
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ कारणवैपरीत्यफलवैपरीत्ये एव व्याख्याति - यानि हि छद्मस्थव्यवस्थापितवस्तूनि कारणवैपरीत्यं, ते खलु शुद्धात्मपरिज्ञानशून्यतयान- वाप्तशुद्धात्मवृत्तितया चाविदितपरमार्था विषयकषायाधिका: पुरुषा: तेषु शुभोपयोगात्मकानां जुष्टोपकृतदत्तनां या केवलपुण्यापसदप्राप्ति: फलवैपरीत्यं, तत्कुदेवमनुजत्वम् ॥२५७॥ अब (इस गाथा में भी) कारण विपरीतता और फल विपरीतता ही बतलाते हैं :- जो छद्मस्थस्थापित वस्तुयें हैं वे कारणविपरीतता हैं; वे (विपरीत कारण) वास्तव में
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जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ सम्यक्त्वव्रतरहितपात्रेषुभक्तानां कुदेवमनुजत्वं भवतीति प्रतिपादयति -- फलदि फलति । केषु । कुदेवेसु मणुवेसु कुत्सितदेवेषु मनुजेषु । किं कर्तृ । जुट्ठं जुष्टं सेवा कृता, कदं व कृतं वा किमपि वैयावृत्त्यादिकम्, दत्तं दत्तंकिमप्याहारादिकम् । केषु । पुरिसेसु पुरुषेषु पात्रेषु । किंविशिष्टेषु । अविदिदपरमत्थेसु य अविदितपरमार्थेषुच, परमात्मतत्त्वश्रद्धानज्ञानशून्येषु । पुनरपि किंरूपेषु । विसयकसायाधिगेसु विषयकषायाधिकेषु, विषय-कषायाधीनत्वेन निर्विषयशुद्धात्मस्वरूपभावनारहितेषु इत्यर्थः ॥२५७॥ [फलदि] फलता है । किसरूप में फलता है? [कुदेवेसु मणुवेसु] कुत्सित देव-मनुष्यों के रूप में फलता है । क्या करना फलता है ? [जुट्ठं] सेवा करना, [कदं वा] कुछ भी वैयावृत्ति आदि करना, अथवा [दत्तं] कुछ भी आहार आदि देना कुदेवादि रूप में फलता है । ये सब किनके प्रति करने से, इस रूप फलते हैं ? [पुरिसेसु] ये सब पुरुषरूप पात्रों के प्रति करने से, ऐसे फलते हैं । किस विशेषता वाले पुरुष-पात्रों में करने से फलते हैं? [अविदिदपरमत्थेसु य] परमार्थ से अजानकार-परमात्मतत्त्व के श्रद्धान-ज्ञान से रहित पुरुषों में करने से फलते हैं । और किस स्वरूप वाले पुरुष में, करने से इस रूप में फलते हैं ? [विसयहसायाधिगेसु] विषय-कषायों में अधिक-विषय-कषायों के अधीन होने से, विषय-कषाय रहित शुद्धात्मस्वरूप की भावना से रहित पुरुषों में, ये सब करने से, वे कुदेवादि रूप में फलते हैं ॥२९५॥ |