
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
चातुर्वर्णस्य श्रमणसंघस्योपकारकरणवृत्ति: सा सर्वापि रागप्रधानत्वात् शुभोपयोगिनामेव भवति, न कदाचिदपि शुद्धोपयोगिनाम् ॥२४९॥ अब, ऐसा निश्चित करते हैं कि सभी प्रवृत्तियाँ शुभोपयोगियों के ही होती हैं :- संयम की प्रतिज्ञा की होने से छह-काय के विराधन से रहित जो कोई भी, शुद्धात्मपरिणति के रक्षण में निमित्तभूत ऐसी, चार प्रकार के श्रमणसंघ का उपकार करने की प्रवृत्ति है वह सभी रागप्रधानता के कारण शुभोपयोगियों के ही होती है, शुद्धोपयोगियों के कदापि नहीं ॥२४९॥ |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथागमज्ञानतत्त्वार्थश्रद्धान-संयतत्वलक्षणेन विकल्पत्रययौगपद्येन तथा निर्विकल्पात्मज्ञानेन च युक्तो योऽसौ संयतस्तस्य किं लक्षणमित्युपदिशति । इत्युपदिशति कोऽर्थः इति पृष्टे प्रत्युत्तरं ददाति । एवं प्रश्नोत्तरपातनिकाप्रस्तावे क्वापि क्वापि यथासंभवमितिशब्दस्यार्थो ज्ञातव्यः — स श्रमणः संयतस्तपोधनो भवति । यः किंविशिष्टः ।शत्रुबन्धुसुखदुःखनिन्दाप्रशंसालोष्टकाञ्चनजीवितमरणेषु समः समचित्तः इति । ततः एतदायाति — शत्रु-बन्धुसुखदुःखनिन्दाप्रशंसालोष्टकाञ्चनजीवितमरणसमताभावनापरिणतनिजशुद्धात्मतत्त्वसम्यक्श्रद्धान- ज्ञानानुष्ठानरूपनिर्विकल्पसमाधिसमुत्पन्ननिर्विकारपरमाह्लादैकलक्षणसुखामृतपरिणतिस्वरूपं यत्परमसाम्यं तदेव परमागमज्ञानतत्त्वार्थश्रद्धानसंयतत्वानां यौगपद्येन तथा निर्विकल्पात्मज्ञानेन च परिणततपोधनस्य लक्षणं ज्ञातव्यमिति ॥२८८॥ [उवकुणदि जो वि णिच्चं चादुव्वण्णस्स समणसंघस्स] जो हमेशा उपकार करते हैं । किसका उपकार करते हैं? चार प्रकार के मुनिसंघ का उपकार करते हैं । यहाँ 'श्रमण' शब्द से 'श्रमण' शब्द द्वारा वाच्य ऋषि, मुनि, यति, अनगार ग्रहण करना चाहिये ।
अथवा श्रमण धर्म के अनुकूल श्रावक आदि चातुर्वर्ण संघ है । इन सबका उपकार जैसा (बनता है वह) कैसे करते हैं? [काय विराधणरहिदं] अपने आप में लीनतारूप भावना स्वरूप, अपने शुद्ध चैतन्य लक्षण निश्चय प्राणों की रक्षा करते हुये, छहकाय के जीवों की विराधना से रहित, जैसा उपकार बनता है, वैसा करते हैं । [सो वि सरागप्पधाणो] वे इसप्रकार के मुनि भी धर्मानुराग रूप आचरण सहित मुनियों में प्रधान-श्रेष्ठ हैं- ऐसा अर्थ है ॥२८८॥ |