं सूत्रैरिमै: पंचभि: ॥१८॥ अब, सत्संग विधेय (करने योग्य) है, ऐसा बतलाते हैं : — आत्मा परिणामस्वभाव वाला है इसलिये अग्नि के संग में रहे हुए पानी की भाँति (संयत के भी) लौकिकसंग से विकार अवश्यंभावी होने से संयत भी असंयत ही हो जाता है । इसलिये दुःखमोक्षार्थी (दुःखों से मुक्ति चाहने वाले) श्रमण को
(कलश-१७--मनहरण कवित्त)
इस प्रकार शुभोपयोगजनित किंचित् प्रवृत्ति का सेवन करके यति सम्यक् प्रकार से संयम के सौष्ठव (श्रेष्ठता, सुन्दरता) से क्रमश: परम निवृत्ति को प्राप्त होता हुआ; जिसका रम्य उदय समस्त वस्तुसमूह के विस्तार को लीलामात्र से प्राप्त हो जाता है (जान लेता है) ऐसी शाश्वती ज्ञानानन्दमयी दशा का एकान्तत: (केवल, सर्वथा, अत्यन्त) अनुभव करो ।इसप्रकार शुभ उपयोगमयी किंचित् ही । शुभरूप वृत्ति का सुसेवन करके ॥ सम्यक्प्रकार से संयम के सौष्टव से । आप ही क्रमशर निरवृत्ति करके ॥ अरे ज्ञानसूर्य का है अनुपम जो उदय । सब वस्तुओं को मात्र लीला में ही जान लो ॥ ऐसी ज्ञानानन्दमयी दशा एकान्ततः । अपने में आपही नित अनुभव करो ॥१७॥ इस प्रकार शुभोपयोग-प्रज्ञापन पूर्ण हुआ ।
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जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथोत्तमसंसर्गः कर्तव्य इत्युपदिशति -- तम्हा यस्माद्धीनसंसर्गाद्गुणहानि-र्भवति तस्मात्कारणात् अधिवसदु अधिवसतु तिष्ठतु । स कः कर्ता । समणो श्रमणः । क्व । तम्हि तस्मिन्नधिकरणभूते। णिच्चं नित्यं सर्वकालम् । तस्मिन्कुत्र । समणं श्रमणे । लक्षणवशादधिकरणे कर्म पठयते । कथंभूते श्रमणे । समं समे समाने । कस्मात् । गुणादो बाह्याभ्यन्तररत्नत्रयलक्षणगुणात् । पुनरपि कथंभूते । अहियं वा स्वस्मादधिके वा । कैः । गुणेहिं मूलोत्तरगुणैः । यदि किम् । इच्छदि जदि इच्छति वाञ्छति यदि चेत् । कम् । दुक्खपरिमोक्खं स्वात्मोत्थसुखविलक्षणानां नारकादिदुःखानां मोक्षंदुःखपरिमोक्षमिति । अथ विस्तरः -- यथाग्निसंयोगात् जलस्य शीतलगुणविनाशो भवति तथाव्यावहारिकजनसंसर्गात्संयतस्य संयमगुणविनाशो भवतीति ज्ञात्वा तपोधनः कर्ता समगुणं गुणाधिकं वा तपोधनमाश्रयति, तदास्य तपोधनस्य यथा शीतलभाजनसहितशीतलजलस्य शीतलगुणरक्षा भवति तथा समगुणसंसर्गाद्गुणरक्षा भवति । यथा च तस्यैव जलस्य कर्पूरशर्करादिशीतलद्रव्यनिक्षेपे कृते सतिशीतलगुणवृद्धिर्भवति तथा निश्चयव्यवहाररत्नत्रयगुणाधिकसंसर्गाद्गुणवृद्धिर्भवतीति सूत्रार्थः ॥२८२॥ अब, उत्तम संसर्ग करना चाहिये; ऐसा उपदेश देते हैं -- [तम्हा] जिस कारण हीन संसर्ग से गुणों की हानि होती है, उस कारण अधिवसदु-निवास करें-रहें । कर्तारूप वे कौन रहें? [समणो] मुनिराज रहें । वे कहां रहें? [तम्हि] उस आधारभूत में वे रहें । [ण्च्चिं] हमेशा-सभी कालों में रहें । उस आधारभूत किसमें रहें? [समणं] मुनिसंघ में रहें । यहाँ लक्षण- व्याकरण नियम के कारण, अधिकरण के अर्थ में कर्म कारक का प्रयोग हुआ है । वे कैसे श्रमण संघ में रहें? [समं] वे समान श्रमण संघ में रहें । किस में समान संघ में रहें? [गुणादो] बहिरंग और अन्तरंग रत्नत्रय लक्षण गुणों से समान संघ में रहें । और वे कैसे संघ में रहें? [अहियं वा] अथवा अपने से अधिक में रहें । किनसे अधिक में रहें? [गुणेहिं] मूलोत्तर गुणों द्वारा अपने से अधिक गुणवाले साधु-संघ में रहें । यदि क्या तो इन में रहें? [इच्छदि जदि] यदि चाहते हैं तो इन में रहें । क्या चाहते ? [दुक्खपरिमोक्खं] अपने आत्मा से उत्पन्न सुख से विलक्षण नारक आदि दुःखों से पूर्णत: मोक्ष-दु:ख परिमोक्ष चाहते हैं तो इनमें रहें । अब यहाँ विस्तार करते हैं -- जैसे अग्नि के संयोग से, जल का शीतलगुण नष्ट होता है, व्यावहारिक मनुष्यों के संसर्ग से, मुनिराज का संयम गुण नष्ट होता है - ऐसा जानकर मुनिराज रूप कर्ता, समान गुण अथवा अधिक गुण सम्पन्न मुनिराज का आश्रय लेते हैं; तब, जैसे ठंडे बर्तन सहित (में रखे हुये) ठंडे जल के ठंडे गुण की रक्षा होती है, उसीप्रकार समान गुणों के संसर्ग से, उन मुनि के गुणों की रक्षा होती है । और जैसे कपूर, शक्कर आदि ठंडे द्रव्य डालने से उस जल के ठंडे गुण में वृद्धि होती है; उसीप्रकार निश्चय-व्यवहार रत्नत्रयरूप गुणों में अधिक के संसर्ग से उनके गुणों में वृद्धि होती है- ऐसा गाथा का अर्थ है ॥२८२॥ |